बदल रहा दुनिया का नक्शा, UN में प्रस्ताव पर 164 देशों का समर्थन, केवल US ने किया विरोध, भारत क्या बोला?
विश्व मानचित्र अब बदलने जा रहा है. UN में इस पर बड़ी पहल हुई है. UN में वोटिंग के बाद ग्लोबल मैप पर अफ्रीका महाद्वीप को अब उसके वास्तविक आकार के अनुसार ही दिखाया जाएगा.
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दशकों से चला आ रहा दुनिया का नक्शा अब बदलने जा रहा है. संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दुनिया के मौजूदा नक्शे को बदलने को लेकर एक प्रस्ताव पारित किया है, जिसके बाद अफ्रीका को उसके असल आकार के बराबर दिखाया जाएगा. अफ्रीकी देशों की ओर से इसके लिए लंबे समय से मांग की जा रही थी. उनका कहना था कि मानचित्र सिर्फ साइज का नहीं बल्कि नैरेटिव का भी बहुत बड़ा आधार है, और यहीं से धारणाएं बनाने और बिगाड़ने की शुरुआत होती है.
मैप बदलने का केवल अमेरिका ने किया विरोध!
आपको बता दें कि इस ऐतिहासिक बदलाव के लिए यूएन में वोटिंग हुई, जिसके पक्ष में फ़्रांस और ब्रिटेन समेत 164 देशों ने अपना समर्थन दिया, वहीं केवल अमेरिका ने इसके विरोध में वोट किया. जबकि 6 देशों ने इस वोटिंग प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया. जहां तक अमेरिका द्वारा वोटिंग के विरोध का सवाल है, तो अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि यह संयुक्त राष्ट्र के काम और उसके मकसद का मज़ाक उड़ाता है.
टोगो मानचित्र में इस बदलाव का मुख्य प्रस्तावक था, जिसका अफ़्रीकन यूनियन के सभी सदस्यों ने भी पुरजोर समर्थन किया था. हालांकि यहां यह बता देना भी जरूरी है कि संयुक्त राष्ट्र में हुई यह वोटिंग बाध्यकारी नहीं है, लेकिन कई वैश्विक संस्थानों, संगठनों और दूसरी जगहों पर इस्तेमाल होने वाले दुनिया के नक्शों में अब बदलाव की शुरुआत हो गई है.
अब अफ्रीका का ग्लोबल मैप पर दिखाया जाएगा वास्तविक आकार
अफ्रीका जैसे बड़े महादेश को ग्रीनलैंड के आकार का दिखाने वाले इस 16वीं सदी के नक्शे की आलोचना लंबे समय से की जा रही है. मर्केटर मानचित्र में दिखाई दे रहे अफ्रीका के आकार से इतर, वास्तव में यह महाद्वीप ग्रीनलैंड से 14 गुना ज्यादा बड़ा है.
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बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक आलोचकों का कहना है कि इससे भूमध्य रेखा के नजदीक स्थित देशों की विकास संबंधी जरूरतों और संभावनाओं को काफी कम करके आंका जाता है.
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किसने किया था 16वीं सदी के नक्शे को डिजाइन?
मर्केटर मानचित्र को 1569 में फ़्लैमिश कार्टोग्राफ़र गेरार्डस मर्केटर ने तैयार किया था. इसे मुख्य रूप से यूरोपीय खोजकर्ताओं को दुनिया भर में समुद्री यात्रा करने में मदद करने के उद्देश्य से डिजाइन किया गया था.
इसी बीच संयुक्त राष्ट्र में ‘करेक्ट द मैप’ प्रस्ताव का भारत ने भी समर्थन कर दिया है. दुनिया के नक्शों में देशों और महाद्वीपों के वास्तविक आकार को अधिक सटीक तरीके से दर्शाने के उद्देश्य को भारी बहुमत से मंजूरी दी. भारत ने कहा कि वो इस मुद्दे पर तकनीकी और पद्धतिगत रूप से तटस्थ रुख का समर्थक है.
