चीन-पाकिस्तान के हर चाल पर नज़र, सीमा की 24*7 निगरानी...क्या है भारत अंतरिक्ष कमान, जिससे थर-थर कांपे दुश्मन
जल्द ही भारत भी उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जिनके पास एक अंतरिक्ष कमान होगी. इसका ऐलान भी जल्द ही कर दिया जाएगा. इतना ही नहीं ये तीनों सेनाओं के बीच एकीकृत स्पेस कमान होगी.
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दुनियाभर में बढ़ते सैन्य तनाव और वैश्विक चुनौतियों को देखते हुए दुनियाभर के देशों में स्पेस कमांड यानी कि अंतरिक्ष कमान की जरूरत महसूस हो रही है. एक ओर जहां अब लड़ाई पांचवीं पीढ़ी में पहुंच गई है तो, खतरा जल-थल और नभ के अलावा अंतरिक्ष तक पहुंच गया है. इसी कारण भारत ने भी अपनी रक्षा तैयारियों को पुख्ता कर लिया है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन की ओर से भारतीय सैन्य ठिकानों की जासूसी हुई, जिस तरह चीन ने पाकिस्तान को भारतीय सेनाओं की हर पल की गतिविधि की जानकारी दी, उसके बाद स्पेस फोर्स और स्पेस कमांड की जरूरत और बढ़ गई. इसी बीच ख़बर सामने आ रही है कि भारत ने भी अंतरिक्ष कमान के गठन की तैयारी पूरी कर ली है.
भारत बना रहा अंतरिक्ष कमान?
कहा जा रहा है कि जल्द ही भारत भी उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जिनके पास एक अंतरिक्ष कमान होगी. इसका ऐलान भी जल्द ही कर दिया जाएगा. इतना ही नहीं ये तीनों सेनाओं के बीच एकीकृत स्पेस कमान होगी. इसका नेतृत्व सेना करेगी. रिपोर्ट के मुताबिक अंतरिक्ष कमान को लेकर तीनों सेनाओं में चर्चाओं का दौर खत्म हो गया है, टर्म्स सेट हो गए हैं और अब बस ऐलान की औपचारिकता बाकी रह गई है. आगे समय-समय पर इसमें और चीजें भी जोड़ी जाएंगी और इसे स्थायी बना दिया जाएगा.
10 से ज्यादा देशों के पास पहले से ही अंतरिक्ष कमान
तीनों सेनाओं के एकीकृत अंतरिक्ष कमान को बेंगलुरू स्थित रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (डीएसए) के संग जोड़ा जाएगा. सेना के लेफ्टिनेंट जनरल स्तर का अधिकारी इस कमान का नेतृत्व करेगा, वहीं उनके अंडर में सेना से 5 स्तर के पांच मेजर जनरल स्तर के अधिकारी, उन्हीं के समकक्ष वायुसेना के तीन और नौसेना के दो अधिकारी शामिल होंगे.
आपको बता दें कि दुनियाभर की करीब-करीब सभी एडवांस मिलिट्रीज के पास अंतरिक्ष कमान है. फिलहाल दस से अधिक देशों के पास पहले से अंतरिक्ष कमान है और हाल में ही ब्रिटेन ने भी इसी दिशा में पहल की है. वहीं दुनिया की सबसे बड़ी मिलिट्री अमेरिका के पास स्पेस कमांड, स्पेस कमान, दोनों ही हैं. चीन, रूस, फ्रांस, जर्मनी, जापान, इटली, ऑस्ट्रेलिया तथा ईरान के पास भी ऐसी कमान हैं.
क्यों महसूस हो रही है अंतरिक्ष कमान की जरूरत?
एक ओर जहां पारंपरिक युद्ध जमीन से निकलकर हवा में पहुंच गया है तो वहीं अब लड़ाई अब साइबर डोमेन में शिफ्ट हो रही है, जहां एक क्लिक के जरिए साइबर अटैक से मिलिट्री को पंगु बनाया जा सकता है, मिसाइलें जाम हो सकती हैं, बिजली, रिएक्टर, प्लांट्स आदि जाम हो सकते हैं. स्पेस से अटैक किया जा सकता है. अंतरिक्ष से निगरानी की जा सकती है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन ने पाकिस्तान की मदद सैटेलाइट के जरिए ही की थी. करीब 80 देश मौजूदा समय में नागरिक अंतरिक्ष कार्यक्रम चला रहे हैं. जिसकी सुरक्षा और निगरानी के लिए स्पेस मिशन तो चाहिए ही, बल्कि डेडिकेटेड सैन्य स्पेस कमान और स्पेस फोर्स की जरूरत होती है. यानी कि जो स्पेस सेक्टर अब तक नागरिक जरूरतों के लिए उपयोग हो रहा था, वो कुछ देशों की हरकतों के कारण सैन्य संस्करण की ओर बढ़ गया है.
क्या होगा इस कमान का काम?
जानकारी के मुताबिक इस कमान का काम उपग्रहों के जरिए रियल टाइम निगरानी करना होगा. जिससे पता चल पाए कि पड़ोसी या दुश्मन देश के अंदर क्या गतिविधियां चल रही हैं और सीमा पर वह किस तरह की हरकतें कर रहा है. इसका दूसरा काम सुरक्षित नौवहन और संचार उपलब्ध करवाना होगा. युद्ध के समय भी जरूरी सामग्री पहुंचाने में यह कमान सहयोग करेगी.
