‘महिला है सिलेंडर नहीं उठा सकती…’ कहकर नहीं दी थी नौकरी, अब इस सरकारी कंपनी को देना पड़ा मुआवजा, SC ने लगाई फटकार
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा, केवल महिला होने के आधार पर नौकरी न देना नारीत्व का अपमान है.
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महिला है ज्यादा वजन नहीं उठा पाएगी, महिला है सिलेंडर तो बिल्कुल नहीं उठा पाएगी… घर तो घर बाहर भी महिलाओं के काम की लिमिट तय कर दी जाती है. इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOC) ने भी कुछ ऐसा ही किया था, लेकिन अब कंपनी को 12 लाख का हर्जाना देना पड़ा.
मामला 38 साल पुराना है जब इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने एक योग्य महिला को यह कहकर नौकरी देने से इंकार कर दिया था कि महिला सिलेंडर नहीं उठा पाएगी. अब कंपनी के इस कदम पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए बड़ा फैसला सुनाया है.
कोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने मामले की सुनवाई की. उन्होंने IOC के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा, केवल महिला होने के आधार पर नौकरी न देना नारीत्व का अपमान है. कोर्ट ने यह भी कहा,
‘महिलाएं रोज अपने घरों में गैस सिलेंडर उठाती हैं, जब घर में पुरुष मौजूद नहीं होते हैं तो गैस सिलेंडर बदलने का काम महिला ही करती हैं.’
ये कहानी हरियाणा के गुढ़ा गांव की रहने वाली सुमित्रा की है. साल 1988 में सुमित्रा का नाम उन 49 लोगों की लिस्ट में शामिल था. जिनकी सिफारिश IOC के LPG बॉटलिंग प्लांट के लिए की गई थी. जिस कमेटी ने सिफारिश की थी उसकी अध्यक्षता डिप्टी कमिश्नर कर रहे थे.
इसके बाद सुमित्रा ने कंपनी में खलासी, चपरासी या रीफिलिंग हेल्पर के पद के लिए इंटरव्यू दिया. हालांकि नौकरी नहीं मिली, जबकि अन्य दावेदारों को अपॉइंटमेंट लेटर मिल गया था. इसके बाद महिला ने नौकरी नहीं दिए जाने के फैसले के खिलाफ ट्रायल कोर्ट का रुख किया.
ट्रायल कोर्ट ने एक गवाह के बयान का हवाला देते हुए माना कि सुमित्रा को इसलिए नौकरी नहीं दी गई क्योंकि उनके लिए यह माना गया कि वे एक महिला है और सिलेंडर उठाने जैसा काम नहीं कर पाएंगी. ट्रायल कोर्ट ने माना कि सुमित्रा इस नौकरी के लिए पूरी तरह योग्य थीं.
हालांकि, IOC की अपील के बाद 6 अगस्त 1993 को अदालत ने ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को पलट दिया. फिर मामला हरियाणा हाई कोर्ट से होते हुए शीर्ष अदालत तक पहुंचा. इंडियन ऑयल ने अदालत में यह दलील भी दी कि इस काम में भारी LPG सिलेंडर उठाने पड़ते हैं और रात की शिफ्ट होती है, इसलिए शायद अधिकारियों ने महिला को उपयुक्त नहीं माना था. इस पर कोर्ट ने बेंच ने पूछा, या महिलाएं घरों में गैस सिलेंडर नहीं उठातीं?
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38 साल बाद अब जाकर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. चूंकि सुमित्रा अब रिटायरमेंट की उम्र तक पहुंच चुकी हैं. इसलिए शीर्ष अदालत ने कंपनी को नौकरी नहीं लेकिन 12 लाख मुआवजा देने का फैसला सुनाया है. इसी के साथ कोर्ट ने यह भी कहा कि हम भारत में रहते हैं और हर दिन महिलाओं के सम्मान की बात करते हैं. हम कहते हैं कि महिला देवी के समान है. ऐसे में भारत सरकार की एक कंपनी की ओर से यह दलील महिला की गरिमा का अपमान है.