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Satluj Controversy: दिलजीत दोसांझ की ‘सतलुज’ की कहानी का असली सच आया सामने, क्या फिल्म आतंकवाद के प्रति सहानुभूति रखती है?

सतलुज’ का पहले नाम पंजाब95 था. इसे 7 फ़रवरी 2025 को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रिलीज़ किया जाना था, लेकिन पहले फिल्म में 27 कट लगाने के लिए कहा गया, इसके बाद ये बढ़कर 127 हो गए. फिल्म के किरदारों के नाम बदलने से लेकर कई सीन तक बदलने की माँग की गई. लेकिन फिल्म के मेकर्स को ये मंजूर नहीं था.

Satluj Controversy: दिलजीत दोसांझ की ‘सतलुज’ की कहानी का असली सच आया सामने, क्या फिल्म आतंकवाद के प्रति सहानुभूति रखती है?
Image Credits:Screengrab/X/@diljitdosanjh
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दिलजीत दोसांझ कि फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर विवाद शुरू हो गया है बड़ी मुश्किलों के बाद रिलीज हुई ये फिल्म OTT पर आते ही हटानी पड़ी. फिल्म को पहले 4 साल तक CBFC से सर्टिफिकेट नहीं मिला था. CBFC की तरफ़ से दिए गए कट्स के निर्देश के बिना ही इसे OTT प्लेटफॉर्म Zee5 पर अनकट रिलीज किया गया था, जिसके बाद इस पर एक्शन हुआ और दो दिन बाद ही इसे ओटीटी से हटा दिया गया. 

भले ही अब सतलुज ओटीटी पर देखने के लिए मौजूद नहीं है, लेकिन 48 घंटों के दौरान कई दर्शक और क्रिटिक्स के माध्यम से इस फिल्म का मैसैज पहुँच चुका था. जहां कई लोगों ने इसे डाउनलोड करके देख लिया, तो वहीं यूट्यूब पर भी इस फिल्म को अनकट देखा गया. 

पंजाब 95 कैसे बनी ‘सतलुज’

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‘सतलुज’ का पहले नाम पंजाब 95 था. इसे 7 फ़रवरी 2025 को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रिलीज़ किया जाना था, लेकिन पहले फिल्म में 27 कट लगाने के लिए कहा गया, इसके बाद ये बढ़कर 127 हो गए. फिल्म के किरदारों के नाम बदलने से लेकर कई सीन तक बदलने की माँग की गई. लेकिन फिल्म के मेकर्स को ये मंजूर नहीं था. जिस पर डायरेक्टर हनी त्रेहन ने नाराजगी भी ज़ाहिर की थी. एक साल तक फिल्म को रिलीज करने का रास्ता साफ नहीं हुआ. अब फिल्म को सतलुज नाम से रिलीज़ किया गया , हालांकि रिलीज के दो दिन बाद ही फिल्म को हटा दिया गया है. 

केंद्र सरकार ने ओटीटी से हटवाई 'सतलुज'

सरकार से जुड़े सूत्रों ने बताया है कि केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 'सुरक्षा कारणों' और आईटी नियम, 2021 के तहत अपने 'दायित्वों' का हवाला देते हुए ज़ी5 को दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' हटाने का निर्देश दिया था. सरकारी सूत्रों ने सोमवार को यह जानकारी दी.

‘सतलुज' आतंकवाद और अलगाववाद के प्रति सहानुभूति रखती है’

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एक वकील ने आरोप लगाया है कि फिल्म 'सतलुज' आतंकवाद, हिंसक उग्रवाद और अलगाववाद के प्रति सहानुभूति रखती है. उन्होंने सरकार से फिल्म के निर्देशक दिलजीत दोसांझ और ZEE5 के खिलाफ FIR दर्ज करने का आग्रह किया है. अधिवक्ता विनीत जिंदल ने बताया कि उन्होंने इस संबंध में गृह मंत्रालय में शिकायत दर्ज कराई है. 

वकील ने कहा, "मैंने फिल्म सतलुज (पंजाब 95) के संबंध में गृह मंत्रालय (MHA) में शिकायत दर्ज कराई है, क्योंकि यह गलत सूचना फैलाती है और आतंकवाद, हिंसक उग्रवाद और 1980 और 1990 के दशक में पंजाब के विद्रोह से संबंधित अलगाववादी विचारधारा के प्रति सहानुभूति रखती है.”

जिंदल ने दावा किया, "यह आरोप लगाया गया है कि फिल्म 1990 के दशक के दौरान पंजाब में उग्रवाद से संबंधित घटनाओं को इस तरह से चित्रित करती है जिससे आतंकवाद, हिंसक उग्रवाद और अलगाववादी विचारधारा का महिमामंडन और रोमांटिकरण होने की संभावना है, उग्रवादी तत्वों के प्रति सहानुभूति पैदा होती है, ऐतिहासिक तथ्यों को विकृत किया जाता है और सशस्त्र बलों के सदस्यों, पुलिस कर्मियों और निर्दोष नागरिकों द्वारा किए गए बलिदानों को कम करके आंका जाता है, जिन्होंने अपनी जान गंवाई.