संयुक्त राष्ट्र में ‘करेक्ट द मैप’ प्रस्ताव का भारत ने किया समर्थन
भारत ने कहा कि इस समर्थन को किसी एक खास नक्शा प्रणाली, जैसे इक्वल-एरिया मैप प्रोजेक्शन्स, के समर्थन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. भारतीय राजनयिक रघु पुरी ने कहा, "भारत का मानना है कि प्रस्ताव को समान क्षेत्रफल वाले नक्शा प्रोजेक्शन्स के व्यापक इस्तेमाल और विचार को बढ़ावा देने के रूप में समझा जाना चाहिए, न कि इक्वल अर्थ या किसी अन्य विशेष प्रोजेक्शन के समर्थन के तौर पर."
उन्होंने कहा, "अलग-अलग मैप प्रोजेक्शन का इस्तेमाल अलग-अलग भौगोलिक विशेषताओं जैसे आकार, दिशा या दूरी को बेहतर तरीके से दर्शाने के लिए किया जाता है. ऐसे में भारत इस मुद्दे पर तकनीकी और पद्धतिगत रूप से तटस्थ रुख का समर्थक है."
वर्ल्ड मैप बदलने पर क्या बोला भारत?
पुरी के अनुसार, जब उद्देश्य महाद्वीपों के वास्तविक सापेक्ष क्षेत्रफल को दिखाना हो, तब इक्वल एरिया अप्रोच उपयोगी हो सकता है. इससे नक्शों में भूमि के आकार को लेकर पैदा होने वाली दिक्कतों को कम किया जा सकता है.
भारत ने इसी सिद्धांत के आधार पर प्रस्ताव का समर्थन किया है, लेकिन किसी एक कार्टोग्राफिक मेथेडोलॉजी या प्रोजेक्शन को अनिवार्य बनाने का समर्थन नहीं किया है.
अफ्रीकी देशों की अगुवाई में लाए गए इस प्रस्ताव का मकसद खास तौर पर अफ्रीका के आकार को दुनिया के नक्शों में अधिक वास्तविक रूप में दिखाना है. प्रस्ताव में समान क्षेत्रफल दर्शाने वाले यानी इक्वल-एरिया मैप प्रोजेक्शन्स के व्यापक इस्तेमाल को प्रोत्साहित किया गया है.
मामला मुख्य रूप से सदियों से व्यापक रूप से इस्तेमाल किए जा रहे 'मर्केटर प्रोजेक्शन' से जुड़ा है. वर्ष 1569 में तैयार यह प्रक्षेपण नौवहन के लिए बेहद उपयोगी रहा है, लेकिन इसमें भूमध्य रेखा से दूर स्थित क्षेत्रों का आकार वास्तविकता की तुलना में काफी बड़ा दिखाई देता है. इसका असर खास तौर पर यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ग्रीनलैंड जैसे क्षेत्रों पर पड़ता है, जबकि अफ्रीका अपेक्षाकृत छोटा दिखाई देता है.
अफ्रीकी देशों का तर्क है कि नक्शे पर लंबे समय से चली आ रही यह विकृति केवल भौगोलिक गलती नहीं है, बल्कि इससे दुनिया की सामूहिक सोच में अफ्रीका के आकार और महत्व को लेकर गलत धारणा भी बनी है. इसी वजह से ‘करेक्ट द मैप’ अभियान को ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक महत्व दिया जा रहा है.
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यह महासभा का प्रस्ताव गैर-बाध्यकारी है. इसका अर्थ यह है कि दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले सभी नक्शों को तत्काल मर्केटर से बदलना अनिवार्य नहीं होगा. प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य अधिक सटीक और समानुपातिक कार्टोग्राफिक मेथेडोलॉजी को प्रोत्साहित करना है.