‘अगर समस्या दूर नहीं हुई तो धरना करेंगे…’, सुप्रीम कोर्ट में किस बात से नाराज हुए जज, दे दी धरने की चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने एक साल पहले जिस समस्या को दूर करने के लिए सरकार को कड़े निर्देश जारी किए थे. जब उस पर काम नहीं हुआ तो जज बेहद नाराज हुए. बेंच ने सॉलिसिटर जनरल को चेतावनी तक दे डाली.
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देश की सबसे बड़ी अदालत, जहां वे फरियादी पहुंचते हैं जो तमाम कानूनी पेजिदिगियों से लड़ते हुए भी एक आस बाकी रखते हैं. उनके मन के किसी कोने में एक दबा सा यकीन रहता है कि इस दहलीज में न्याय जरूर मिलेगा, लेकिन क्या हो जब न्याय दिलाने वाले ही सिस्टम की नाकामी के आगे बेबस हो जाएं और खुद धरना देने की बात करने लगें.
दिल्ली में फुटपाथ, क्रॉसिंग और पैदल चलने वालों की सुरक्षा से जुड़े मामले ने सुप्रीम कोर्ट के जजों ने सुनवाई के दौरान धरने पर बैठने की चेतावनी दे डाली. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच मामले की सुनवाई कर रही थी. इस दौरान उन्होंने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल को फटकार लगाते हुए चेतावनी दी.
तब तक घर नहीं जाएंगे…
दरअसल, मसला ये है कि दिल्ली में मथुरा रोड पर नेशनल जूलॉजिकल गार्डन के पास एक व्यस्त चौराहा है. इस भीड़ वाले चौराहे पर आम आदमी और पैदल चलने वालों की जरूरतों, सहूलियतों और सुरक्षा को कोई जगह नहीं दी गई है.
इसे लेकर शीर्ष अदालत के सामने याचिका दायर की गई. सुनवाई के दौरान जज काफी नाराज हुए और सरकार के नुमाइंदों को फटकार लगाई. जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल को समस्या के तुरंत समाधान के लिए कहा. इसके साथ ही बेंच ने चेतावनी भी दी कि अगर अगली सुनवाई से पहले समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो वे हाई कोर्ट के मुख्य गेट पर धरने पर बैठ जाएंगे. इतना ही नहीं जजों ने यहां तक कह दिया,
‘जब तक आप (राज्य सरकार) काम पूरा नहीं कर लेते, तब तक घर नहीं जाएंगे.’
जजों ने पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित क्रॉसिंग बनाने के लिए निर्देश दिए. जजों की यह चेतावनी और धरने की बात मामले की गंभीरता को दर्शाती है. क्योंकि जूलॉजिकल गार्डन के पास चौराहे पर एक साल से राहगीर इसी समस्या से जूझ रहे हैं. जबकि हजारों लोग यहां हर दिन पैदल आवाजाही करते हैं.
सुविधाओं के अभाव में बढ़े हादसे
कोर्ट ने पाया कि ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें पैदल यात्रियों के लिए बने फुट ओवरब्रिज या सबवे का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है या उनका रखरखाव ठीक से नहीं हो रहा है. या फिर उनके लिए क्रॉसिंग या फुटओवर ब्रिज बना ही नहीं.
कोर्ट ने यह भी पाया कि जहां सुविधाएं हैं वहां भी लोग इनका इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं. अक्टूबर 2025 में बेंच ने सड़क सुरक्षा से जुड़े एक मामले में सुनवाई करते हुए अहम निर्देश दिए थे. जिसमें उन्होंने,
- फुटपाथ पर चलते समय पैदल चलने वालों की सुरक्षा
- पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित क्रॉसिंग बनाना
- हेलमेट पहनना, गलत लेन में गाड़ी चलाने और असुरक्षित तरीके से ओवरटेक करने
- आंखों को चकाचौंध करने वाली हेडलाइट
इसके साथ ही बिना अनुमति वाली स्ट्रोब लाइट और गैरकानूनी हूटर के इस्तेमाल से जुड़े निर्देश दिए गए थे.
इसके साथ ही कोर्ट ने सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के 50 शहरों के सड़क हादसों के सालाना आंकड़ों पर भी बात की. अदालत ने इन शहरों में सड़कों का रखरखाव करने वाली एजेंसियों को मौजूदा फुटपाथों और पैदल यात्रियों के लिए बनी क्रॉसिंग का ऑडिट शुरू करने का निर्देश दिया था.
अक्टूबर 2025 में कोर्ट ने इन 50 शहरों में सड़कों का रखरखाव करने वाली एजेंसियों को कार्य-योजना तैयार करने के निर्देश दिए थे. इसमें कहा था ज्यादा भीड़ वाले इलाकों में पैदल यात्रियों के लिए सड़क पार करने की अतिरिक्त सुविधाओं की जरूरत का आकलन कर चरणबद्ध तरीके से सर्वे शुरू किया जाए और फिर काम शुरू हो.
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इन्हीं निर्देशों के तहत 7 अक्टूबर, 2025 के आदेश में कोर्ट ने मथुरा रोड पर नेशनल जूलॉजिकल गार्डन वाले चौराहे को भी केंद्रीत किया था. आदेश में कहा गया था. ‘हम निर्देश देते हैं कि सबसे पहले दिल्ली हाई कोर्ट और मथुरा रोड पर नेशनल जूलॉजिकल गार्डन के पास सड़क पार करने की व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाए.’
सुप्रीम कोर्ट ने दिया था 7 महीने का समय
शीर्ष अदालत ने आदेश में अधिकारियों को इस प्रक्रिया के लिए सात महीने का समय दिया था. इसके एक साल बाद कोर्ट ने अधिकारियों को याद दिलाते हुए जल्द राहगीरों के लिए सुरक्षा कदम उठाने के निर्देश दिए थे, लेकिन इन आदेशों का कोई असर नहीं हुआ और अदालत को फिर एक बार 28 सितंबर को याद दिलाना पड़ा. 16 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान जजों को चेतावनी देनी पड़ी कि अगर निर्देशों पर काम नहीं हुआ तो हम ही धरने पर बैठ जाएंगे. कोर्ट ने साफ कहा,
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‘अगर कोई सड़क है तो यह भी जरूरी है कि पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ तय किया जाए और उसका रखरखाव किया जाए. यह ऐसी जिम्मेदारी है, जिसे कानूनी तौर पर लागू कराया जा सकता है.’अदालत ने यह धारना दूर करने की बात कही कि 'आने-जाने का अधिकार' सिर्फ पहियों पर चलने से जुड़ा है. अदालत ने अपने पिछले कई आदेशों में भी इस बात का प्रमुखता से जिक्र किया है. बेंच ने सुरक्षित क्रॉसिंग, फुटपाथ को जीवन जीने के अधिकार की गारंटी माना है. कोर्ट ने कहा, फुटपाथ पर चलने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है.