‘जज भगवान नहीं होते, हर फैसला सही नहीं हो सकता’, CJI के सामने ऐसा क्यों बोले सुप्रीम कोर्ट के जज
सुप्रीम कोर्ट के जज संजय करोल रिटायर हो गए हैं. अपने विदाई कार्यक्रम में उन्होंने न्याय और न्यायपालिका को लेकर कई अहम बातें बताईं. इस दौरान उन्होंने कहा, जज भगवान नहीं होते.
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सुप्रीम कोर्ट के जज संजय करोल रिटायर हो गए हैं. रिटायरमेंट समारोह में उन्होंने न्यायपालिका के फैसलों पर बड़ी बात कही. उन्होंने कहा, जज भगवान नहीं होते और उनसे हर फैसला सही नहीं हो सकता.
अपने विदाई भाषण में जस्टिस संजय करोल ने यह भी कहा, ‘जज बनने के लिए थोड़ी विनम्रता और हर मुकदमेबाज के पीछे छिपे असली इंसान को देखने की क्षमता जरूरी है. संविधान हमसे सिर्फ कानून को सही ढंग से लागू करने के लिए नहीं कहता. वह हमसे इसे न्यायपूर्ण तरीके से लागू करने के लिए कहता है. शायद इसीलिए मुझे फैसला सुनाने की जिम्मेदारी, सिर्फ यह तय करने से कहीं ज्यादा बड़ी लगी है कि कानूनी तौर पर कौन सही है.’
CJI के सामने कहा- हम भगवान नहीं
जस्टिस संजय करोल के विदाई कार्यक्रम में चीफ जस्टिस सूर्यकांत भी शामिल हुए थे. उनके साथ-साथ जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना भी मौजूद थे. यहां संजय करोल ने कहा,
‘जज के तौर पर हम भगवान नहीं हैं, हमारे सभी फैसले सही नहीं होंगे. हमारे हाथ में हमेशा एक ही बात थी. सिर्फ याचिकाकर्ता को नहीं, बल्कि उस व्यक्ति को देखना. याचिका से आपको सिर्फ मामले के तथ्य पता चल सकते हैं, लेकिन यह नहीं पता चल सकता कि उस व्यक्ति ने पहले ही क्या खो दिया है या वह अदालतों से क्या उम्मीद कर रहा है. शायद इसीलिए मैंने हमेशा कहा है कि फैसला सुनाने के लिए एक खास स्तर की विनम्रता की जरूरत होती है.’
कौन हैं जस्टिस संजय करोल
जस्टिस संजय करोल के मुताबिक, उन्होंने 40 साल कोर्टरूम में बिताए हैं. इसमें 19 साल बतौर जज कार्यभार संभाला है. जस्टिस संजय करोल को 6 फरवरी, 2023 को सुप्रीम कोर्ट में प्रमोट किया गया था. उन्होंने अपने चार दशक की लंबी पारी को याद करते हुए कहा, कोर्टरूम उनके लिए कभी भी सिर्फ काम करने की जगह नहीं रहा, बल्कि खुद से 'बड़ी और ज्यादा महत्वपूर्ण' चीज का जरिया रहा है. मैं यह नहीं कहूंगा कि यह सफर सिर्फ मेरा था. इस कोर्टरूम ने मुझे कभी नहीं छोड़ा, इसने मेरा साथ दिया है.
सुनने की अहमियत समझाई
अपने विदाई कार्यक्रम में जस्टिस संजय करोल ने सुनाने से ज्यादा सुनने की अहमियत समझाई. उन्होंने कहा, ‘कोर्टरूम में ऐसी 'खामोशियां' भी होती हैं, जिनमें बहुत कुछ छिपा होता है और जजों को उन्हें समझना आना चाहिए.’
जस्टिस संजय करोल ने इस बात पर भी जोर दिया कि अदालत में केवल दलील ही मायने नहीं रखती. बल्कि खामोशियों में दबे अहसासों का भी मतलब होता है. उन्होंने कहा,
‘वकीलों की खामोशी में भी सुनने का एक तरीका होता है. न्यायिक प्रक्रिया में सिर्फ दी गई दलीलें ही मायने नहीं रखतीं, बल्कि लोग 'शब्दों के बीच की खामोशी' में क्या कहना या मांगना चाह रहे हैं, यह भी अहम है.’
