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गुवाहाटी HC ने महिला को भारतीय नागरिक मानने से कर दिया इनकार, ट्रिब्यूनल का फैसला बरकरार

असम में गुवाहाटी हाई कोर्ट ने अपने फैसले में एक मुस्लिम महिला की नागरिकता को वैध ठहराने से इनकार कर दिया. कोर्ट में महिला ने कई दस्तावेज पेश किए थे, जिसमें एक में उसकी बर्थ डेट 30 फरवरी बताई गई थी.

गुवाहाटी HC ने महिला को भारतीय नागरिक मानने से कर दिया इनकार, ट्रिब्यूनल का फैसला बरकरार
Guwahati High Court (File Photo) Image: IANS
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असम से एक हैरान कर देने वाली ख़बर सामने आ रही है. यहां गुवाहाटी हाई कोर्ट ने एक मुस्लिम महिला द्वारा प्रस्तुत दस्तावेंजों के आधार पर उसे भारतीय नागरिक मानने से इनकार कर दिया. जस्टिस संजय कुमार मेधी और जस्टिस प्रांजल दास की पीठ ने दो टूक कहा कि बिना किसी ठोस, मजबूत सबूत के, केवल मौखिक गवाही के आधार पर महिला का अपने पूर्वजों से संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता है.

इसके साथ ही कोर्ट ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें महिला द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजी सबूतों के आधार भारतीय नागरिक मानने से इनकार कर दिया गया था. कोर्ट ने इस दौरान हैरान कर देना वाला मुद्दा उठाया कि महिला ने कोर्ट और ट्रिब्यूनल के समक्ष अपनी जन्मतिथि 30.02.1990 (30 फरवरी 1990) बताई थी, जो पूरी तरह से गलत और असंभव है. आपको बता दें कि अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार फरवरी महीने में अधिकत 29 दिन (लीप ईयर मिलाकर) हो सकते हैं.

आखिर क्या है पूरा मामला? 

आपको बता दें कि ये पूरा मामला 20 साल पुराना है. दिसंबर 2006 में दरंग मंगलदोई के पुलिस अधीक्षक ने महिला की भारतीय नागरिकता पर संदेह जताते हुए ये मामला फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल को भेजकर उनसे उनकी राय मांगी गई थी. इसके बाद  ट्रिब्यूनल ने महिला को नोटिस भेजकर नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा. इसके बाद महिला ने अपने लिखित बयान के साथ-साथ करीब 9 दस्तावेज और गवाह पेश किए थे. इनमें महिला ने खुद को 1966 की मतदाता सूची में शामिल आकाश अली का वंशज बताया था.

महिला के दस्वावेज और दावें क्यों खारिज हुए?

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आपको बता दें कि महिला द्वारा पेश दस्तावेंजों में अदालत ने कई खामियां पाईं. मसलन महिला ने ट्रिब्यूनल के सामने जो कागजात पेश किए उसमें 1966 और 1993 की एक मतदाता सूची थी, जिसमें उसके कथित दादा आकाश अली का नाम था. वहीं 1993 वाली सूची में नूर इस्लाम (आकाश अली के बेटे) और जहूरा के नाम थे, जिन्हें महिला ने अपने माता-पिता बताया था. अदालत और ट्रिब्यूनल ने इन दोनों ही दलीलों को मानने से इनकार कर दिया.

महिला ने 30 फरवरी बताई थी अपनी जन्मतिथि

ट्रिब्यूनल ने SC के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि केवल दस्तावेज देना ही दलील को सच साबित नहीं करता है या उसमें लिखी बातें बातें सच साबित नहीं हो जातीं. ट्रिब्यूनल ने आगे कहा कि किसी भी दस्तावेज की सत्यता की पुष्टि करने के लिए उन गवाहों की जरूरत होती है जो उनके प्रामाणिक होने की गवाही दे सकें.

इतना ही नहीं महिला ने आगे दावा किया कि उसके दादा आकाश अली का नाम 2010 की मतदाता सूची में भी अबू बकर के रूप में दर्ज था और ये दोनों नाम एक ही व्यक्ति के थे. हालांकि अदालत ने इसे भी मानने से इनकार कर दिया और खारिज कर दिया. इस दौरान अदालत ने खास तौर पर जोर दिया कि कैसे याचिकाकर्ता द्वारा जमा किए गए दस्तावेज में जन्मतिथि 30 फरवरी 1990 बताई गई है जो पूरी तरह से अमान्य थी.

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मौखिक गवाही की पुष्टि नहीं कर पाई महिला!

महलिा याचिकाकर्ता के वकील एम. देव ने कोर्ट के समक्ष कहा कि पेश मतदाता सूची प्रमाणित प्रतियां थीं, जो साक्ष्य अधिनियम की धारा 74 के तहत सार्वजनिक दस्तावेज हैं. इस पर कोर्ट ने कहा कि अगर ट्रिब्यूनल की आपत्ति को छोड़ भी दें कि दस्तावेज की प्रमाणिकता के लिए उसकी गवाही देने वाला कोई चाहिए, तो भी क्या महिला अपने पूर्वज आकाश अली के साथ अपना संबंध साबित कर पाई? अदालत ने साफ कर दिया कि, "यह पूरी तरह स्थापित कानून है कि ऐसे मामलों में केवल मौखिक गवाही लिंक स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं होती है. इसके लिए पुख्ता दस्तावेजी सबूत अनिवार्य हैं."

महिला की याचिका को कोर्ट ने किया खारिज

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पीठ सुनवाई के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंची कि चूंकि दस्तावेजों के मूल लेखकों या संबंधित अधिकारियों ने इसकी गवाही नहीं दी थी, इसलिए ट्रिब्यूनल द्वारा इन सबूतों को स्वीकार न करना किसी भी तरह से गैर-कानूनी नहीं था. इसके बाद अदालत ने ट्रिब्यूनल के फैसले को सही ठहराते हुए महिला की याचिका खारिज कर दी.

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