भारत में क्यों नहीं हो सकती वोट चोरी? चुनाव की तारीखों के ऐलान से लेकर नतीजों तक, क्या है पूरी प्रक्रिया, विस्तार से जानें
भारत में चुनाव की तारीखों के ऐलान से लेकर मॉक पोल, VVPAT और स्ट्रॉन्ग रूम की त्रिस्तरीय सुरक्षा तक, हर चरण राजनीतिक दलों की कड़ी निगरानी में होता है. जानिए क्यों चुनाव को सेट करना, धांधली और वोट चोरी नामुमकिन है.
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देश में पिछले कुछ चुनावों से एक सी चीज देखी जा रही है कि "हम मनबे नै करते हैं." यानी कि चुनाव नतीजे आपके पक्ष में आ जाएं तो ठीक, ना आएं तो वोट चोरी हो जाती है, EVM हैक हो जाता है. यानी कि पैटर्न सेट है कि 'EVM हैक हो गया, चुनाव आयोग ने वोट चोरी की है.' एक समय था जब चुनावी नतीजों को जनता जनार्दन का आदेश मानकर लोकतंत्र की जीत करार दिया जाता था, आज अब आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है. अब तो सारा ठीकरा ही चुनाव आयोग और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) पर फोड़ दिया जाता है.
ऐसे में विपक्ष के इस 'सिस्टम हैंग' वाले शोर के बीच, आज यह समझना बहुत ज़रूरी है कि आखिर भारत की चुनाव प्रणाली काम कैसे करती है? क्या वाक़ई कोई हैकर या सत्ताधारी दल EVM हैक करके करोड़ों वोट चुरा सकता है? क्या इतने बड़े देश में सच में चुनाव में धांधली करके नतीजों को पलटा जा सकता है, पूरे देश में EVM को हैक किया जा सकता है? चलिए जानते हैं चुनाव की तारीखों के ऐलान के वक्त लगने वाली आचार संहिता से लेकर नामांकन प्रक्रिया, वोटिंग से लेकर नतीजों तक की पूरी प्रक्रिया और इस दौरान पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में.
क्या सच में भारत में वोटों की चोरी की जा सकती है?
चुनाव आयोग ने कई बार, बार-बार दावा किया है कि EVM को हैक नहीं किया जा सकता. EVM को लेकर दाखिल हलफनामों में चुनाव आयोग विभिन्न प्रक्रियाओं को स्पष्ट कर चुका है. यहां तक कि EVM को लेकर दाखिल याचिकाएं कई बार सुनवाई के बाद खारिज की जा चुकी हैं.
ऐसे में अगर देखें तो भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के सख्त प्रोटोकॉल के अनुसार भारत में वोट चोरी या EVM में गड़बड़ी करना तकनीकी और प्रशासनिक, दोनों ही स्तरों पर असंभव है. जानिए कैसे काम करती है पूरी प्रक्रिया, कैसे फंक्शन करता है पूरा सिस्टम, स्टेप-बाय-स्टेप समझें.
1. मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (MCC) का ऐलान
चुनाव आयोग जैसे ही चुनाव की तारीखों का ऐलान करता है, उसी सेकंड से 'आदर्श आचार संहिता' (Model Code of Conduct) देशभर में लागू हो जाती है, अगर चुनाव लोकसभा का है और अगर विधानसभा का है तो उस खास राज्य में जहां चुनाव होना है.
इस दौरान पूरा प्रशासनिक, पुलिस और खुफिया महकमा सीधे चुनाव आयोग के कंट्रोल में आ जाता है. सत्ताधारी दल कोई भी ऐसा फैसला, योजना या ट्रांसफर-पोस्टिंग नहीं कर सकता, जिससे चुनाव प्रभावित हों. पूरी मशीनरी निष्पक्ष रूप से सिर्फ और सिर्फ चुनाव आयोग को रिपोर्ट करती है. कोई भी अधिकारी चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने से इनकार नहीं कर सकता. चुनाव आयोग की ओर से की जाने वाली कार्रवाई काफी सख्त होती है. जिस अधिकारी की प्रतिनियुक्ति जहां की जाएगी, वो वहां हर हाल में फौरन जाएगा. इतना ही नहीं नेता भी आचार संहिता के उल्लंघन से बचते हैं. इसके कारण आयोग अगर चाहे तो किसी भी नेता को चुनाव लड़ने से रोक सकता है, मताधिकार छीन सकता है, प्रचार बैन कर सकता है, कार्रवाई के लिए FIR का आदेश दे सकता है. और इसका पीछा उसके हारने-जीतने के बाद भी नहीं छोड़ता. यहां तक कि सजा होने के बाद सदस्यता रद्द तक की जा सकती है.
2. EVM की 'फर्स्ट लेवल चेकिंग' (FLC) और मॉक पोल
आपको बता दें कि मशीन सीधे बूथ पर नहीं पहुंचती. चुनाव से कई महीने पहले हर EVM (बैलेट यूनिट, कंट्रोल यूनिट) और VVPAT (Voter Verifiable Paper Audit Trail) की 'फर्स्ट लेवल चेकिंग' (FLC) होती है.