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फिल्म पर लगा ये बड़ा आरोप?

अनकट सतलुज में कई सीन बेहद ही ख़तरनाक और दहला देने वाले हैं. फिल्म के अंदर हिंसा के सीन छावा और धुरंधर की तरह ही रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं.वहीं इसके संवाद भी बेहद ही हैरान कर देने वाले हैं. सतलुज पर ये भी आरोप लगा है कि  इसमें दिखाए गए सीन और संवाद अलगाववादियों के मंसूबे को बढ़ावा दे सकते हैं. फिल्म में ह्यूमन राइट्स का मुद्दा जिस तरह से उठा. गया है, उससे आतंकवाद के ख़िलाफ़ पुलिसिया कार्रवाई कटघरे में खड़ी होती दिखती है. 

कनाडा में दिलजीत दोसांझ का वो संवाद

फ़िल्म में एक जगह दिखाया गया है कि ह्यूमन राइट्स की लड़ाई लड़ रहे जसवंत सिंह, फिल्म में जिनका किरदार दिलजीत दोसांझ ने निभाया है, उन्हें कनाडा सरकार आमंत्रित करती है.यहां जसवंत सिंह पंजाब की पूरी रिपोर्ट दुनिया के सामने रखते हैं. कनाडा में आयोजित वर्ल्ड सिख ऑर्गेनाइजेशन के उस सम्मेलन में दिलजीत दोसांझ का किरदार कहता है, “मैं एक खास मिशन के लिए यहां आया हूं. इंसानों के अधिकार की एक खास रिपोर्ट आप सबके बीच आया हूं. यह रिपोर्ट पंजाब में पिछले दस साल के दौरान हुई जोर जबरदस्ती को बयां करती है. पंजाब में हजारों मांएं अपने बच्चों का इंतजार कर रही हैं. उनकी आंखों में बस एक ही सवाल है- वे जानना चाहते हैं कि कोई इतना ही बता दें कि उनके बच्चे जीवित हैं या नहीं. जब हम लापता लोगों की तलाश करने निकले तो पता चला कि हजारों लोगों को लावारिस बताकर श्मशानों में जला दिया गया था. आंकड़े बताते हैं कि पूरे पंजाब में करीब पच्चीस हजार लावारिस लाशों को इसी तरह से जलाया गया. हमने सरकार से इसकी अपील की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. कानून का, कौम का, पंजाब का मजाक बनाया गया. ये पीड़ित परिवार सरकार से कुछ नहीं मांगते, बस अपने बच्चों का डेथ सर्टिफिकेट चाहते हैं. जो लोग मुझे आतंकवादी कहते हैं, फिरकापरस्त कहते हैं, आज मैं उन सबसे यह अपील करना चाहता हूं कि ऐ दुनिया वालो, जिन्हें तुम अमन का मसीहा मानते हो, जम्हूरियत के पैगंबर मानते हो, पहले उनकी असलियत जान लो फिर कहो, आतंकवादी कौन है.”

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फिल्म में कई आपत्तिजनक सवांद 

दिलजीत दोसांझ का संवाद भारतीय लोकतंत्र पर सवालिया निशान लगाता है. इसके बाद तो एक संवाद यह भी है कि अगर पुलिसिया जुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाना और उनकी सचाई का पर्दाफाश करना आतंकवादी कहलाना है तो मैं आतंकवादी हूं. फिल्म बनाने पर मिलने वाली छुट के नाम पर ऐसे संवाद को कैसे जस्टीफाई किया जा सकता है, जबकि दुनिया जानती है कि जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था तब पंजाब पुलिस ने जज्बा दिखाते हुए आतंकवाद को जड़ से खत्म किया था. यह फिल्म पुलिस की उस बहादुरी के कारनामों पर बिल्कुल फोकस नहीं करती बल्कि पुलिस को कठघरे में खड़ा करती है.

आतंक के ख़िलाफ़ लड़ने वाली पुलिस का मनोबल टूटता है

फिल्म में ऐसे कई छोटे-छोटे संवाद हैं जिसमें बार-बार पंजाब, क्षेत्रीयता और कौम की दुहाई दी गई है. फिल्म में ये बातें इतनी ज्यादा हैं कि ये आज के दौर में अलगाववादियों की भावनाओं को भड़का सकती हैं. राष्ट्रीय अखंडता के लिए फिल्म का यह पक्ष बिल्कुल पॉज़िटिव नहीं कहा जा सकता. फिल्म से अलगाववादियों का मनोबल बढ़ सकता है. और पुलिस का मनोबल टूटता है. फिल्म पर यही गंभीर आरोप है.

