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पथरीले रास्ते, नंगे पांव 4 KM दूर कुएं से पानी लाने को मजबूर महिलाएं... मध्य प्रदेश में मजाक बनकर रह गई PM Modi की ‘हर घर जल योजना’!

मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के आदिवासी गांवों में जलसंकट गहराता जा रहा है. नलजल योजना बंद होने से महिलाएं और बच्चे रोज करीब 4 किलोमीटर पैदल चलकर कुएं से पानी लाने को मजबूर हैं. तपती गर्मी में ग्रामीणों की जिंदगी पानी के लिए संघर्ष बन गई है.

पथरीले रास्ते, नंगे पांव 4 KM दूर कुएं से पानी लाने को मजबूर महिलाएं... मध्य प्रदेश में मजाक बनकर रह गई PM Modi की ‘हर घर जल योजना’!
Image Source: Screengrab
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘हर घर जल’ का सपना जल जीवन मिशन के जरिए देश के हर ग्रामीण परिवार तक साफ और पर्याप्त पेयजल पहुंचाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. इस योजना के तहत अब तक 15.8 करोड़ से ज्यादा ग्रामीण घरों तक नल से पानी पहुंचाया जा चुका है. लेकिन आज भी देश के कई ऐसे इलाके हैं, जहां प्रशासनिक लापरवाही और बदहाल व्यवस्था के कारण लोगों को इस योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा. ऐसा ही दर्दनाक मामला मध्य प्रदेश के मुरैना जिले से सामने आया है. यहां के आदिवासी गांवों में पानी आज भी किसी सुविधा का नहीं, बल्कि रोज की जंग का दूसरा नाम बन चुका है. गांव की महिलाएं सुबह सूरज निकलने से पहले सिर पर मटके रखकर घरों से निकल पड़ती हैं, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि अगर देर हो गई, तो शायद परिवार के हिस्से का पानी भी न मिल पाए.

सूखे नलों ने बढ़ाई गांव वालों की मुश्किलें

दरअसल, जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर सबलगढ़ ब्लॉक के आदिवासी गांव बहेड़ी में हालात इतने खराब हैं कि गांव के सूखे पड़े नल अब लोगों का मजाक उड़ाते नजर आते हैं. सरकार की बहुप्रचारित नलजल योजना महीनों से बंद पड़ी है. गांव में पानी की एक बूंद तक नहीं पहुंच रही. ऐसे में महिलाएं, बुजुर्ग और छोटे-छोटे बच्चे करीब चार किलोमीटर पैदल चलकर दूसरे इलाके के कुएं से पानी लाने को मजबूर हैं. तपती धूप, पथरीले रास्ते और सिर पर भारी मटके... यही यहां की रोजमर्रा की जिंदगी बन चुकी है.

महिलाओं और बच्चों का दर्द सबसे ज्यादा

सबसे ज्यादा दर्द उन महिलाओं का है, जिनका पूरा दिन सिर्फ पानी जुटाने में बीत जाता है. सुबह घर का काम छोड़कर निकलो, घंटों लाइन में लगो, फिर भारी मटकों के साथ वापस लौटो. कई महिलाएं बताती हैं कि अब उनके शरीर ने जवाब देना शुरू कर दिया है, लेकिन मजबूरी ऐसी है कि रुक भी नहीं सकतीं. गांव के छोटे बच्चे भी हाथों में डिब्बे और बाल्टियां लेकर अपनी मां के साथ पानी भरने जाते हैं. पानी की तलाश ने उनकी बचपन की हंसी और पढ़ाई दोनों छीन ली है.

बारिश में और बढ़ जाती हैं मुश्किलें

बारिश के दिनों में हालात और भयावह हो जाते हैं. जिस रास्ते से महिलाएं कुएं तक पहुंचती हैं, वही रास्ता पानी भर जाने से बंद हो जाता है. तब गांव में प्यास और डर दोनों बढ़ जाते हैं. कई बार लोग बूंद-बूंद पानी के लिए आपस में झगड़ पड़ते हैं. पंचायत कभी-कभी टैंकर भेजती भी है, लेकिन पानी इतना कम होता है कि वहां अफरा-तफरी मच जाती है. हालात बिगड़ने के डर से कई बार टैंकर भेजना भी बंद कर दिया जाता है.

प्रशासन की लापरवाही पर उठ रहे सवाल

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ग्रामीणों का दर्द सिर्फ पानी की कमी नहीं, बल्कि प्रशासन की बेरुखी भी है. उनका कहना है कि हर साल गर्मी में यही संकट खड़ा हो जाता है, लेकिन अधिकारी सिर्फ आश्वासन देकर चले जाते हैं. गांव में न तो कोई स्थायी जलस्रोत बनाया गया और न ही बंद पड़ी नलजल योजना को दोबारा शुरू कराया गया. सवाल यह है कि आखिर आदिवासी गांवों की प्यास कब बुझाई जाएगी? क्या विकास सिर्फ कागजों और भाषणों तक सीमित रहेगा, या फिर इन गांवों तक भी बुनियादी सुविधाएं पहुंचेंगी? क्योंकि इन गांवों की सूखी जमीन और खाली मटके अब खुद सरकार से जवाब मांग रहे हैं.

बताते चलें कि आज भी मुरैना के आदिवासी गांवों की ये तस्वीरें यही सवाल खड़ा कर रही हैं कि आखिर विकास की योजनाएं जमीन तक कब पहुंचेंगी. जब महिलाएं और बच्चे रोज कई किलोमीटर चलकर पानी लाने को मजबूर हों, तब सिर्फ सरकारी दावे लोगों की प्यास नहीं बुझा सकते. जरूरत अब कागजी योजनाओं की नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई की है, ताकि हर घर तक सच में पानी पहुंच सके.

मुरैना से सन्तोष शर्मा की रिपोर्ट.

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