'मैं शामिल नहीं थी...', नेहा बोरा ने दिपके की CJP से बनाई दूरी, कोर्ट में कह दी बड़ी बात
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन को लेकर अभिजीत दिपके और नेहा बोरा के रास्ते अलग होते दिख रहे हैं. नेहा बोरा ने दिल्ली हाई कोर्ट में स्पष्ट किया कि वह कनॉट प्लेस में सीजेपी के प्रदर्शन में शामिल नहीं थीं, बल्कि उन्होंने मंडी हाउस में अलग प्रदर्शन बुलाया था. उन्होंने दिल्ली पुलिस के शांति बॉन्ड नोटिस को भी अदालत में चुनौती दी है.
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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान एक साथ नजर आए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके और आईसा की अध्यक्ष नेहा बोरा के रास्ते अब अलग होते दिखाई दे रहे हैं. ऐसा इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि नेहा बोरा ने अदालत में अपने बयान से सीजेपी के प्रदर्शन से दूरी साफ कर दी है. उन्होंने स्पष्ट किया कि वह कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में सीजेपी की ओर से आयोजित प्रदर्शन में शामिल नहीं थीं, बल्कि उन्होंने मंडी हाउस में एक अलग प्रदर्शन का आह्वान किया था. नेहा बोरा का यह बयान अभिजीत दिपके और सीजेपी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि पिछले कुछ महीनों में दोनों को कई प्रदर्शनों में एक साथ देखा गया था.
दिल्ली हाई कोर्ट में क्या हुआ?
नेहा बोरा ने दिल्ली पुलिस की उस कार्रवाई को हाई कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें उन्हें शांति बनाए रखने के लिए विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (एसईएम) के सामने बॉन्ड भरने का नोटिस दिया गया था. इस मामले में अदालत के सामने पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शन के दौरान नागरिकों के अधिकारों से जुड़े सवाल उठाए गए. लॉ बीट की रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के दौरान नेहा बोरा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि उनकी मुवक्किल सीजेपी के कार्यक्रम का हिस्सा नहीं थीं. उन्होंने अलग स्थान यानी मंडी हाउस में बैठक और प्रदर्शन का आह्वान किया था. इस दलील के जरिए नेहा बोरा के पक्ष ने दोनों प्रदर्शनों के बीच अंतर स्पष्ट करने की कोशिश की.
पुलिस की कार्रवाई पर उठाए सवाल
अदालत में नेहा बोरा के वकील ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने और उनके संपर्क से जुड़ी समस्याओं पर भी चिंता जताई. उनका कहना था कि कई बार लोगों को ले जाने के बाद उनके परिजनों और वकीलों को यह पता लगाने में परेशानी होती है कि उन्हें कहां रखा गया है. उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 22 का हवाला देते हुए हिरासत में लिए गए लोगों के अधिकारों का मुद्दा उठाया. अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी और हिरासत से संबंधित महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है. इसमें गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण बताने और अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने का अधिकार शामिल है. हालांकि, इन अधिकारों का वास्तविक इस्तेमाल मामले की परिस्थितियों और लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करता है.
तिरंगा फहराने के लिए अनुमति का सवाल
सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय ध्वज फहराने की अनुमति को लेकर भी बहस हुई. नेहा बोरा के वकील ने दलील दी कि नागरिकों को तिरंगा फहराने के लिए हर स्थिति में पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होती. उन्होंने पुलिस के नोटिस पर सवाल उठाते हुए कहा कि संबंधित मजिस्ट्रेट ने स्वतंत्र विवेक का इस्तेमाल करने के बजाय पहले से तैयार सामग्री के आधार पर नोटिस जारी किया. हालांकि, राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार भी निर्धारित नियमों और परिस्थितियों के अधीन है. इसलिए इस मुद्दे पर अंतिम कानूनी निष्कर्ष अदालत के आदेश और मामले के तथ्यों के आधार पर ही निकाला जा सकता है.
शुक्रवार की शाम आएगा फैसला
करीब तीन घंटे तक चली सुनवाई के बाद जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने नेहा बोरा की याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अदालत ने 23 अक्टूबर को शाम छह बजे आदेश सुनाने की बात कही थी. इस मामले में दो महत्वपूर्ण सवाल सामने हैं. पहला, पुलिस द्वारा शांति बॉन्ड भरने के लिए जारी नोटिस कितना उचित था. दूसरा, प्रदर्शन के दौरान नागरिकों के अधिकारों की रक्षा किस तरह सुनिश्चित की जानी चाहिए. अदालत का आदेश इन सवालों पर आगे की स्थिति स्पष्ट कर सकता है.
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बताते चलें कि नेहा बोरा का बयान राजनीतिक और छात्र संगठनों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है. लेकिन उनके और अभिजीत दिपके के बीच किसी व्यापक राजनीतिक मतभेद का निष्कर्ष केवल इस कानूनी दलील के आधार पर निकालना जल्दबाजी होगी.