असली 'गोदी मीडिया' कौन? दरबारी पत्रकारों के इकोसिस्टम ने क्यों जानबूझकर तैयार किया ये प्रोपेगेंडा
निष्पक्षता का चोला और 'गोदी' का खेल: आखिर कौन है असली गोदी मीडिया और किसने गढ़ा ये नैरेटिव? इकोसिस्टम पर्दाफाश.
Follow Us:
देश में इन दिनों लेफ्ट मीडिया और विपक्ष की ओर से अपने विरोधियों को 'सर्टिफ़िकेट' बांटने का धड़ल्ले से गोरखधंधा चल रहा है. जो पत्रकार उनके नैरेटिव में फिट नहीं बैठता, जो कांग्रेस-लेफ्ट इकोसिस्टम के हिसाब से नहीं लिखता, जो बीजेपी का अंध-विरोध नहीं करता, लाल सलाम नहीं बोलता, कूल दिखने के लिए हिंदू धर्म को गाली नहीं देता, भारत पर सवाल नहीं उठाता, जो खान मार्केट गैंग से बिलांग नहीं करता और सबसे बड़ी बात, जो देश की एक अल्पसंख्यक आबादी को खुश करने के लिए बहुसंख्यक आबादी को नीचा नहीं दिखाता, उस पत्रकार और मीडिया चैनल को 'गोदी मीडिया' कहकर नवाजने का चलन शुरू हो गया है.
कौन रच रहा गोदी मीडिया का नैरेटिव?
अभिव्यक्ति की आजादी के इन तथाकथित अलंबरदारों का हाल यह है कि ऐसे असहमत चैनलों के पत्रकारों की सरेआम डिजिटल और वैचारिक लिंचिंग किए जाने की कोशिश होती है और उनके ख़िलाफ़ भीड़ जुटाकर हूटिंग की जाती है. हालत यह है कि हार पर हार, लगातार दर्जनों चुनाव हारने के बावजूद, कोई भी दरबारी पत्रकार कांग्रेस या राहुल गांधी से ये नहीं पूछ सकता कि, "भाई, ऐसी क्या गलती हो रही है जो आप लगातार हार रहे हो?" इसके बजाय, सवाल बीजेपी से पूछा जा रहा है कि "तुम जीत क्यों रहे हो?" ये वही लॉबी है जो लगातार वोट चोरी के नैरेटिव, 'राफेल' और 'चौकीदार चोर है' जैसे नारों को हवा देती है और EVM पर कांग्रेस के फेल हो चुके नैरेटिव को बाय करती है, लेकिन ये पत्रकार विपक्ष से ये सवाल नहीं पूछ पाते कि "अगर चुनाव में इतनी ही खामी है, तो आप सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं जा रहे? आपके पास चुनाव के बाद 45 दिन का विंडो रहता है, आप सबूत पेश कर कोर्ट में इसे साबित क्यों नहीं करते?"
वे ऐसा नहीं करते. इसके बजाय, बिना सिर-पैर का वोट चोरी का नैरेटिव खड़ा किया जाता है. अगर इसी नैरेटिव पर कोई पत्रकार काउंटर सवाल कर दे, तो वह तुरंत 'गोदी मीडिया' हो जाता है. यानी कि ये तो खुद सवाल पूछेंगे, लेकिन कोई इनसे पलटकर सवाल कर ले तो इन्हें गुस्सा आ जाता है, और फिर शुरू हो जाता है बिकने-बेचने का खेल.
कौन है असली 'गोदी मीडिया'!
आज जो लोग निष्पक्षता का ज्ञान दे रहे हैं, उन्हें बताना चाहिए कि देश में 'सिस्टम' और मीडिया के गठजोड़ की शुरुआत आखिर किसने की थी? 1980 के दशक के अंत और 90 के दशक की शुरुआत को याद कीजिए. तब देश में सिर्फ एक सरकारी चैनल था, दूरदर्शन. इसी दौर में प्रणय रॉय ने NDTV की नींव रखी. उस वक्त दूरदर्शन के महानिदेशक (DG) भास्कर घोष हुआ करते थे.
भास्कर घोष की मेहरबानी और सरकारी संरक्षण के दम पर ही प्रणय रॉय के NDTV को दूरदर्शन पर 'द वर्ल्ड दिस वीक' (The World This Week) और चुनाव विश्लेषण जैसे प्राइम-टाइम स्लॉट चांदी की तश्तरी में सजाकर दिए गए. बाद में राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार भी इसी इकोसिस्टम का हिस्सा बने. यानी जो मीडिया संस्थान और उसके मठाधीश खुद एक दौर में सरकारी ब्रॉडकास्टर की 'गोद' में बैठकर फले-फूले और अपना अंपायर खड़ा किया, वे आज दूसरों को 'गोदी मीडिया' का सर्टिफिकेट बांट रहे हैं. क्या वह असली गोदी मीडिया नहीं था?
'मूर्धन्य' पत्रकारों का पाखंड
आज रवीश कुमार जैसे तथाकथित 'मूर्धन्य' पत्रकार वैचारिकता का चोला ओढ़कर खुलेआम कांग्रेस को विचारधारा के नाम पर डिफेंड करते हैं. ये वो पत्रकार हैं जो आज दूसरों के साक्षात्कारों (जैसे मौजूदा पीएम से आम खाने पर पूछा गया सवाल) का मजाक उड़ाते हैं, लेकिन खुद अपने गिरेबान में नहीं झांकते.