यह चेकिंग बंद कमरे में या किसी सरकारी बाबू के भरोसे नहीं, बल्कि सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों (Polling Agents) के सामने होती है. जब तक हर पार्टी का एजेंट मशीन को अपनी आंखों से देखकर ओके नहीं कर देता, वह मशीन चुनाव के लिए तैयार नहीं मानी जाती.
3. वोटिंग के दिन सुबह का 'मॉक पोल' (Mock Poll)
मतदान वाले दिन, सुबह 6-7 बजे असली वोटिंग शुरू होने से ठीक पहले पोलिंग बूथ पर एक 'मॉक पोल' होता है. इसमें हर पार्टी का पोलिंग एजेंट खुद बटन दबाकर 50 से ज़्यादा डमी वोट डालता है. फिर मशीन खोलकर चेक किया जाता है कि "मैंने जिसे वोट दिया, क्या मशीन ने उसी को दर्ज किया?" जब सब एजेंट संतुष्ट हो जाते हैं, तब मॉक पोल के डेटा को डिलीट करके, असली वोटिंग के लिए मशीन को सील कर दिया जाता है. सबसे अहम बात: इस 'सील' (Seal) पर हर पार्टी का एजेंट अपने सिग्नेचर (हस्ताक्षर) करता है.
4. पोलिंग एजेंट की पैनी नज़र और VVPAT से मिलान
वोटिंग के दौरान हर बूथ के अंदर पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) के ठीक सामने हर पार्टी का एक 'पोलिंग एजेंट' कुर्सी डालकर बैठा होता है. जब कोई आम नागरिक वोट देने जाता है और अपनी पसंद का बटन दबाता है, तो VVPAT मशीन की स्क्रीन पर 7 सेकंड के लिए एक कागज की पर्ची छपती है. इस पर्ची पर उस उम्मीदवार का नाम और चुनाव चिह्न होता है जिसे वोट दिया गया है. 7 सेकंड बाद वह पर्ची कटकर नीचे सीलबंद बॉक्स में गिर जाती है. यानी वोटर अपनी आँखों से सत्यापित करता है कि उसका वोट बिल्कुल सही जगह गया है. यहां तक कि मैनुअली पड़े वोट का वीवीपैट से मिलान भी किया जाता है.
5. वोटिंग खत्म होने पर सीलिंग और Form 17C
शाम को जैसे ही वोटिंग का समय खत्म होता है, कंट्रोल यूनिट (CU) का 'क्लोज' (Close) बटन दबा दिया जाता है. एक बार क्लोज बटन दबने के बाद उस मशीन में दुनिया की कोई भी ताकत एक भी नया वोट नहीं डाल सकती. क्लोज करने के बाद EVM (CU, BU और VVPAT) को दोबारा सील किया जाता है. इस बार भी सील पर सभी पार्टियों के एजेंट साइन करते हैं. यहीं पर पीठासीन अधिकारी हर पोलिंग एजेंट को 'Form 17C' की एक कॉपी देता है, जिसमें लिखित में दर्ज होता है कि आज उस बूथ पर कुल कितने वोट पड़े. यही फॉर्म वोट चोरी के दावों की हवा निकाल देता है. ऐसे में सवाल अगर उठेगा तो पॉलिटिकल पार्टियों के इन पोलिंग एजेंट्स पर, जिन्होंने उस पर हस्ताक्षर किए हैं. या तो उनके साइन नहीं लिए गए या तो फिर उनकी निष्ठा तब्दील हो गई.
6. स्ट्रॉन्ग रूम की त्रिस्तरीय अभेद्य सुरक्षा
पुलिस, पैरा मिलिट्री, सेना और दूसरी एजेंसियों की कड़ी सुरक्षा, केंद्रीय बलों के कड़े पहरे में संपन्न वोटिंग के बाद सील की गई मशीनें एक बेहद सुरक्षित जगह Strong Room पर ले जाई जाती हैं. स्ट्रॉन्ग रूम को भी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में ताला लगाकर सील किया जाता है. सेंट्रल फोर्स की तैनाती इसलिए भी की जाती है क्योंकि उनकी निष्ठा किसी भी दल के प्रति नहीं हो सकती, राज्य सरकार, जिला पुलिस या किसी भी अधिकारी में वो राज्य पुलिस की तरह नहीं आ सकते. वो सीधे चुनाव आयोग को रिपोर्ट करेंगे. उनकी तैनाती हर चुनाव बाद बदल जाती है, अपने बैरक में वापस चले जाते हैं. इतना ही नहीं बंगाल जैसे संवेदनशील इलाकों में तो सेंट्रल फोर्स के जवान प्री एंड पोल वायलेंस रोकने के लिए भी तैनात किए जाते हैं.
जहां तक EVM को स्ट्रॉन्ग रूम में सील करने की बात है, इसकी सुरक्षा का सवाल है तो यहां की सुरक्षा में पैरामिलिट्री फोर्स (CRPF/BSF), स्टेट आर्म्ड पुलिस और लोकल पुलिस की तीन लेयर होती हैं. पूरा स्ट्रॉन्ग रूम 24x7 CCTV कैमरों की लाइव निगरानी में होता है. सबसे खास बात विपक्ष के नेता या उम्मीदवार अपने कार्यकर्ताओं को स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर 24 घंटे टेंट लगाकर पहरा देने के लिए बैठा सकते हैं और उन्हें CCTV की मॉनिटरिंग के लिए एक स्क्रीन भी दी जाती है.
