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गैर मर्द के साथ संबंध, फिर भी पति देगा मेंटनेंस? इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, एडल्टरी सबूत बनेंगे वॉट्सऐप चैट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है. जिसमें व्हाट्सएप चैट को केस में सबूत नहीं माना गया था. पति ने कोर्ट में पत्नी की 'अश्लील' वॉट्सऐप चैट दिखाने की बात कही थी.

गैर मर्द के साथ संबंध, फिर भी पति देगा मेंटनेंस? इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, एडल्टरी सबूत बनेंगे वॉट्सऐप चैट
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इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) ने पति के मेंटनेंस के एक मामले की सुनवाई करते हुए बड़ा आदेश दिया है. कोर्ट ने अब पत्नी के कथित एडल्टरी (गैर मर्द के साथ बातचीत) के सबूत के तौर पर व्हाट्सएप चैट रिकॉर्ड पेश करने की इजाजत दे दी है. यानी गैर मर्द के साथ पत्नी के चैट्स सबूत के तौर पर पेश किए जा सकेंगे. जबकि पहले इसे प्राइवेसी का उल्लंघन माना गया था.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है. जिसमें व्हाट्सएप चैट को केस में सबूत नहीं माना गया था. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने न तो सामग्री की जांच की और न ही एडल्टरी के आरोप पर कोई खास मुद्दा बनाया. हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह एक पति को कथित एडल्टरी के आधार पर अपनी पत्नी की मेंटेनेंस की याचिका का विरोध करने के लिए कुछ वॉट्सऐप चैट रिकॉर्ड पर रखने की इजाजत दे. 

ट्रायल कोर्ट को जारी किए आदेश 

इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के बाद पत्नी पर लगे एडल्टरी के आरोपों पर नए सिरे से सुनवाई होगी. अपने आदेश में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि बिना पर्याप्त विचार के सबूत अस्वीकार करना कानूनी तौर पर उचित नहीं था. दरअसल, ट्रायल कोर्ट की ओर से वॉट्सऐप चैट रिकॉर्ड पेश किए जाने और एडल्टरी के आरोपों को मुद्दा न बनाए जाने के बाद पति ने हाई कोर्ट का रुख किया था.

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पति ने याचिका दायर कर मामले में राहत की मांग की है. पति की याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस मदन पाल सिंह ने कहा, ट्रायल कोर्ट ने चैट को सिर्फ इसलिए स्वीकार करने से इंकार कर दिया था, क्योंकि पति ने इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 65बी के तहत सर्टिफिकेट जमा नहीं किया था. यह आमतौर पर इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की स्वीकार्यता के लिए जरूरी होता है. हालांकि, फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा-14 उन्हें कोई भी ऐसा सबूत लेने का अधिकार देता है जो किसी झगड़े को असरदार तरीके से सुलझाने में मदद कर सकता है, चाहे वह सबूत इंडियन एविडेंस एक्ट के तहत मान्य हो या नहीं. इसलिए ट्रायल कोर्ट का आदेश कानून की नजर में टिकने लायक नहीं है. 

क्या है मामला?

दरअसल, ट्रायल कोर्ट ने एक मामले में पति को हर महीने 10 हजार रुपये मेंटनेंस देने का आदेश दिया था. इसको चुनौती देते हुए पति ने हाई कोर्ट में कहा कि उसकी पत्नी किसी दूसरे आदमी के साथ 'अडल्टरी' में रह रही थी. याचिकाकर्ता ने कहा कि यह क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के सेक्शन-125 के तहत मेंटेनेंस से इंकार करने का एक आधार है. इस दौरान पति ने हाई कोर्ट में पत्नी के कथित वॉट्सऐप चैट भी पेश करने को कहा. पति ने कहा कि पत्नी की वॉट्सऐप चैट 'अश्लील' थी. जिसमें दोनों के बीच फिजिकल रिलेशन का भी पता चला. पति की दलील पर हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को नए सिरे से विचार करने का आदेश दिया. 

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हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने न तो मटीरियल की जांच की और न ही एडल्टरी के आरोप पर कोई खास मुद्दा बनाया. जबकि याचिकाकर्ता की खास दलीलों और सपोर्टिंग मटीरियल को देखते हुए रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों पर विचार करने के बाद एक खास मुद्दा बनाया जाना चाहिए था. उस पर फैसला सुनाया जाना चाहिए था. हाई कोर्ट के आदेश के बाद अब ट्रायल कोर्ट दोनों पक्षों को सुनकर और नए सबूतों को स्वीकार कर नए सिरे से सुनवाई करेगा. ट्रायल कोर्ट का पहले का आदेश रद्द हो गया है. नई दलील और सबूतों के बाद अब कोर्ट का फैसला बदल सकता है. 

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