दशकों तक इन पत्रकारों ने गांधी-नेहरू परिवार की जो दरबारी चाटुकारिता की है, वह किसी से छिपी नहीं है. इनके लिए पत्रकारिता का मतलब था— गांधी परिवार से यह पूछना कि उन्हें कौन सा 'भारतीय खाना' पसंद है? वे 'आम और लीची' कैसे खाते हैं? और तो और, इनका सबसे बड़ा 'खोजी' (Investigative) सवाल यह होता था कि प्रियंका गांधी के बाल, उनकी नाक और उनके चलने का तरीका इंदिरा गांधी से कितना मिलता है! जो लोग कल तक गांधी परिवार के पीआर (PR) एजेंट की तरह काम कर रहे थे, वे आज दुनिया को ज्ञान दे रहे हैं.
पलटकर सवाल पूछो तो 'गोदी मीडिया'
इन मठाधीशों द्वारा फैलाए गए जहर का नतीजा आज सड़क पर दिख रहा है. देखा ये जा रहा है कि कोई भी रैली, प्रदर्शन या धरना हो, वहां अगर कोई ग्राउंड पत्रकार प्रदर्शनकारियों से सिर्फ उनकी ही माँग पूछ ले, उनकी मांगों पर कुछ काउंटर कर ले, या पलटकर सवाल पूछ ले, तो उन्हें तुरंत गोदी मीडिया कहा जाने लगता है. माइक छीने जाते हैं और हूटिंग की जाती है. इनका लोकतंत्र सिर्फ तब तक जिंदा है, जब तक पत्रकार इनकी हां में हां मिलाए; सवाल पूछते ही वह 'गोदी' हो जाता है.
आखिर क्यों गढ़ा जा रहा है 'गोदी मीडिया' का यह नैरेटिव?
यह ट्रेंड किसी जेन-जी ने शुरू नहीं किया है, बल्कि हमारे कथित मूर्धन्य पत्रकारों ने ही शुरू किया है. इसके पीछे एक गहरी बौखलाहट और सोची-समझी साजिश है:
1. Monopoly का टूूटी: दशकों तक इस लुटियंस इकोसिस्टम का नैरेटिव और सूचना पर एकाधिकार था. लेकिन सोशल मीडिया और मुखर राष्ट्रवादी चैनलों के आने से इनकी 'गेटकीपिंग' ध्वस्त हो गई. इनका हाल तो ये था कि ओम थानवी जैसे अल्ट्रा लेफ्टिस्ट संपादक न्यूट्रल व्यू वाले लेटर टू एडिटर में पाठकों के पत्र तक नहीं छापते थे, जब तक कि उसकी टोन तल्ख और उनको सूट करता हो.
ये लोग तीन मूर्ति, नेशनल लाइब्रेरी, संसद आदि जगहों पर लाइब्रेरी का इस्तेमाल तक नहीं करने देते थे और जिरॉक्स भी रिसर्च करने के लिए नहीं देते थे. अगर वहीं से फोटो कॉपी करवानी हो तो इसके एक पेज के 10 से 50 रुपए तक लगते थे. जबकि वामपंथियों के काम फ्री में हो जाते थे. आज यही लोग संस्थानों में ब्रीच और इंटरफेरेंस के आरोप लगा रहे हैं.
2. सत्ता की छिन गई मलाई: ये वही पत्रकार हैं जिन्होंने पहले की सरकारों में खूब मलाई काटी, सत्ता के तलवे चाटे, पे रोल पर काम किया, सकारी खर्चे पर खूब विदेश घूमे, मौज किए, दारू पी, Air India One में मुफ्त यात्राएं कीं और पद्म पुरस्कार लिए, लेकिन जब 2014 के बाद सरकार चली गई, बीजेपी आ गई और वीआईपी एक्सेस छिन गया, तो इन्हें दिक़्क़त होने लगी.
3. चुनावी हार का बहाना: विपक्ष जब भी चुनाव हारता है, तो अपनी नाकामियों का ठीकरा 'गोदी मीडिया' पर फोड़ देता है, ताकि उनका वैचारिक दिवालियापन छिप सके.
यूट्यूब पर खुली प्रोपेगेंडा की दुकान
लंबे समय तक इकोसिस्टम के तौर पर काम करने वाले ये लोग अब सिर्फ सर्टिफ़िकेट बांटने लगे हैं. जब मुख्यधारा ने इन्हें नकार दिया, तो इन्होंने यूट्यूब YouTube पर अपनी दुकान खोल ली. इन्हें पता था कि व्यूज कैसे आएंगे, तो इसके लिए इन्होंने अपने लिए एक 'कट्टर समर्थक वर्ग' Cult क्रिएट किया. फर्जी नैरेटिव, प्रोपेगेंडा और हर बात का अंध-विरोध कर-कर के एक ऐसा दर्शक वर्ग तैयार किया, जो सिर्फ सरकार को गाली पड़ते हुए सुनना चाहता है. खुद को उनका मसीहा बताया और दूसरों को गोदी मीडिया साबित कर के अपना 'विक्टिम कार्ड' और विदेशी फंडिंग का बिजनेस सेट कर लिया.
यह भी पढ़ें
पहले क्या होता था कि किसी लकीर को छोटी करनी होती थी तो उससे एक बड़ी लकीर खींच दी जाती थी. लेकिन अब ऐसा नहीं है, अब अपनी नाकामी छिपाने के लिए दूसरों को 'गोदी' कहकर, बेइज्जत करने की कोशिश की जाती है. सत्ता की मलाई खाकर और 'आम-लीची' वाली दरबारी पत्रकारिता कर चुके ये लोग आज अगर सर्टिफ़िकेट बांट रहे हैं, तो यह उनकी वैचारिक जीत नहीं, बल्कि उनका पाखंड है.