बांकीपुर में हारी BJP, लेकिन सदमे में लालू परिवार, असली ‘खेला’ तो तेजस्वी के साथ हो गया, जानें कैसे
बिहार की बांकीपुर सीट पर 31 साल के बीजेपी के गढ़ का अंत होने में 3 महीने भी नहीं लगे. पीके की यहां से जीत सत्ताधारी बीजेपी से ज्यादा तेजस्वी यादव के लिए परेशानियां पैदा करेगा. क्योंकि जब प्रशांत किशोर बोलेंगे तो विपक्ष की आवाज़ बनेंगे और बिहार सुनेगा, जैसे ओवैसी और चंद्रशेखर .
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बांकीपुर, ये वो विधानसभा सीट है, जिसे बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन का गढ़ माना जाता था. यहां से उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा विधायक रहे और फिर साल 2010 से लगातार चार बार और एक बार उपचुनाव मिलाकर कुल पांच बार नबीन ने जीत का भगवा लहराया, लेकिन इसके बावजूद नितिन नबीन के अध्यक्ष बनने के बाद जब उपचुनाव हुआ तो बीजेपी को बांकीपुर में करारी हार का सामना करना पड़ा. एक झटके में जन सुराज पार्टी वाले प्रशांत किशोर ने बीजेपी से बांकीपुर सीट छीन ली. यानी कि 31 साल के बीजेपी के गढ़ का अंत होने में 3 महीने भी नहीं लगे.
बांकीपुर में 31 साल के बीजेपी के गढ़ का अंत 3 महीने में!
आपको बता दें कि बांकीपुर में बीजेपी ऐसे समय चुनाव हारी जब सत्ता सीधे तौर पर बीजेपी के हाथ में है. मुख्यमंत्री भी बीजेपी का है. यहां तक कि जिस पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र में ये सीट आती है वो सीट भी साल 2009 से बीजेपी के पास ही है, लेकिन इसके बावजूद बीजेपी चुनाव हार गई. इतना ही नहीं किसी भी उपचुनाव में जीत की संभावना जिसकी सरकार होती है, उसकी होती है.
इसीलिए बिहार से लेकर दिल्ली तक हाहाकार मचा हुआ है. बवाल इसलिए भी मचा है क्योंकि इस सीट पर जातिगत समीकरण भी बीजेपी के पक्ष में थे, कायस्थ, बनिया और फॉरवार्ड वोट भी बहुत है. यानी कि ये हार अपनों से हुई है. अपने कैडर वोट ने मुँह फेरा है. उन्होंने पीके को वोट दिया जो दशकों से बीजेपी को वोट देते आए, किसी भी परिस्थिति में किसी दूसरी पार्टी के साथ नहीं गए. यानी कि आपके प्रतिद्वंदी वोट ना दें समझ आता है, आपके अपने ही आप से मुँह मोड़ लें, ये एक तरह से खतरे की घंटी है. इसलिए वाकई ये हार कोई छोटी हार नहीं, बहुत बड़ी हार है और इसके लिए बीजेपी आलाकमान को बिहार के नेताओं से जवाबदेही भी तय करनी चाहिए, लेकिन बीजेपी की ये हार सिर्फ बीजेपी की नहीं है.
इस हार से कहीं ना कहीं लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव को भी बड़ा झटका लगा होगा क्योंकि ये बात तो आप भी जानते हैं कि बिहार में असली टक्कर बीजेपी, जेडीयू और आरजेडी के बीच ही होती रही है. बीजेपी और जेडीयू तो फिलहाल एक साथ हैं और तेजस्वी यादव विपक्ष में बैठ कर सत्ता से सवाल पूछते हैं, जिन्हें बिहार ही नहीं पूरे देश में सुना जाता है, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा. पता है क्यों? क्योंकि बिहार विधानसभा में अब प्रशांत किशोर की एंट्री हो गई है.
