क्या बागी गुट ने छोड़ दिया असली TMC होने का दावा? 3 साल पुरानी, जमीन पर खत्म NCPI में विलय के पीछे का असली खेल समझिए!
TMC के बागी गुट ने त्रिपुरा में लगभग निष्क्रिय मानी जानी वाली NCPI में 20 सांसदों के साथ विलय कर लिया. ऐसे में वे कौन सी प्रमुख वजहें हैं जिनकी वजह से बागी सांसद टीएमसी पर कब्जा करने के बजाय नई पार्टी में शामिल हुए, जान लीजिए.
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लोकसभा में बहुमत होने के बावजूद तृणमूल कांग्रेस की संसदीय पार्टी पर कब्जा करने की कोशिश करने के बजाय, बागी सांसदों ने त्रिपुरा स्थित 'नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) में शामिल होने का फैसला किया है. कई दिनों से असली-नकली टीएमसी होने का दावा करने वाले बागी गुट के NCPI में मर्जर का फैसला राजनीतिक हलकों से लेकर आम लोगों तक को चौंका गया. बड़ा सवाल ये उठता है कि आखिर राजनीतिक रूप से लगभग निष्क्रिय मानी जानी वाली NCPI में ही क्यों मर्ज किया गया? इसके पीछे की 3 वजहे मुख्य रूप से सामने आ रही हैं.
TMC के बागी गुट ने NCPI में ही क्यों किया विलय?
पहला ये कि इस गुट को बीजेपी अपने साथ लेने को तैयार नहीं है, लेकिन समर्थन चाहिए. दूसरी ये कि जुलाई में संसद के सत्र से पहले दल-बदल कानून से बचने के लिए इनका दो तिहाई बहुमत/संख्या होने की स्थिति में पहले से रजिस्टर्ड पार्टी में मर्ज कर जाना. तीसरी ये कि ये एक तात्कालिक अरेंजमेंट है, जब तक कि TMC पर कब्जे की लड़ाई कानूनी और चुनाव आयोग के जरिए सेटल नहीं हो जाता. यहां बता देना जरूरी है कि बागी गुट ने TMC पर अपना दावा नहीं छोड़ा है, बस प्लान में तब्दीली की गई है.
Delhi: Rebel TMC MPs meet Lok Sabha Speaker Om Birla. pic.twitter.com/l93ZblPVyE
— IANS (@ians_india) June 14, 2026
NCPI का क्या है बंगाल से कनेक्शन?
जहां तक 'नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया' (NCPI) के बंगाल कनेक्शन की बात है तो वो सिर्फ एक है कि, इसका हावड़ा में भी ऑफिस है, जिसकी सुरक्षा अब बढ़ा दी गई है, पुलिस बल की तैनाती कर दी गई है. दिलचस्प बात यह है कि हावड़ा के संकराइल में रजिस्टर्ड त्रिपुरा की 6 साल पुरानी यह पार्टी, जिसे कि 2023 के विधानसभा में महज 822 वोट मिले, जिस राज्य में कुल संसदीय सीट ही 2 हो, उस पार्टी के अब 20 सांसद हो गए हैं, जो अब NDA को बाहर से सपोर्ट देगी. लोकसभा में TDP के 16 और JD(U) के 12 सांसद से भी बड़ी पार्टी बन गई है NCPI, जहां तक NDA में सांसदों की संख्या के लिहाज से बात है तो.
NCPI का क्या है राजनीतिक वजूद?
2023 में बनी इस पार्टी का चुनाव चिह्न सात किरणों वाली पेन की निब है. त्रिपुरा के अलावा मेघालय में इसकी मौजूदगी है, लेकिन बेहद सीमित. हालांकि, यह कभी भी ज़्यादा लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाई और इसे बड़ी पार्टियों के साथ-साथ TIPRA और IPFT जैसे क्षेत्रीय दलों से भी नकारा है. त्रिपुरा में शांतनु साहा पार्टी का कामकाज संभालते हैं, जबकि हावड़ा के तरुण कुमार रॉय कथित तौर पर इसके कामकाज में शामिल हैं. 2023 के त्रिपुरा चुनावों में NCPI ने तीन उम्मीदवार उतारे थे, ऊनाकोटी जिले के कैलाशहर से जहांगीर अली, चावमानु से बरजेदा त्रिपुरा और अंबासा से कृष्ण कुमार देबबर्मा. हालांकि फिर भी ये पार्टी जमीनी रूप से शुन्य ही रही.
NCPI में विलय के बावजदू TMC पर दावा करेगा बागी गुट!
जहां तक NCPI में विलय का सवाल है तो इस संबंध में बागी गुट में शामिल ममता के पूर्व करीबी वरिष्ठ सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा कि विलय का रास्ता 'दल-बदल विरोधी कानून' से बचाव और उपाय के तहत चुना गया. इस कानून के अनुसार विलय तभी संभव है जब किसी विधायी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाते हैं. बागी गुट के पास 20 सांसद हैं, जो TMC के 28 सदस्यों वाले लोकसभा दल के लिए ज़रूरी दो-तिहाई संख्या से एक ज़्यादा है.
