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‘इस्लाम अपनाकर पिछड़ा होने का दावा नहीं कर सकते’, हिंदू से मुस्लिम बने शख्स पर कोर्ट का बड़ा फैसला, जानें पूरा मामला

हाई कोर्ट ने साफ किया कि इस्लाम धर्म अपनाने वाला व्यक्ति केवल ‘मुस्लिम’ होगा, वह किसी विशेष पिछड़े मुस्लिम समुदाय (Backward Class Muslim) का दावा नहीं कर सकता.

‘इस्लाम अपनाकर पिछड़ा होने का दावा नहीं कर सकते’, हिंदू से मुस्लिम बने शख्स पर कोर्ट का बड़ा फैसला, जानें पूरा मामला
Image Source- IANS/Grok AI
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मद्रास हाई कोर्ट ने एक ऐसे मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. जिसमें एक शख्स ने अपना हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपना लिया था, लेकिन खुदको पिछले समुदाय से होने का दावा करते हुए आरक्षण की मांग कर रहा था. हाई कोर्ट ने साफ किया कि इस्लाम धर्म अपनाने वाला व्यक्ति केवल ‘मुस्लिम’ होगा, वह किसी विशेष पिछड़े मुस्लिम समुदाय (Backward Class Muslim) का दावा नहीं कर सकता.

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने धर्मांतरण और आरक्षण से जुड़े इस मामले में अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने धर्म परिवर्तन के बाद पिछड़ा होने के दावे को खारिज कर दिया. दरअसल, शख्स मुस्लिम बनने के बाद OBC आरक्षण की मांग कर रहा था. कोर्ट ने कहा, 

‘अगर आपने इस्लाम स्वीकार कर लिया है, तो फिर आप मुसलमान हैं, लेकिन ओबीसी के दर्जे का दावा नहीं कर सकते.’ 

क्या है पूरा मामला? 

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यह मामला तमिलनाडु के थुथुकुडी जिले का है. जहां एक हिंदू शख्स साल 2015 में इस्लाम धर्म अपना लिया था. इसके बाद उसने नाम भी बदल लिया था और खुद को ‘मुस्लिम लेब्बई’ समुदाय का बताया. शख्स को इस्लाम अपनाने का सर्टिफिकेट 2015 में सुन्नत जमात ने जारी किया था. इसके बाद उसने तहसीलदार से सामुदायिक प्रमाणपत्र मांगा, लेकिन तहसीलदार ने एप्लिकेशन रिजेक्ट कर दिया.

इसके बाद मुस्लिम अपनाने वाले शख्स ने कोर्ट का रुख किया. मद्रास हाई कोर्ट में मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस पीबी बालाजी की बेंच ने साफ कहा, 

‘आप मुसलमान हैं और बस इतनी ही बात है. इसके आगे आप कोई दावा नहीं कर सकते.’ 

जबकि शख्स का कहना था कि उन्‍हें मुस्लिम लेब्बाई जाति का प्रमाण पत्र जारी किया जाए, क्योंकि वह ओबीसी जाति से आते हैं. 

इस मामले में राज्य सरकार भी अहम पक्ष बनी. सरकार की ओर तर्क दिया गया कि 2024 के सरकारी आदेश के तहत केवल वे लोग, जो पहले से पिछड़ा वर्ग (BC), अति पिछड़ा वर्ग (MBC), विमुक्त समुदाय (DNC) या अनुसूचित जाति (SC) के तहत आरक्षण का लाभ ले रहे थे, अगर वे धर्म परिवर्तन कर इस्लाम या ईसाई बन जाते हैं तब भी उन्हें पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्षण का लाभ मिलेगा. सरकार की दलील थी कि इससे सामाजिक संतुलन प्रभावित नहीं होगा.

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कोर्ट ने क्या कहा? 

हालांकि बेंच ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया. जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस पीबी बालाजी ने कहा, 1951 में मद्रास हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि हिंदू धर्म से इस्लाम स्वीकार करने वाला व्यक्ति केवल मुस्लिम रह जाता है. उसका सामाजिक दर्जा उस जाति से तय नहीं होता, जिससे वह पहले संबंधित था. मद्रास हाई कोर्ट के इस फैसले को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वीकार किया था और साफ किया था कि धर्म बदलने के बाद शख्स को पहले वाले धर्म या जाति से जुड़ा कोई फायदा नहीं मिलेगा. 

इस्लाम में जातियों पर कोर्ट ने जताई हैरानी

कोर्ट ने इस्लाम और ईसाई धर्म के उन प्रचारकों पर भी निशाना साधा, जो कहते हैं जातिवाद केवल हिंदुओं में है. बेंच ने कहा, इस्लाम समानता और सामाजिक बराबरी का संदेश देता है. ऐसे में इस्लाम के भीतर कुछ समुदायों को पिछड़ा और कुछ को अगड़ा मानना कुरान की मूल भावना के उलट है. 

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हालांकि, कोर्ट ने ये भी कहा, ‘ऐतिहासिक कारणों से मुस्लिम समाज में विभिन्न समुदाय मौजूद हैं, लेकिन रौथर, मरक्कायर, लेब्बई या देक्कनी जैसे समुदाय जन्म से तय होते हैं, धर्म परिवर्तन से नहीं.’

बेंच ने कहा, किसी का इस्लाम स्वीकार कर लेने भर से उसे किसी विशेष मुस्लिम बिरादरी का सदस्य नहीं माना जा सकता. इसलिए केवल सरकारी आदेश के जरिए अदालत के पहले से स्थापित कानूनी सिद्धांत को बदला नहीं जा सकता. कोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित करते हुए मामले को रद्द कर दिया और याचिका का निपटारा भी कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने धर्मांतरण और आरक्षण पर क्या फैसला सुनाया था? 

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने आदेश में साफ कहा था कि ईसाई-मुस्लिम धर्म अपनाया तो SC का दर्ज खत्म हो जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन से जुड़े एक मामले में सुनवाई करते हुए कहा था, ‘अगर कोई व्यक्ति अनुसूचित जाति (एससी) से संबंधित है और वह हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो उसे अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं मिलेगा. क्योंकि संविधान में ये दर्जा केवल हिंदू-सिख और बौद्ध को ही दिया गया है.’

यह भी पढ़ें- ‘माहौल बिगाड़ रहे…’ सीनियर वकीलों पर बिफरे चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जानें, पूर्व जज से जुड़ा क्या है पूरा मामला

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यह फैसला जस्टिस पी. के. मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने सुनाया था. अदालत ने कहा था कि अनुसूचित जाति का दर्जा भारतीय संविधान के तहत केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों तक सीमित है. ऐसे में अगर कोई व्यक्ति ईसाई या किसी अन्य धर्म को अपनाता है और उसका सक्रिय रूप से पालन करता है, तो वह एससी श्रेणी के लाभों का हकदार नहीं रहेगा. 

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टिप्पणियाँ 1
G
Guest (अतिथि)
H
Harish kevat
3 weeks ago

Hc & sc good take good descision islam sislam h

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