‘पीरियड्स में बेटी खुदको नहीं संभाल पाती…’, कोर्ट में माता-पिता की इमोशनल गुहार, मांगी गर्भाश्य हटाने की परमिशन
दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस अमित महाजन की बेंच ने कहा कि दिव्यांगता कभी भी किसी के शरीर से प्रजनन अंग हटाने की मंजूरी देने का एकमात्र आधार नहीं हो
Follow Us:
दिल्ली हाई कोर्ट में एक माता-पिता अपनी दिव्यांग बेटी के लिए हैरान कर देने वाली मांग लेकर पहुंचे. मां-बाप ने अपनी बेटी के गर्भाश्य को हटवाने की मंजूरी देने की मांग की. हालांकि दिल्ली हाई कोर्ट ने इससे साफ इंकार कर दिया.
दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस अमित महाजन की बेंच ने कहा कि दिव्यांगता कभी भी किसी के शरीर से प्रजनन अंग हटाने की मंजूरी देने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती. अदालत सर्जिकल हस्तक्षेप के आदेश नहीं दे सकती, यह केवल मेडिकल एक्सपर्ट के सुझाव पर हो सकता है.
‘बेटी पीरियड्स में खुदको संभाल नहीं पाती’
यह मामला 21 साल की दिव्यांग लड़की से जुड़ा है जिसे सेरेब्रल पाल्सी है. इस बीमारी में शरीर के एक तरफ अकड़न, कमजोरी और मानसिक अक्षमता होती है. माता-पिता ने कोर्ट को बताया कि उनकी बेटी का जन्म मार्च 2005 में हुआ था और अब वह 21 साल की हो चुकी है.
मां-बाप ने कहा, उनकी बेटी दिव्यांग है और कई साल से स्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा है. पीरियड्स के दौरान उसे तकलीफ होती है और वह खुदको नहीं संभाल पाती. ऐसे में बेटी को इस तकलीफ से मुक्त करवाने के लिए मां बाप चाहते हैं कि उसका गर्भाश्य हटाने की परमिशन मिल जाए. माता-पिता ने यह भी कहा है कि इस बीमारी के कारण उनकी बेटी पीरियड्स के दौरान अपना ध्यान रखने और साफ-सफाई बनाए रखने में असमर्थ है.
कोर्ट ने क्या रास्ता सुझाया?
कोर्ट ने माना कि माता-पिता की यह मांग उनकी बेटी के हित में हो सकती है, लेकिन इसमें उसकी मंजूरी और मेडिकल एक्सपर्ट की राय सबसे अहम है. इस पर लड़की के माता-पिता ने कहा, इस सर्जरी के लिए मरीज की सहमति भी जरूरी होती है, लेकिन उनकी बेटी उस स्थिति में नहीं है जहां वह अपने लिए फैसले ले सके. उन्होंने कोर्ट से इस बारे में विचार करने और गर्भाश्य हटाने की परमिशन देने की मांग की. कोर्ट ने यह भी कहा,
'यह बताना जरूरी होगा कि केवल दिव्यांगता कभी भी किसी महिला की प्रजनन संबंधी आजादी को छीनने का आधार या प्रजनन अंग को हटाने की अनुमति देने का अकेला आधार नहीं हो सकती.’
हालांकि कोर्ट ने यह भी सुझाया कि अगर मेडिकल जांच से यह पता चलता है कि ऐसी सर्जरी याचिकाकर्ता की बेटी की भलाई और उसकी सुरक्षा और सम्मान के लिए बेहतर है तो यह कदम उठाया जा सकता है.
यह भी पढ़ें- पत्नी के काला-मोटा कहने से था आहत, शख्स ने कोर्ट में दी तलाक की अर्जी, फिर अदालत ने जो फैसला सुनाया…
मेडिकल बोर्ड बनाने के आदेश
यह भी पढ़ें
इस मामले के हर पहलू को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने अधिकारियों को एक स्वतंत्र मल्टीडिसिप्लिनरी मेडिकल बोर्ड बनाने और दिव्यांग युवती पर की जाने वाली सर्जरी पर चार सप्ताह के अंदर फैसला लेने का निर्देश दिया. जिसमें कोर्ट मेडिकल एक्सपर्ट की राय और यह सुनिश्चित करने की कोशिश करेगा कि महिला के खराब मेडिकल बैकग्राउंड के बदले ऐसी सर्जरी की जरूरत है या नहीं. इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यह आदेश सर्जरी के लिए खुली छूट की मंजूरी नहीं माना जा सकता है, क्योंकि जजों ने इसे मेडिकल से जुड़ा मामला माना है.