जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ़ सही साबित हुए आरोप, शीतकालीन सत्र में लाया जा सकता है महाभियोग प्रस्ताव
सरकारी आवास से मिले नकदी मामले में संसदीय समिति को संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में जस्टिस यशवंत वर्मा विफल रहे हैं. उनके खिलाफ अब शीतकालीन सत्र में महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है.
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दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड की मुश्किलें बढ़ गई हैं. उनके के खिलाफ आरोप सही साबित हुए हैं. ख़बर के मुताबिक संसद के शीतकालीन सत्र में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है.
दरअसल लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा गठित एक संसदीय समिति ने पूर्व दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से नकदी मिलने के मामले में उन्हें जिम्मेदार ठहराया है. समिति ने निष्कर्ष निकाला कि पूर्व दिल्ली हाईकोर्ट के जज आवास में मिले पैसों की मौजूदगी का संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहे.
सरकारी आवास से मिले पैसों का जवाब नहीं दे सके जस्टिस वर्मा!
समाचार एजेंसी IANS को प्राप्त और बुधवार को संसद में पेश की गई समिति की रिपोर्ट के अनुसार, नई दिल्ली के 30, तुगलक क्रिसेंट स्थित न्यायमूर्ति वर्मा के सरकारी आवास के एक स्टोररूम में 500 रुपए के नोटों की बड़ी मात्रा बरामद हुई थी, जिनके बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी जा सकी.
क्या है पूरा मामला?
यह मामला तब सामने आया था, जब 14 मार्च 2025 की रात उनके आवास पर आग लगी थी. आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को स्टोररूम में बड़ी मात्रा में आंशिक रूप से जले हुए नकदी के बंडल मिले थे. रिपोर्ट में समिति ने कहा कि न्यायमूर्ति वर्मा नोटों के स्रोत, स्वामित्व या उनके वहां मौजूद होने को लेकर कोई विश्वसनीय स्पष्टीकरण नहीं दे सके.
समिति ने बाद की जांच प्रक्रिया पर भी चिंता जताई. रिपोर्ट में कहा गया कि महत्वपूर्ण सबूतों को न तो सही तरीके से सुरक्षित रखा गया और न ही संरक्षित किया गया. स्टोररूम की स्थिति को कानूनी तौर पर सील कर जांच किए जाने से पहले ही बदल दिया गया था.
रिपोर्ट में बरामद नकदी के गायब होने या उपलब्ध न होने पर भी सवाल उठाए गए हैं. समिति ने कहा कि भौतिक साक्ष्यों के गायब होने की वजह घटनास्थल को सुरक्षित रखने में लापरवाही और आवास से जुड़े कर्मियों द्वारा स्टोररूम में की गई गतिविधियां थीं.
शीतकालीन सत्र में आ सकता है महाभियोग प्रस्ताव!
हालांकि, समिति ने यह भी कहा कि उसे ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि न्यायमूर्ति वर्मा ने स्वयं नकदी हटाई थी. समिति ने न्यायमूर्ति वर्मा के जवाब और खासकर 22 मार्च 2025 को दिए गए उनके लिखित स्पष्टीकरण की आलोचना करते हुए कहा कि यह असंतोषजनक था और इसमें स्पष्टता, पारदर्शिता तथा संस्थागत जवाबदेही का अभाव था.
यह रिपोर्ट दो खंडों में तैयार की गई है, जिसमें जांच के दौरान दर्ज मौखिक गवाहियां और दस्तावेजी साक्ष्य शामिल हैं. इससे पहले तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा गठित आंतरिक जांच समिति ने भी निष्कर्ष निकाला था कि जिस स्टोररूम से नकदी मिली थी, उस पर न्यायमूर्ति वर्मा का प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण था.
उस समय दिल्ली हाईकोर्ट में कार्यरत न्यायमूर्ति वर्मा को विवाद के बाद उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद हाईकोर्ट वापस स्थानांतरित कर दिया गया था. बाद में संसद ने उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू की थी. हालांकि, न्यायमूर्ति वर्मा के इस्तीफा देने के बाद यह प्रक्रिया प्रभावी रूप से समाप्त हो गई.
जस्टिस वर्मा अप्रैल में दे चुके हैं इस्तीफा
जहां तक जस्टिस वर्मा के इस्तीफे का सवाल हो तो कानून ऐसा कहता है कि जज का इस्तीफा ही उनका पद से हटना है. सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ का 1978 में दिया गया फैसला है कि जज का इस्तीफा देना ही उनका पद से हटना है, स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है. जस्टिस वर्मा इस साल अप्रैल में इस्तीफ़ा राष्ट्रपति को भेज चुके हैं. इसके बावजूद उनका नाम इलाहाबाद हाई कोर्ट की सूची में है.
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अब जांच समिति की रिपोर्ट में उन्हें दोषी पाए जाने के बाद क्या उन्हें हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है. ये अपनी तरह का एक ऐसा पहला मामला है जब जज के इस्तीफा देने के बावजूद उनके खिलाफ जांच हुई. और तो और उनका नाम हाई कोर्ट के जजों की सूची में है.
Our judicial system is suffering from fungus but our lordship not ready to accept it.