‘सर तन से जुदा नारा भारत की संप्रभुता-अखंडता को चुनौती…’, मौलाना तौकीर रजा की बेल ख़ारिज करते वक्त HC की बड़ी टिप्पणी
बरेली हिंसा मामले में मौलाना तौकीर रजा की ज़मानत ख़ारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की है. कोर्ट ने सर तन से जुदा जैसे नारे को देश की अखंडता और संप्रभुता के ख़िलाफ़ करार दिया है.
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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सितंबर 2025 में हुई बरेली में हिंसा के एक मामले में 'इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल' के संस्थापक मौलाना तौकीर रज़ा खान की ज़मानत अर्ज़ी खारिज कर दी है. इतना ही नहीं कोर्ट ने सर तन से जुदा जैसे कथित भड़ाकाऊ नारे को देश की संप्रभुता पर हमला करार दिया है.
बरेली हिंसा मामले में मौलाना तौकीर रजा की जमानत याचिका खारिज
जस्टिस आशुतोष श्रीवास्तव ने सोमवार को दिए एक आदेश में साफ कर दिया कि ‘सर तन से जुदा’ के नारे की तुलना “नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर", "जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल", "जय श्री राम" या "हर हर महादेव" जैसे धार्मिक नारों से नहीं की जा सकती.
सर तन से जुदा का नारा भारत को चुनौती?
कोर्ट ने कहा कि ये धार्मिक नारे ईश्वर या गुरु के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं. वहीं सर तन से जुदा जैसे नारों को लेकर राज्य सरकार की इस दलील से सहमति जताई कि "सर तन से जुदा" का नारा कानून के शासन और भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए एक चुनौती है.
'आई लव मोहम्मद' अभियान से जुड़ी रैली के दौरान भड़की थी हिंसा!
आपको बता दें कि 'आई लव मोहम्मद' अभियान से जुड़ी एक रैली के दौरान बरेली में भड़की हिंसा से संबंधित एक मामले में मौलाना तौकीर रजा 13 अक्टूबर 2025 से जेल में हैं. पुलिस की शिकायत के अनुसार, प्रशासन द्वारा रैली की अनुमति देने से इनकार किए जाने के बाद, रज़ा ने मुस्लिम समुदाय के लोगों से 26 सितंबर 2025 को जुमे की नमाज़ के बाद इस्लामिया इंटर कॉलेज में इकट्ठा होने का आह्वान किया था.
पुलिस का आरोप है कि 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू होने के बावजूद, लोगों की एक बड़ी भीड़ तख्तियां लिए और नारे लगाते हुए श्यामगंज चौराहे की ओर बढ़ी.
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मौलाना के व्यवहार पर कोर्ट ने जताई नाराजगी!
इस दौरान जब पुलिसकर्मियों ने मार्च को रोकने की कोशिश की तो भीड़ हिंसक हो गई, जिसमें झड़पें हुईं, कई पुलिसकर्मी घायल हुए और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचा. हाई कोर्ट ने कहा कि रज़ा ने स्थानीय प्रशासन से अनुमति लिए बिना लोगों को इकट्ठा होने के लिए जुटाया था.
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हालाँकि उन्होंने तर्क दिया कि अनुमति न मिलने और निषेधाज्ञा लागू होने के बाद सभा का आह्वान रद्द कर दिया गया था, लेकिन कोर्ट ने गौर किया कि इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग कार्यक्रम स्थल की ओर मार्च कर रहे थे.
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कोर्ट ने हिंसा के बाद रज़ा के व्यवहार पर भी नाराजगी जताई और कहा कि उन्होंने भीड़ को उनके आह्वान पर बड़ी संख्या में आने के लिए धन्यवाद दिया और उनके कार्यों की सराहना की. बेंच ने यह भी गौर किया कि हालाँकि 21 दिसंबर, 2025 को चार्जशीट दाखिल की गई थी, लेकिन रज़ा के खिलाफ अभी तक आरोप तय नहीं किए गए हैं, और इस चरण में उन्हें ज़मानत देने से इनकार कर दिया.