हालांकि बंद्योपाध्याय ने स्पष्ट कर दिया बागी गुट ने "असली तृणमूल" होने का दावा करने की अपनी योजना नहीं छोड़ी है. NCPI में विलय एक अस्थायी व्यवस्था है या हो सकती है. उन्होंने आगे कहा कि यह एक मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय पार्टी है. हमने इसमें विलय कर लिया है. जब पार्टी के दो-तिहाई सदस्य अलग हो जाते हैं, तो आप पहले ही दिन पार्टी के नाम पर दावा नहीं कर सकते. जब जुलाई में संसद का सत्र शुरू होगा, तो दूसरा गुट तृणमूल के तौर पर आएगा और हम TMC की पहचान के लिए दावा करेंगे. मेरे अनुभव के अनुसार, तृणमूल के चुनाव चिह्न को फ्रीज़ किया जा सकता है." उन्होंने आगे कहा कि "असली TMC" कौन है, इसका फैसला आखिरकार कानूनी और संवैधानिक प्रक्रियाओं के ज़रिए ही होगा.
NCPI में विलय को मजबूर हुआ बागी गुट!
वहीं बागी गुट के NCPI में विलय को लेकर राजनीतिक जानकारों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि उनकी रणनीति बदलने के पीछे दो प्रमुख कारण रहे होंगे. पहला कारण ये कि पार्टी के संविधान का स्वरूप है, जैसा कि उसे भारत निर्वाचन आयोग को सौंपा गया था. इसी वजह से संभवतः बागी सांसदों की वे कोशिशें नाकाम रहीं, जिनके जरिए वे लोकसभा में तृणमूल की संसदीय पार्टी पर कब्जा करना चाहते थे और बाद में पार्टी के चुनाव चिह्न तथा फंड पर दावा जताना चाहते थे.
ममता बनर्जी की आखिरी चाल से चित्त हुआ TMC का बागी गुट!
तृणमूल कांग्रेस के संविधान के अनुसार, पार्टी के भीतर निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था की पहचान पहले राज्य कार्यकारी समिति (स्टेट एग्जीक्यूटिव कमेटी) के रूप में की गई थी. हालांकि, बाद में संविधान में संशोधन के बाद राष्ट्रीय कार्यसमिति को पार्टी की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था का दर्जा दिया गया. यह समिति काफी हद तक पार्टी अध्यक्ष, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, के इर्द-गिर्द केंद्रित मानी जाती है. पार्टी के मूल और संशोधित दोनों संविधान के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस में संगठनात्मक पदाधिकारियों का प्रभाव चुने हुए जनप्रतिनिधियों, यानी सांसदों और विधायकों, की तुलना में अधिक माना जाता है.
#WATCH | Kolkata, West Bengal | Security forces deployed outside the Nationalist Citizens Party of India office in Howrah. 20 TMC Rebel MPs met Lok Sabha Speaker Om Birla yesterday and announced their merger with the party. https://t.co/cDsf8z9NBU pic.twitter.com/Ku65slOtVu
— ANI (@ANI) June 15, 2026Advertisement
TMC के संविधान ने फेरा बागी गुट के मंसूबों पर पानी!
एक राजनीतिक जानकार ने कहा, "चूंकि राष्ट्रीय कार्यसमिति और संगठन के पदाधिकारी प्रत्यक्ष रूप से ममता बनर्जी तथा अप्रत्यक्ष रूप से उनके भतीजे और पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी के प्रभाव में माने जाते हैं, इसलिए बागी सांसदों के लिए लंबे समय में तृणमूल कांग्रेस की संसदीय पार्टी, चुनाव चिह्न या पार्टी फंड पर नियंत्रण हासिल करना मुश्किल होता. यही वजह है कि बागियों ने अंतिम समय में अपनी रणनीति बदली और त्रिपुरा की एक ऐसी राजनीतिक पार्टी के साथ जुड़ गए, जिसका वास्तविक राजनीतिक प्रभाव बहुत सीमित है."
अब बंगाल से दिल्ली तक क्या होगी रणनीति?
अब सवाल यह है कि जब पश्चिम बंगाल विधानसभा में पार्टी के 80 में से 60 विधायकों के समर्थन से बहुमत वाला नया गुट बनाने की कोशिश सफल रही, तो बागी सांसदों ने लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस की संसदीय पार्टी के भीतर ऐसा ही बहुमत वाला गुट बनाने की कोशिश क्यों नहीं जारी रखी? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में विधायकों के बागी गुट के बहुमत में आने के बाद ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी ने जो रणनीति अपनाई, उसी के कारण बागी सांसद लोकसभा में वैसी रणनीति नहीं अपना सके.
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एक राजनीतिक जानकार ने बताया, "बागी गुट बनने के तुरंत बाद ममता बनर्जी ने पार्टी की सभी पुरानी आंतरिक कमेटियों और तृणमूल कांग्रेस से जुड़े जन-संगठनों की आंतरिक कमेटियों को भंग करने की घोषणा की. इसके बाद उन्होंने उन पार्टी नेताओं के साथ नई आंतरिक कमेटियां बनाने की घोषणा की, जो उनके और उनके भतीजे के प्रति वफादार बने रहे. इस तरह लोकसभा में अपनी संसदीय टीम और पश्चिम बंगाल विधानसभा में अपनी विधायी टीम पर नियंत्रण खोने के बावजूद ममता बनर्जी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति पर अपना नियंत्रण बनाए हुए हैं."