डॉक्टर श्याम झंवर: एंब्रियो ट्रांसफर तकनीक से गिर नस्ल को ऊंचाइयों पर ले जाने वाले जादूगर! एक गाय से साल में पैदा किए 100 बच्चे
डॉक्टर झंवर देश के प्रख्यात एंब्रियो ट्रांसफ़र एवं रिप्रोडक्टिव बायोटेक्नोलॉजी विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने आधुनिक तकनीकों के माध्यम से भारतीय गायों, विशेषकर गिर नस्ल की ब्रीडिंग वैल्यू और दुग्ध उत्पादन क्षमता को अभूतपूर्व स्तर तक पहुंचाया है.
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भारतीय पशुपालन और डेयरी क्षेत्र में देसी नस्लों के वैज्ञानिक संवर्धन का कार्य जिन चुनिंदा विशेषज्ञों ने किया है, उनमें डॉक्टर श्याम झंवर का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है. डॉक्टर झंवर देश के प्रख्यात एंब्रियो ट्रांसफ़र एवं रिप्रोडक्टिव बायोटेक्नोलॉजी विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने आधुनिक तकनीकों के माध्यम से भारतीय गायों, विशेषकर गिर नस्ल की ब्रीडिंग वैल्यू और दुग्ध उत्पादन क्षमता को अभूतपूर्व स्तर तक पहुंचाया है.
शैक्षणिक पृष्ठभूमि और वैज्ञानिक दृष्टि
डॉ. श्याम झंवर ने वर्ष 1972 में बॉम्बे वेटनरी कॉलेज से वेटनरी साइंस में ग्रेजुएशन की उपाधि प्राप्त की. इसके बाद 1974 में गायनोकोलॉजी और एनिमल रिप्रोडक्शन में मास्टर डिग्री पूरी की. प्रारंभ से ही उनका उद्देश्य केवल अकादमिक ज्ञान तक सीमित न रहकर, वैज्ञानिक तकनीकों को ज़मीन पर किसानों के हित में लागू करना रहा.
रेमंड ग्रुप के साथ 47 वर्षों का उल्लेखनीय सफ़र
वर्ष 1975 में डॉक्टर झंवर ने रेमंड ग्रुप की एनिमल विंग से अपने प्रोफेशनल करियर की शुरुआत की. अगले 47 वर्षों (1975–2021) तक वे रेमंड से जुड़े रहे और यहीं से सेवानिवृत्त हुए. इस लंबे कार्यकाल के दौरान उन्होंने पशु प्रजनन, नस्ल सुधार और डेयरी विकास से जुड़े कई राष्ट्रीय स्तर के प्रोजेक्ट्स में निर्णायक भूमिका निभाई.
जेके ट्रस्ट ग्राम विकास योजना और ग्रामीण भारत में प्रभाव
रेमंड ग्रुप की सामाजिक पहल जेके ट्रस्ट ग्राम विकास योजना के अंतर्गत डॉ. श्याम झंवर ने वर्ष 2012 से 2021 तक सीईओ के रूप में कार्य किया. इस अवधि में उनके नेतृत्व और प्रत्यक्ष सुपरविजन में 60 से अधिक गाँवों में आर्टिफ़िशियल इंसेमिनेशन (AI) कार्यक्रम सफलतापूर्वक संचालित किया गया. यह कार्य 36 ज़िलों और 11 राज्यों तक फैला हुआ था, जिससे पशुपालकों को बेहतर नस्ल, अधिक दुग्ध उत्पादन और स्थायी आय के अवसर प्राप्त हुए.
एंब्रियो ट्रांसफ़र में देश की पहली पीएचडी
डॉ. श्याम झंवर को भारत में एंब्रियो ट्रांसफ़र टेक्नोलॉजी पर पहली पीएचडी प्राप्त करने का गौरव हासिल है. उनका यह शोध भेड़, बकरी और ऊँट (कैमल) पर केंद्रित था. इसके बाद उन्होंने गाय, घोड़े और लद्दाख क्षेत्र में याक पर भी सफलतापूर्वक कार्य किया, जिससे वे पशु प्रजनन के बहुआयामी विशेषज्ञ बने.
इन-विवो से IVF तक तकनीकी विकास
प्रारंभिक दौर में डॉ. झंवर इन-विवो एंब्रियो ट्रांसफ़र तकनीक के माध्यम से कार्य करते थे. विज्ञान में हो रहे नवाचारों को अपनाते हुए उन्होंने वर्ष 2016 से IVF (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक पर काम शुरू किया. इस तकनीक ने पशु प्रजनन में गुणात्मक और मात्रात्मक—दोनों स्तरों पर क्रांतिकारी बदलाव संभव किए.
“श्याम IVF” और गिर नस्ल पर ऐतिहासिक कार्य
वर्ष 2021 में, अपने मित्र प्रकाश बाफना के साथ मिलकर डॉ. श्याम झंवर ने पुणे के पास “श्याम IVF” नामक अत्याधुनिक एंब्रियो लैबोरेटरी की स्थापना की. इस लैब के माध्यम से उन्होंने विशेष रूप से गिर नस्ल की गायों की जेनेटिक गुणवत्ता और ब्रीडिंग वैल्यू बढ़ाने पर केंद्रित कार्यक्रम शुरू किया.
अपनी विशेषज्ञता और एंब्रियो प्रोग्राम के माध्यम से डॉ. झंवर ने ऐसी उत्कृष्ट गिर नस्ल की गायें तैयार की हैं, जिन्होंने पहले ही ब्यात में 3500 लीटर तक दूध देने का रिकॉर्ड बनाया है. यह उपलब्धि देसी नस्लों की क्षमता को वैज्ञानिक दृष्टि से प्रमाणित करती है और भारतीय डेयरी सेक्टर के लिए मील का पत्थर मानी जाती है.
हर किसान के घर तक श्रेष्ठ गिर गाय का सपना
डॉ. श्याम झंवर का लक्ष्य केवल रिकॉर्ड बनाना नहीं है, बल्कि वे अब ऐसे सस्टेनेबल एंब्रियो प्रोग्राम पर काम कर रहे हैं, जिसके माध्यम से हर किसान के घर में अच्छी ब्रीडिंग वैल्यू वाली गिर गाय पहुँचे. उनका मानना है कि यदि सही तकनीक, सही चयन और वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाया जाए, तो देसी नस्लें न केवल किसानों की आय बढ़ा सकती हैं, बल्कि देश की दुग्ध आत्मनिर्भरता में भी निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं.
निष्कर्ष
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डॉ. श्याम झंवर का जीवन और कार्य इस बात का प्रमाण है कि जब विज्ञान, अनुभव और सामाजिक उद्देश्य एक साथ आते हैं, तो भारतीय पशुपालन में असाधारण परिवर्तन संभव है. देसी नस्लों का संरक्षण, संवर्धन और किसानों को सशक्त बनाना- यही उनके कार्यों की आत्मा है. आज भी वे भारतीय डेयरी और पशुपालन क्षेत्र के लिए प्रेरणा, मार्गदर्शन और नवाचार का मजबूत स्तंभ बने हुए हैं.
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