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‘भारत कतई नहीं झुकेगा…’, हिंदुस्तान को झुकाने का ट्रंप का ख्वाब, US एक्सपर्ट ने किया चकनाचूर, बता दिया मोदी क्या करेंगे

भारत पर 100% टैरिफ-पेनाल्टी ठोक कर झुकाने का ख़्वाब देखने वाले ट्रंप को अमेरिकी एक्सपर्ट इवान ए. फीगेनबाम को तगड़ा सुनाया है. उन्होंने साफ़ कर दिया कि भारत कम से कम अमेरिका के दबाव में तो झुकेगा नहीं, रूस का साथ नहीं छोड़ेगा.

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17 Sep 2026
( Updated: 17 Sep 2026
03:36 PM )
‘भारत कतई नहीं झुकेगा…’, हिंदुस्तान को झुकाने का ट्रंप का ख्वाब, US एक्सपर्ट ने किया चकनाचूर, बता दिया मोदी क्या करेंगे
Image Source-X @Evan A. Feigenbaum/ IANS
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अमेरिकी कांग्रेस से रूसी तेल के आयात और ख़रीद को लेकर पारित बिल के बाद भारत-अमेरिकी संबंधों में तनाव के आसार पैदा हो गए हैं. भारत के विदेश मंत्रालय ने साफ़ कर दिया है कि वो अपनी उर्जा जरूरतों पूरा करने के लिए विभिन्न जगहों से., जहां से बाज़ार और तात्कालिक परिस्थिति इजाज़त देंगे, वहां से पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध है. इसी बीच अमेरिकी सीनेटर की ओर से भारत के लिए प्रयोग किए गए अपमानजनक लहजे पर कूटनीति, इकोनॉमी के जानकार और कई यूएस प्रशासन में काम कर चुके एक्सपर्ट इवान ए. फीगेनबाम ने तगड़ा जवाब दिया है और कहा है कि भारत के इतिहास और व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि अमेरिकी की इसी हरकत को भारतीय पसंद नहीं करते हैं और अमेरिकी दबाव में तो कम से कम अब भारतीय किसी क़ीमत पर नहीं झुकेंगे.

'अपनी नाकामी के लिए भारत को दोषी ठहराने की कोशिश'

सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर सीनेटर ब्लूमेनथल के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि “चूंकि यहां भारत पर उंगली उठाई जा रही है, इसलिए मैं वही बात फिर से कहूँगा जो मैंने पिछले साल कई बार कही थी, जब पीटर नवारो ने बेतुके (और गलत) ढंग से यूक्रेन युद्ध को "मोदी का युद्ध" (Modi's War) कहा था…असलियत यह है कि भारत इस युद्ध को अपनी वजह से पैदा हुई समस्या नहीं मानता. इसलिए, अमेरिका की इस बात को नई दिल्ली में सीधे दबाव, भारत की विदेश नीति में भारी दखलंदाज़ी, भारत की आर्थिक ज़रूरतों के हिसाब से अव्यावहारिक (वैसे भी भारत रूस से तेल की खरीद कम कर रहा है) और पश्चिम (और ट्रंप) की उस सामूहिक नाकामी के लिए "भारत को दोषी ठहराने" की एक चालाक कोशिश के तौर पर देखा जाता है, जिसमें वे मॉस्को (रूस) को यूक्रेन पर युद्ध रोकने के लिए तैयार करने या मनाने में फेल रहे.”

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भारत को चीन की ही कैटेगरी में डालना गलत: इवान

इवान ने अमेरिकी कांग्रेस से 100% टैरिफ़ वाले बिल पारित होने और अमेरिकी सीनेटर्स की ओर से भारत पर की जा रही टिप्पणी के संदर्भ में कहा कि रणनीतिक नज़रिए से देखें तो, अगर आप अमेरिका-भारत संबंधों को अहमियत देते हैं, तो यह अमेरिका के लिए किसी भी तरीके से कोई फायदेमंद बात नहीं होगी. इतना ही नहीं उन्होंने आगे कहा कि  भारत को चीन के साथ एक ही श्रेणी में रखना भी सही नहीं है.

'25 सालों की कोशिशों पर पानी फिर गया'

मोटे तौर पर कहें तो, पिछले डेढ़ साल में अमेरिका-भारत संबंधों को बनाने के लिए 25 सालों से चली आ रही दोनों पार्टियों की कोशिशों (जिसमें ट्रंप का पहला कार्यकाल भी शामिल है) पर पानी फिर गया है. हमने उस रिश्ते को फिर से राजनीतिक रंग दे दिया है जो नई दिल्ली और वॉशिंगटन दोनों जगह राजनीति से ऊपर उठकर बना था. और अब तक हमने तीसरे देशों के साथ अपने संबंधों को लेकर एक-दूसरे की आपत्तियों को इस तरह से अपने आपसी संबंधों पर असर नहीं डालने दिया था. मैंने इसे खुद महसूस किया है, जैसे कि जब मैंने राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के कार्यकाल में अमेरिका-भारत संबंधों पर काम किया था, जिसमें सिविल न्यूक्लियर डील में मेरी गहरी भागीदारी थी.

'जो समस्याएं दबी हैं, बाहर आने वाली हैं'

उन्होंने अमेरिका को आने वाले दिनों में आने वाली कूटनीतिक और द्विपक्षीय रिश्तों में तनाव की चेतावनी देते हुए कहा कि इस समय, यह अमेरिका-भारत संबंधों में सबसे बड़ी समस्या भी नहीं है, लेकिन यह कई दबी हुई समस्याओं को और हवा देती है. 