जहां तक स्पेस कमांड या कमान के काम की बात है तो ये अपने उपग्रहों के साथ-साथ दुश्मनों के सैटेलाइट्स की रियल टाइम निगरानी करेंगे. यानी कि ये हर वक्त दुश्मनों की गतिविधि पर ना सिर्फ नज़र रखेंगे बल्कि देश को इसके लिए तैयार भी रखेंगे. इतना ही नहीं स्पेस कमांड सीमा पर भी दुश्मनों की निगरानी करेगा. इसके अलावा सुरक्षित नेविगेशन और संचार उपलब्ध करवाने के साथ-साथ युद्ध के समय भी जरूरी सामग्री जैसे कि इमेजरी, रियल टाइम डेटा, नेविगेशन और स्ट्राइक का काम स्पेस कमान करेगी.
वहीं दुश्मन के उपग्रहों की गतिविधियों पर नजर रखने का जिम्मा भी स्पेस कमान का ही होगा. अगर कोई हमला दुश्मन देश की तरफ से होता है, स्पेस से होता है तो उसे नष्ट भी यही कमान करेगी. अभी भी तीनों सेनाओं के अंदर अलग-अलग यूनिट्स हैं, लेकिन जिस तरह तीनों सेनाओं के लिए एक CDS स्ट्रक्चर बनाया गया ठीक उसी तरह तीनों सेनाओं के लिए अलग-अलग स्पेस यूनिट की जगह एक कंबाइंड, डेडिकेटेड कमांड बनेगा.
संसद में भी उठी थी स्वतंत्र स्पेस फोर्स बनाने की मांग
इसी साल फरवरी में संसद में भी स्पेस फोर्स का मुद्दा उठा था. सदन में मांग की गई थी कि भारत को अपनी एक स्वतंत्र स्पेस फोर्स का गठन करना चाहिए. सदन में मामला आया कि स्पेस आज देश की सुरक्षा से सीधे जुड़ा है. यह डोमेन रणनीतिक आर्थिक व सैन्य ऑपरेशन को भी प्रभावित करता है. राज्यसभा में ओडिशा से भाजपा सांसद सुजीत कुमार ने यह विषय उठाया था. उन्होंने कहा कि अब अंतरिक्ष सिर्फ साइंस का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की सुरक्षा से सीधे जुड़ा रणनीतिक क्षेत्र बन चुका है. उन्होंने सरकार से स्वतंत्र स्पेस फोर्स बनाने पर गंभीरता से विचार करने की अपील की.
दुश्मन के एक क्लिक पर ठप हो सकता है पूरा देश?
उन्होंने राज्यसभा में कहा, “या तो हम उस खामोश हमले का इंतजार करें जो हमारी अर्थव्यवस्था को ठप कर दे, या फिर पहले से ऐसी ताकत खड़ी करें कि ऐसा हमला हो ही न सके. स्पेस फोर्स हमें सितारों में जंग जीतने के लिए नहीं, बल्कि जमीन पर जंग हारने से बचाने के लिए चाहिएआज हमारी कॉल, इंटरनेट, जीपीएस, बैंकिंग, निगरानी और सैन्य ऑपरेशन सब कुछ अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट्स पर टिका है. अगर दुश्मन ने अंतरिक्ष में जरा-सी भी गड़बड़ी कर दी, तो जमीन पर देश की सुरक्षा और व्यवस्था दोनों प्रभावित हो सकती हैं."
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2019 में डिफेंस स्पेस एजेंसी और डिफेंस स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन का गठन
बकौल सांसद सुजीत कुमार, वर्ष 2019 में डिफेंस स्पेस एजेंसी और डिफेंस स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन बनाई गईं. साथ ही एंटी-सैटेलाइट मिसाइल टेस्ट की सफलता ने भारत को दुनिया के सामने एक मजबूत स्पेस पावर के रूप में खड़ा कर दिया है. लेकिन उन्होंने साफ कहा कि अब इतना काफी नहीं है. आज के दौर में अलग से स्पेस फोर्स बनाना वक्त की जरूरत है.
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अमेरिका ने 2019 में स्पेस फोर्स बनाई, चीन के पास हाई लेवल स्पेस पावर
उन्होंने बताया कि चीन के पास पहले से अपनी खास स्पेस से जुड़ी सैन्य ताकत है और अमेरिका ने 2019 में स्पेस फोर्स बना ली. ऐसे में भारत ढिलाई नहीं बरत सकता. सुजीत कुमार ने कहा कि मौजूदा डिफेंस स्पेस एजेंसी एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन अभी यह अस्थायी ढांचे में काम कर रही है. इसके पास न तो अपना अलग कैडर है, न पूरी कमान और न ही स्थायी व्यवस्था.
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उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले समय में भारत के कई नए सैन्य सैटेलाइट अंतरिक्ष में होंगे. ऐसे में उनकी सुरक्षा के लिए चौबीसों घंटे समर्पित रहने वाली सैन्य निगरानी और ऑपरेशन जरूरी होंगे. उनका कहना था कि पारंपरिक सैन्य कमांड अकेले यह नहीं संभाल सकते.