2025 के विधानसभा चुनाव में भले ही पीके की पार्टी को एक भी सीट ना मिली हो, लेकिन बांकीपुर जीत कर प्रशांत किशोर ने पार्टी का खाता भी खोल दिया और खुद विधानसभा भी पहुंच गये, जिससे बीजेपी से ज्यादा कहीं ना कहीं तेजस्वी यादव और उनकी पार्टी टेंशन में होगी, क्योंकि अब विधानसभा में विपक्ष की आवाज सिर्फ तेजस्वी तक ही सीमित नहीं रहेगी, अब प्रशांत किशोर भी बोलेंगे और उनकी आवाज भी बिहार ही नहीं पूरा देश सुनेगा क्योंकि तेजस्वी यादव से ज्यादा लोकप्रिय नेता प्रशांत किशोर को माना जाता है, जिन्हें लोग चुनावी रणनीतिकार के रूप में ज्यादा जानते थे, लेकिन अब वो माननीय विधायक बनकर सत्ता से सवाल पूछेंगे.
तेजस्वी और पीके, कौन-किस पर भाड़ी पड़ेगा?
तेजस्वी और पीके की लोकप्रियता की तुलना इसलिए भी बनती है क्योंकि तेजस्वी को सियासी जनाधार और गद्दी विरासत में मिली है. उन्होंने राजनीति के दाँव-पेंच और ककहरा अपने पिता, बिहार की राजनीति के पितामह माने जाने वाले लालू यादव से सीखी. उन्हें बचपन से माहौल ऐसा मिला ताकि उनकी ग्रूमिंग सत्ता संभालने वाले नेता के रूप में हो. इतना ही नहीं लालू के गढ़े MY यानी कि मुस्लिम यादव समीकरण वोट भी बिना किसी मेहनत के मिल गए. ऐसे में उनका बड़ा नेता बनना उतनी बड़ी बात नहीं है, जितनी की पीके की.
पीके को एक चुनावनी रणनीतिकार के तौर पर जाना जाता था. जिनकी पहचान पीएम मोदी के 2014 के चुनावी कैंपेन को लीड करने से बनी. जिसके बाद उन्होंने कई राज्यों में, कई पार्टियों के चुनाव कैंपेन को संभाला. इसके बाद उन्होंने कांग्रेस-जेडीयू में अपने लिए ज़मीन तलाशी, लेकिन सफलता नहीं मिली. ऐसे में उन्होंने जमीनी मेहनत की राह चुनी और जन सुराज अभियान के माध्यम से पूरे बिहार का दौरा किया और गाँव-गांव ख़ाक छाना और अपने लिए माहौल बनाया. पीके बोलते भी अच्छा हैं, नपा-तुला बोलते हैं, यूथ कनेक्ट करता है, लेकिन किसी विशेष, मज़बूत सियासी जानाधार वाली जाति से नहीं आने के कारण उन्हें चुनावी सफलता नहीं मिली. ऐसे में बांकीपुर की जीत उनके लिए एक संजीवनी जैसी है.
पीके के लिए व्यक्तिगत रूप से कितनी बड़ी है बांकीपुर की जीत?
पीके की जीत ठीक उसी तरह की है जैसे अटल बिहारी वाजपेयी की एक वोट से सरकार गिरने से ज्यादा लोग उनके उस ऐतिहासिक भाषण को करते हैं जिसमें उन्होंने कहा था अगर सरकार बचाने के लिए उन्हें ख़रीद-फरोख्त का सहारा लेना पड़े तो वो ऐसी सरकार को चीमटे से भी छूना नहीं पसंद करेंगे. उन्होंने कहा था कि पार्टियां आएंगी-जाएंगी, लेकिन ये देश रहना चाहिए, इसका लोकतंत्र अमर रहना चाहिए.
अटल जी जैसी पीके की रणनीति!
अटल जी जानते थे कि उनके पास बहुमत नहीं है, फिर भी उन्होंने राष्ट्रपति के आमंत्रण को स्वीकार किया और सरकार बनाने का प्रयास किया और इस्तीफा संसद के पटल से विश्वास मत की चर्चा के दौरान दिया. ऐसा उन्होंने इसलिए किया था क्योंकि वो जानते थे संसद की कार्यवाही का प्रसारण हो रहा है. देश की नज़र संसद पर है, ऐसे में उन्हें सीधे देश से-देश के समक्ष अपनी बात रखने का मौका है. देश को बताने का मौका है कि उनमें और दूसरी पार्टियों में कितना अंतर है. इसी का फायदा उन्हें मिला और अगले दो चुनावों के अंदर वो जीते और पूरे पाँच साल सफलतापूर्वक सरकार चलाने वाले देश के पहले ग़ैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने. यानी इस दौरान किए कार्यों की बदौलत बीजेपी आज सत्ता भोग रही है.