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'अमेरिकी दबाव में भारत, रूस से अपने ऐतिहासिक संबंध नहीं तोड़ेगा'

इवन ने ब्रिक्स समिट के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और पीएम मोदी की हुई कई बार की मुलाक़ात का हवाला देते हुए कहा कि पुतिन पिछले हफ़्ते ही नई दिल्ली में थे. और उससे पहले वाले हफ़्ते, बिश्केक में एक समिट के दौरान पुतिन और मोदी एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे. इसलिए मुझे नहीं लगता कि भारत सरकार रूसी तेल से जुड़ा कोई साफ़ वादा करेगी. रूस के साथ भारत के गहरे ऐतिहासिक और भावनात्मक संबंध हैं, जिन्हें वह सिर्फ़ अमेरिकी दबाव में आकर नहीं छोड़ेगा.

अमेरिकी दबाव से निपटना भारत की विदेश नीति की सर्वोच्च प्राथमिकता!

उन्होंने भारत के तेल खरीदने के स्टैंड कि ‘वो चाहे तो रूसी तेल खरीद "सकता" है - एक तरह का ‘सांकेतिक बचाव’ करार दिया. उन्होंने आगे कहा कि यह भारत की विदेश नीति की आज़ादी और अमेरिकी दबाव का विरोध करने की उसकी क्षमता, दोनों को दिखाता है; और ये दोनों ही बातें भारत की घरेलू राजनीति में अहम हैं.  सिविल न्यूक्लियर डील पर काम करने के बाद, मेरे लिए यह बिल्कुल साफ़ है कि भारत की विदेश नीति की सोच में अमेरिकी दबाव हमेशा से एक अहम वजह रहा है और अब भी है.

PM Modi रूस की कभी निंदा, अपमानित नहीं करेंगे: इवान

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इवान ने आगे कहा कि असल बात तो यह है कि भारत पहले से ही रूस से कच्चा तेल (क्रूड) मंगाना (आयात) कम कर रहा था, लेकिन भारत को यह कहकर धमकाना कि वह रूस की सबके सामने निंदा करे, जैसा कि ट्रंप प्रशासन और यूएस कांग्रेस में बहुत से लोग कर रहे हैं, और अब तो दोनों पार्टियों की सहमति से ऐसा हो रहा है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कभी भी स्वीकार्य नहीं था. मेरे अनुभव के अनुसार, वे भारत के सबसे अहम रक्षा सहयोगियों में से एक को कभी भी अपमानित नहीं करेंगे.

रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी कानून को लेकर भारत सतर्क

रूस से तेल-गैस खरीद पर 100 प्रत‍िशत तक शुल्क लगाने वाले अमेरिकी कानून 'सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' पर भारत ने कहा क‍ि सरकार घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रख रही है. विदेश मंत्रालय ने कहा कि सरकार 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है.

भारतीय व‍िदेश मंत्रालय ने कहा क‍ि अमेरिकी कांग्रेस ने एक ऐसा कानून पारित क‍िया है, जिसके तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों के सामान पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाया जा सकता है. भारत सरकार ने अमेरिकी कांग्रेस में 'सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' पर ध्यान रख रही है.

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मंत्रालय ने कहा क‍ि जैसा कि भारत पहले भी कई बार स्पष्ट कर चुका है, देश अपने 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है. भारत आगे भी विभिन्न स्रोतों से ऊर्जा हासिल करने और बाजार की बदलती परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यही नीति जारी रखेगा.

अपने लोगों के हितों की रक्षा के लिए उठाएंगे कदम: भारत

मंत्रालय ने बताया क‍ि पिछले कुछ महीनों में इस मुद्दे पर अमेरिका के विभिन्न अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर चर्चा की गई है. भारत ने स्पष्ट रूप से बताया है कि इस कानून का असर केवल भारत-अमेरिका संबंधों पर ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है.

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भारत ने यह भी साफ कर दिया है कि वह अपने व्यापारिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने के लिए दृढ़ संकल्पित है. सरकार इन घटनाक्रमों के संभावित प्रभावों से निपटने के लिए भारतीय व्यापार और उद्योग संगठनों के साथ मिलकर काम करेगी.

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क्या है अमेरिकी कांग्रेस से 100% टैरिफ़ लगाने वाला बिल?

बुधवार को (स्थानीय समय) अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' को 262 बनाम 159 मतों से पारित किया. इससे पहले सात अगस्त को सीनेट ने भी इसे 86 बनाम 11 मतों से मंजूरी दी थी. ट्रंप के सलाहकारों ने भी इस विधेयक को मंजूरी देने की सिफारिश की है. अब यह विधेयक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास जाएगा, जिनके इसके कानून बनने के लिए हस्ताक्षर करने की उम्मीद है.

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इस कानून का उद्देश्य यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध को जारी रखने के लिए मिलने वाले आर्थिक संसाधनों को कम करना है. इसके तहत रूसी अधिकारियों, बैंकों, ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी संस्थाओं और रूस के सैन्य अभियानों का समर्थन करने वाली विदेशी संस्थाओं को निशाना बनाया गया है.

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ये प्रावधान उन बड़े देशों पर लागू होंगे जो रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा आयात करते हैं या रूस पर लगे तेल प्रतिबंधों को दरकिनार करने में मदद करते हैं. समिति ने कहा कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि हर 180 दिन में समीक्षा करेगा और जरूरत पड़ने पर अन्य देशों को भी इस सूची में जोड़ा जा सकता है. भारत का नाम किसी विशेष लक्ष्य देश के रूप में नहीं दिया गया है, और न ही भारत के लिए कोई अलग टैरिफ दर तय की गई है.

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