‘पति पर रेप का केस कैसे चलाया जा सकता है’, Marital Rape पर फिर तेज हुई बहस, SC ने उठाया सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब कानून में वैवाहिक बलात्कार का अपवाद मौजूद है तो पत्नी के साथ बलात्कार के आरोप में पति पर मुकदमा कैसे चलाया जा सकता है?
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शीर्ष अदालत में मैरिटल रेप (वैवाहिक बलात्कार) से जुड़े कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई. जिसमें सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें रखीं. इस दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, शादी से महिला की सहमति का अधिकार खत्म नहीं होता.
वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) को अपराध घोषित करने की मांग से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई अब निर्णायक चरण में पहुंच गई है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. इस दौरान बेंच ने सवाल उठाया कि जब कानून में वैवाहिक बलात्कार का अपवाद मौजूद है तो पत्नी के साथ बलात्कार के आरोप में पति पर मुकदमा कैसे चलाया जा सकता है?
‘अपराध घोषित करना संसद का काम कोर्ट का नहीं’
बेंच ने साफ किया कि विवाह किसी महिला की शारीरिक स्वतंत्रता और उसकी सहमति के संवैधानिक अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता. वहीं, केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मैरिटल रेप पर कानून बनाने का अधिकार संसद को है, न कि कोर्ट को. इस विषय पर फैसला करना संसद कs अधिकार क्षेत्र में है.
क्या है मैरिटल रेप पर कानून बनने के बीच का विवाद?
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल उठाते हुए कहा, जब तक सुप्रीम कोर्ट अपवाद की संवैधानिक वैधता पर फैसला नहीं करता, तब तक क्या अभियोजन की अनुमति दी जा सकती है? अदालत ने कहा कि कोर्ट पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या अभियोजक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा चला सकता है, जब IPC की धारा 375 में स्पष्ट रूप से अपवाद मौजूद था.
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार का हलफनामा रिकॉर्ड पर लेने के बाद मामले की अंतिम सुनवाई अगले महीने तय कर दी है. अदालत ने निर्देश दिया कि तीन सप्ताह बाद बुधवार और गुरुवार को इस मामले को अंतिम बहस के लिए सूचीबद्ध किया जाए. इससे संकेत मिला है कि अब इस संवेदनशील मुद्दे पर विस्तृत सुनवाई होगी. कोर्ट ने कहा कि
‘यह मामला केवल पति-पत्नी के संबंधों का नहीं, बल्कि महिला की गरिमा, स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों का भी है.’
सरकार ने क्या दलील दी?
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में दलील दी कि संसद ने 2023 में भारतीय न्याय संहिता बनाते समय इस मुद्दे पर व्यापक विचार-विमर्श किया था. उन्होंने कहा कि विवाह संस्था के भीतर यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी में लाना या नहीं लाना एक नीतिगत और सामाजिक फैसला है, जिसे संसद ही तय कर सकती है. अदालत को इस तरह के नीति संबंधी निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.
याचिकाओं में भारतीय न्याय संहिता (BNS) के उस अपवाद को चुनौती दी गई है, जिसके तहत पत्नी के साथ पति ने उसकी इच्छा के विरुद्ध (जबरन) बनाए गए शारीरिक संबंधों को बलात्कार की परिभाषा से बाहर रखा है.
अगली सुनवाई में क्या होगा?
तीन हफ्ते बाद होने वाली सुनवाई में कोर्ट इस वैधानिक अपवाद की संवैधानिक वैधता की विस्तार से जांच करेगा. अगर अदालत इसे असंवैधानिक या मनमाना मानती है, तो इस संबंध में आपराधिक कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है.
अब सभी पक्षों की अंतिम दलीलों के बाद सुप्रीम कोर्ट इस महत्वपूर्ण कानूनी और संवैधानिक प्रश्न पर अपना फैसला सुनाएगा, जिसका असर देश में विवाह, सहमति और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कानूनों पर पड़ सकता है.
केंद्र सरकार ने मैरिटल रेप को अपराध मानने से किया था इंकार
साल 2024 में केंद्र सरकार ने दाखिल एक हलफनामें में मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में रखने का विरोध किया था. सरकार के मुताबिक, ‘विवाहित महिलाओं को यौन हिंसा से बचाने के लिए मौजूदा कानूनों में पर्याप्त वैकल्पिक उपाय हैं.’
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सरकार के मुताबिक, विवाह जैसी संस्था के भीतर बलात्कार का अपराध लागू करना बेहद सख्त और असंगत हो सकता है. केंद्र सरकार मे इसे मुख्य रूप से सामाजिक, विधायी नीति का विषय बताया था. इसमें एक बड़ा तर्क यह भी दिया गया कि कुछ महिलाओं के लिए यह पुरुषों के खिलाफ हथियार बन जाएगा. कुछ पुरुष अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी इसके गलत इस्तेमाल की आशंका जताई थी.