7. काउंटिंग वाले दिन क्या होता है, कैसे होती है मतगणना?
मतगणना के दिन स्ट्रॉन्ग रूम का ताला राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों या उनके अधिकृत प्रतिनिधियों के सामने ही खोला जाता है. मतगणना टेबल पर मशीन रखने से पहले हर एजेंट यह चेक करता है कि वोटिंग वाले दिन जो 'सील' उन्होंने लगाई थी और जिस पर उनके सिग्नेचर थे, वो टूटी तो नहीं है? इसके बाद, मशीन में मौजूद कुल इलेक्ट्रॉनिक वोटों का मिलान वोटिंग के दिन दिए गए Form 17C के आंकड़े से किया जाता है. अगर 1000 वोट पड़े थे, तो मशीन में 1000 ही निकलने चाहिए. एक भी वोट का अंतर आने पर तुरंत आपत्ति दर्ज की जा सकती है.
8. VVPAT पर्चियों का क्रॉस-वेरिफिकेशन या फुल प्रूफ मैनुअल चेकिंग
चुनाव आयोग की प्रक्रिया को और भी पारदर्शी बनाने के लिए, हर विधानसभा क्षेत्र में रैंडमली किन्हीं 5 पोलिंग बूथों की VVPAT मशीनें चुनी जाती हैं. इन VVPAT मशीनों को खोला जाता है और उनमें पड़ी मत पर्चियों को मैन्युअली (हाथ से) गिना जाता है. इन कागज़ की पर्चियों का मिलान EVM में पड़े इलेक्ट्रॉनिक वोटों से किया जाता है. यदि इलेक्ट्रॉनिक गिनती और कागज़ की पर्चियों में कोई अंतर आता है, जो आज तक किसी चुनाव में साबित नहीं हुआ है, तो VVPAT की पर्चियों की गिनती को ही अंतिम और सही माना जाता है. और फिर चुनाव के नतीजों का ऐलान किया जाता है. यहां तक कि बिहार चुनाव 2025 से पूरे देश में 100% पोलिंग स्टेशन वेबकास्टिंग की व्यवस्था कर दी गई है. इतना ही नहीं हर दल के एजेंट अपने आंकड़े अपनी पार्टी को भेजते हैं, चुनाव आयोग रियल टाइम, हर काउंटिंग फेज के आंकड़े, लीड, ट्रेल और विन मार्जिन आयोग की वेबसाइट पर जारी करता है.
ऐसे में देखें तो चुनाव में धांधली या सांठगांठ का सवाल ही नहीं उठता जब तक कि पूरा सिस्टम, चुनाव आयोग, पुलिस, सेंट्रल फोर्स, राज्य के अधिकारी, पर्यवेक्षक, सीसीटीवी, पोलिंग एजेंट्स...सब एक ही समय पर, एक ही साथ करप्ट हो जाएं, एक ही बार में फेल हो जाएं, देश में अराजकता फैल जाए.
कुल मिलाकर कहें तो EVM कोई इंटरनेट, वाई-फाई, या ब्लूटूथ से जुड़ा हुआ कंप्यूटर नहीं है, जिसे कोई रिमोट कंट्रोल से हैक कर ले. यह एक स्टैंडअलोन कैलकुलेटर की तरह है, जिसे दूर बैठे कोई भी एक्सेस नहीं कर सकता. इसकी प्रोग्रामिंग एक ही बार में होती है. वोटिंग मशीन की फर्स्ट लेवल चेकिंग से लेकर, सुबह के मॉक पोल, शाम की सीलिंग, स्ट्रॉन्ग रूम की पहरेदारी और फिर काउंटिंग तक, हर एक कदम पर विपक्ष और उनके पोलिंग एजेंट खुद आंखों से देखकर हस्ताक्षर करते हैं, जो कि अलग-अलग जाति, समुदाय, राज्य, धर्म, विचारधारा से आते हैं, हो सकते हैं, इसलिए इनके भी अपने विपक्षी दलों को जिताने और ड्यूल एजेंट्स की तरह काम करने की संभावना कम है.
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ऐसे में वोट चोरी या मशीन हैक होने का दावा तकनीकी या प्रशासनिक, किसी भी रूप में मुमकिन ही नहीं है. सच्चाई तो यह है कि हारने के बाद EVM को दोष देना, दरअसल अपनी सियासी कमियों और ज़मीनी हकीकत पर पर्दा डालने का सबसे आसान राजनीतिक हथियार बन गया है. वैसे भी एक ओर जनता है जो सब देख रही है, दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट है जो सब कुछ मॉनिटर करने के लिए बैठा है और कई बार ऐसे ही मामलों को सुन भी चुका है. इसलिए वोट चोरी, EVM हैकिंग का आरोप जनता के जनादेश का अपमान कहा जा सकता है.