‘न्यायधीश की कुर्सी सत्ता नहीं जिम्मेदारी है’
जस्टिस करोल ने 1996 में सुप्रीम कोर्ट के कोर्टरूम नंबर 1 में अपनी पहली यात्रा को याद किया. इस दौरान उन्होंने न्यायाधीश की कुर्सी के महत्व को समझाया. उन्होंने कहा, ‘उन्हें बेंच जमीन से लगभग 6 फीट ऊपर लगी थी, नीचे से देखने पर बेंच की ऊंचाई अधिकार या सत्ता का प्रतीक लग सकती है, लेकिन ऊपर बैठकर देखने पर इसका मतलब बिल्कुल अलग होता है और वह है गरिमा और ईमानदारी के साथ जिम्मेदारी निभाना.’
न्याय महंगा, दूर और डरावना…
जस्टिस संजय करोल ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायपालिका की असली ताकत लोगों का उस पर भरोसा है. उन्होंने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट का असली महत्व आम नागरिक के उस भरोसे में है, जो यह मानकर इसके दरवाजे पर आता है कि कोई उसकी बात सुनेगा. लेकिन हमें उन लोगों को भी याद रखना चाहिए, जो कभी इन दरवाजों तक नहीं पहुंच पाते, क्योंकि न्याय बहुत दूर, बहुत महंगा और बहुत डरावना होता है.’
न्याय और न्यायपालिका का संवैधानिक अर्थ और कीमत समझाते हुए जस्टिस करोल ने कहा, कानून, उचित प्रक्रिया और संवैधानिक वैधता जैसी अवधारणाओं को समझने का सबसे आसान तरीका 'धर्म' के विचार से है. इसे किसी रस्म-रिवाज के तौर पर नहीं, बल्कि कर्तव्य के तौर पर समझना चाहिए.
जस्टिस संजय करोल ने बार के सदस्यों को संबोधित किया. उन्होंने कहा, न्याय करने के सिद्धांत कोर्टरूम और जजों के लिबास से कहीं आगे तक जाते हैं. हर व्यक्ति को अपनी पसंद, अपने आचरण और अपनी शक्ति के इस्तेमाल के मामले में खुद का जज बनने की जरूरत होती है. अपने कर्तव्य को दोहराते हुए उन्होंने कहा, एक जज का कर्तव्य है कि वह न्याय का सम्मान करे और यह सुनिश्चित करे कि अदालत के सामने खड़ा व्यक्ति-चाहे वह कितना भी छोटा या बेबस क्यों न हो, उसकी बात सुनी जाए और उस पर ध्यान दिया जाए.
हाउस वाइव्स की सैलरी तय करने वाला फैसला चर्चा में रहा
जस्टिस संजय करोल ने एक फैसले में महिलाओं को नेशन बिल्डर यानी राष्ट्र निर्माता कहा था. जस्टिस संजय करोल की अध्यक्षता वाली बेंच ने दुर्घटना की शिकार गृहिणियों के मामलों में मुआवजा निर्धारण के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए थे. उन्होंने 'घरेलू देखभाल के नुकसान' का आर्थिक मूल्य 30,000 रुपये प्रति माह निर्धारित किया है. संजय करोल ने कहा था,
‘पत्नी और गृहिणी के घरेलू कार्य, बच्चों का पालन-पोषण, परिवार की देखभाल और समाज निर्माण में उनका योगदान आर्थिक दृष्टि से बहुत मूल्यवान है. जब किसी दुर्घटना के कारण परिवार इस सेवा से वंचित हो जाता है, तो मुआवजा तय करते समय इस नुकसान को जरूर ध्यान में रखा जाना चाहिए.
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इस फैसले के बाद जस्टिस संजय करोल की काफी सरहाना हुई थी. जिसमें उन्होंने गृहिणियों के अवैतनिक घरेलू श्रम को महत्वपूर्ण मानते हुए आर्थिक और सामाजिक मान्यता दी थी. इस फैसले से दुर्घटना पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा मिलने और समाज में गृहिणियों के योगदान को नई पहचान मिलने की उम्मीद जगी.