ठीक ऐसी ही स्थिति पीके पास है. उनके पास राजनीतिक विरासत नहीं है तो राजनीतिक बैगेज भी नहीं है. ऐसे में उन्हें एक विधायक के रूप में मिले मौके को भुनाना होगा. कौन जानता है आने वाले दिनों में वो राज्य के मुख्य विपक्षी चेहरे के तौर पर नज़र आएं. और यही बात लालू परिवार को खाए जा रही है.
BJP की जीत से टेंशन में तेजस्वी !
बांकीपुर में बीजेपी की हार से ज्यादा RJD की हार की कितनी चर्चा हो रही है...ये बात इसी से समझ सकते हैं कि बीबीसी हिंदी ने जब बीजेपी की जीत के बाद आरजेडी के अंदर क्या चल रहा है. इस सवाल की तहकीकात की तो पता चला. RJD के ही एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि आरजेडी का कोर वोटर पीके के साथ गया है, अगर वो नहीं जाता तो सीट बीजेपी जीतती, पीके की जीत से आरजेडी विपक्ष की भूमिका में सदन में तो रहेगी लेकिन पब्लिक परसेप्शन में मुख्य विपक्षी पीके ही होगा, पार्टी एक बार ढलान पर गई तो सभांलने की स्थिति नहीं रहेगी.
बांकीपुर उपचुनाव में असली मुकाबला बीजेपी और आरजेडी में माना जा रहा था, लेकिन प्रशांत किशोर ने मैदान में उतर कर बीजेपी ही नहीं आरजेडी का भी खेल बिगाड़ दिया… बीजेपी तो फिर भी सत्ता में है… लेकिन विपक्ष में बंटवारा हो गया… क्योंकि अब विपक्ष का क्रेडिट तेजस्वी तक ही सीमित नहीं होगा, प्रशांत किशोर तक भी जाएगा. बिल्कुल उसी तरह से, जैसे लोकसभा में चंद्रशेखर और असदुद्दीन ओवैसी जैसे सांसद अपनी अपनी पार्टी के इकलौते सांसद हैं, लेकिन इसके बावजूद जब वो बोलते हैं तो लोग सुनते हैं.
जब चुनाव था तब विदेश घूम रहे थे तेजस्वी !
बांकीपुर में जब उपचुनाव हो रहा था… तब पार्टी के लिए चुनावी रणनीति तैयार करने की बजाए तेजस्वी यादव विदेश घूम रहे थे… यहां तक कि 5 जुलाई को RJD के स्थापना दिवस के दिन भी पार्टी दफ्तर में ना लालू यादव नजर आए… ना ही तेजस्वी यादव आए… बेचारे कार्यकर्ताओं ने अकेले ही स्थापना दिवस मनाया… इसी बात से समझ सकते हैं… बांकीपुर में आरजेडी की हार कोई चौंकाने वाली हार नहीं है… यही वजह है कि लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने भी तेजस्वी यादव पर तंज मारते हुए लिखा, ‘बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे से ये फिर से साबित हो गया कि जीत उसकी जरूर होती है जो लगातार लड़ता है, जनता से जिसका लगातार जुड़ाव होता है, जो कार्यकर्ताओं और समर्थकों का सम्मान करता है और उनके साथ संपर्क व संवाद कायम रखता है.’
क्या विधानसभा में घटेगा तेजस्वी यादव का कद?
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RJD की ये हार कोई छोटी मोटी हार नहीं है. प्रशांत किशोर के जीतने के बाद विधानसभा में तेजस्वी यादव का कद भी घट जाएगा. और हो सकता है कि आने वाले दिनों में सत्ता धारी बीजेपी भी एक रणनीति के तहत तेजस्वी से ज्यादा प्रशांत किशोर को महत्व दे, क्योंकि बीजेपी भी कहीं ना कहीं ये बात जानती होगी कि भविष्य में जरूरत पड़ने पर तेजस्वी यादव को साधना भले ही मुश्किल हो, लेकिन प्रशांत किशोर को साधना मुश्किल नहीं होगा, क्योंकि ये वही प्रशांत किशोर हैं जिन्होंने साल 2014 में नरेंद्र मोदी को पहली बार प्रधानमंत्री बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी. वैसे आपको क्या लगता है. प्रशांत किशोर की इस जीत के बाद क्या RJD की हालत भी वही हो जाएगी, जो आज कांग्रेस की है.