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पंजाब में आतंकवाद के पीछे पाकिस्तान का जिक्र नहीं 

फिल्म के डायरेक्टर हनी त्रेहन और राइटर्स की टीम निरेन भट्ट और उत्सव मैत्रा ने इसमें कुछ बड़ी असावधानियां कर दीं. हालांकि फिल्म में कुछ अहम विंदुओं को छोड़ना उचित नहीं था. वो भी जब मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह के किरदार का गठन हो रहा है, कहानी आगे बढ़ रही है, तो उसमें कहीं भी आतंकवाद की जड़ की तरफ इशारा नहीं किया गया है. पंजाब में आतंकवाद के पीछे पाकिस्तान की साजिश सभी जानते हैं लेकिन फिल्म में इस ओर कोई संकेत भी नहीं है. बल्कि पंजाब पुलिस को विलेन की तरफ पेश करती है. पूरे मसले को देश के अंदर ना सुलझा कर कनाडा सिख फोरम और एमनेस्टी इंटरनेशनल के मंच पर उठाया जाता है

Zee5 ने ‘सतलुज’ को हटाने पर क्या कहा? 

Zee5 ने फिल्म हटाने को लेकर एक आधिकारिक बयान जारी किया है. जिसमें कहा गया है, ‘सतलुज' भले ही थम गई हो, लेकिन उसने जो चर्चा छेड़ी थी, वो अब भी जारी है. आपके अपार प्यार के लिए दिल से धन्यवाद. हमें उम्मीद है कि हम जल्द ही इसे फिर से आपके बीच लेकर आएंगे.’ 

बयान में ये भी कहा गया कि रिलीज के बाद से 'सतलुज' को दर्शकों का ज़बरदस्त प्यार और समर्थन मिला है. हम सतलुज और उससे जुड़े रचनात्मक नज़रिये के साथ मज़बूती से खड़े हैं.’
Zee5 ने कहा है, ‘अगले आदेश तक 'सतलुज' भारत में उपलब्ध नहीं होगी. फ़िल्म को जल्द से जल्द दोबारा उपलब्ध कराने के लिए सभी उचित विकल्पों पर काम किया जाएगा."

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दिलजीत ने जताई नाराजगी जताते हुए क्या कहा? 

फिल्म के लीड एक्टर दिलजीत ने ‘सतलुज’ को हटाने के फैसले पर नाराजगी जताई है. उन्होंने एक वीडियो शेयर किया. जिसमें पंजाब के लोग बड़ी स्क्रीन पर नीचे बैठकर फिल्म देख रहे थे. इसके साथ दिलजीत ने लिखा, अब फिल्म नहीं रुकेगी. खालरा साब की आवाज को कोई नहीं दबा सकता.’ इंस्टाग्राम पर लोगों के सवालों का जवाब देते हुए दिलजीत ने कहा, “अब कोई टेंशन नहीं है. कोई बात नहीं, एक बार जो चीज आ गई वो नहीं जाती. पहले दिन मुझे बस चिंता थी. अब मेरी चिंता खत्म है भाई, मैं अब टेंशन फ्री बैठा हूं. सब देखकर अब हम टेंशन फ्री होकर बैठे हैं. अब हमें कोई टेंशन नहीं है.”

दिलजीत के अलावा इस फिल्म में अर्जुन रामपाल, सुविंदर विक्की, जगजीत संधू और गीतिका विद्या ओहल्यान अलग-अलग रोल में हैं. इसे हनी त्रेहान ने डायरेक्ट किया है. 

कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा? जिन पर बनी सतलुज

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यह फिल्म मशहूर सिख मानवाधिकार और शिरोमणि अकाली दल के कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन, संघर्ष और उनके क्रांतिकारी कदम पर आधारित है. अमृतसर के खालरा गांव में पैदा हुए जसवंत सिंह 1980 के दशक में एक आम बैंक कर्मचारी थे. लेकिन जब उनके अपने करीबी दोस्त और साथी एक-एक कर गायब होने लगे, तो उन्होंने चुप बैठने के बजाय सिस्टम से टकराने का फैसला किया. वे एक मानवाधिकार कार्यकर्ता बन गए. अपनी लंबी और खतरनाक तहकीकात के बाद, आखिरकार उन्होंने अमृतसर नगर निगम की वो फाइलें ढूंढ निकालीं, जिनमें उन सिखों की पूरी जानकारी दर्ज थी जिन्हें पंजाब पुलिस ने मारकर गैर-कानूनी तरीके से जला दिया था. इस खुलासे ने उन्हें पूरी दुनिया में पहचान दिला दी.

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