‘वंदे मातरम पर आपत्ति बचकानी सोच…’, राष्ट्रगीत का धार्मिककरण करने पर सोनम वांगचुक की पत्नी का प्रहार
गीतांजलि आंग्मो ने न्यूज एजेंसी IANS से बातचीत करते हुए वंदे मातरम पर विपक्ष के एजेंडे और दावों पर वार किया और कहा, अगर हम गायती मंत्र गाते हैं या योगा करते हैं, जिसमें संस्कृत श्लोक हैं, तो संस्कृत को हिंदू धर्म के साथ जोड़ना और राजनीतिक दल के साथ जोड़ना गलत है.
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पर्यावरणविद् और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने पूर्ण 'वंदे मातरम' के गायन का विरोध करने वालों को करारा जवाब दिया है. उन्होंने कहा है कि 'वंदे मातरम' गाने पर इस आधार पर आपत्ति जताना कि इसमें हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र है, 'बचकानी सोच' दिखाता है.
गीतांजलि आंग्मो ने न्यूज एजेंसी IANS से बातचीत करते हुए वंदे मातरम पर विपक्ष के एजेंडे और दावों पर वार किया. उन्होंने कहा,
‘वंदे मातरम को लेकर कई रुकावटें या आपत्तियां हैं. पहले तो लोग कहते हैं कि जब इसे लिखा गया था, तब भारत एक नेशन-स्टेट भी नहीं था, तो यह भारत के लिए कैसे हो सकता है? फिर, वे बताते हैं कि बाद के छंदों में हिंदू देवताओं का जिक्र है, तो दूसरे धर्मों के लोग इसे कैसे गा सकते हैं? अब, यह इसे देखने का बहुत बचकाना तरीका है.’
वंदे मातरम का धार्मिककरण करने वालों पर साधा निशाना
गीतांजलि आंग्मो ने वंदे मातरम को धार्मिक चश्मे से देखने वालों पर निशाना साधा. उन्होंने कहा, भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक बातों को धार्मिक पहचान के छोटे नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने उदाहरण दिया कि
‘जब हम सूफी कविता पढ़ते हैं या कोई गजल सीखते हैं, तो हम उसे उर्दू में सीखते हैं और गाते हैं, लेकिन ऐसा तो नहीं है कि अगर कोई हिंदू सूफी कविता गाएगा तो उसका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा.’ गीतांजलि अंगमो ने कहा कि वेद और उपनिषद 10 हजार साल पुराने ग्रंथ हैं. वे संस्कृत में लिखे गए हैं, उन्होंने कहा, ‘अगर हम इटालियन ओपेरा सीखते हैं तो वो लेटिन में होता है. अगर उसे सीखना है तो हम उस भाषा का इस्तेमाल करते हैं. हम उसको सेलिब्रेट करते हैं.
गीतांजलि आगे कहती हैं, अगर हम गायती मंत्र गाते हैं या योगा करते हैं, जिसमें संस्कृत श्लोक हैं, तो संस्कृत को हिंदू धर्म के साथ जोड़ना और राजनीतिक दल के साथ जोड़ना गलत है. संस्कृत एक बहुत पुरानी भाषा है. उन्होंने कहा कि उच्च मंत्र हमें प्रेरित करते हैं, ताकि हम परेशानियों से और अच्छे से लड़ सकें.
वंदे मातरम के लिए सही नजरिया रखने की नसीहत
गीतांजलि अंग्मो ने आगे कहा, ‘इसलिए, यह कहना कि 'जब दूसरी समस्याएं हैं तो वंदे मातरम क्यों?', सही नजरिया नहीं है. वंदे मातरम दूसरी समस्याओं के खिलाफ नहीं है. वंदे मातरम एक ऐसी भावना है जो हमें उन समस्याओं से लड़ने के लिए प्रेरित करती है.’
उन्होंने कहा कि वंदे मातरम में हिंदू देवी-देवताओं के संदर्भों को केवल धार्मिक दृष्टिकोण से देखने के बजाय प्रतीकात्मक रूप से भी समझा जा सकता है. उन्होंने कहा, ‘दुर्गा हैं, दुर्गा शक्ति का प्रतीक हैं. लक्ष्मी समृद्धि का प्रतीक हैं. इसलिए, अगर किसी को गीत गाने से कोई आपत्ति है, तो आप उसे बदल नहीं सकते। पहले दो छंद इसलिए चुने गए थे, क्योंकि गीत बहुत लंबा था। इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी छंदों को स्वीकार नहीं किया गया था. आप किसी भी कलाकृति को काट नहीं सकते.’
गीतांजलि अंगमो ने कहा कि हम यूरोपियन देशों से अलग हैं. हम अपने देश को सिर्फ एक जमीन का टुकड़ा, एक राजनीतिक इकाई या एक भौगोलिक इकाई के तौर पर नहीं देखते हैं. 1600 के दशक के बाद दुनियाभर में अनेक देश बने हुए हैं. उससे पहले, भारत एक सभ्यतागत, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान था. उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण तक और बाएं से दाएं, हर कोई सवाल करता था, आखिरी सच्चाई क्या है? यह आध्यात्मिक प्रश्न भारत की पहचान थी.’
उन्होंने कहा कि हम भारत को माता कहते हैं. वंदे मातरम हमें यह दिखाता है और फोकस कराता है तो आप अपनी मां (भारत) से कैसे जुड़ेंगे? हमारा जन्म भी मां से होता है और हमारा पालन-पोषण भी मां के जरिए होता है.
गीतांजलि ने कहा, ‘एक राष्ट्रीय गीत के तौर पर यह हमेशा से मौजूद था, लेकिन लोगों की यादों से यह धीरे-धीरे मिटता जा रहा था. आजादी के दिन लालकिले से इसे गाए जाने में 80 साल लग गए, और मुझे लगता है कि यह एक स्वागत योग्य कदम है. क्योंकि 'मां' एक प्रतीक के तौर पर हैं.
राजनीतिक एजेंडा चलाने वालों पर साधा निशाना
सोनम वांगचुक की पत्नी ने विपक्ष का नाम लिए बिना उन पर निशाना साधा. गीतांजलि ने कहा, 'वंदे मातरम' को लेकर असहमति आम नागरिकों के बीच उतनी नहीं है, जितनी राजनीतिक चर्चाओं में दिखाई देती है. उन्होंने कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि आम लोगों के बीच उतनी समस्या है जितनी कभी-कभी राजनीतिक एजेंडे के कारण बनी चर्चाओं में होती है. कई बार, राजनेता अपने एजेंडे के लिए बंटवारे वाली सोच को बढ़ावा देते हैं.’
गीतांजलि कहती हैं, अरबिंदो ने कहा था कि जब बंकिम चंद्र चटर्जी ने 'आनंदमठ' लिखा, तो वे सिर्फ एक उपन्यासकार नहीं थे. वे एक ऋषि थे. ऋषि वे द्रष्टा होते हैं जो देख सकते हैं, इसलिए उन्होंने इस जमीन को सिर्फ एक भौतिक भू-भाग के तौर पर नहीं, बल्कि 'शक्ति', एक जीवित सत्ता, के तौर पर देखा. यह 'मां' एक जीवित सत्ता है, जिसके साथ आप रिश्ता बना सकते हैं. इसलिए इसमें 80 साल नहीं लगने चाहिए थे. शायद अगर हमें यह समझ पहले होती, तो आज हमें भारत के बंटवारे की समस्या का सामना नहीं करना पड़ता.’
उन्होंने आगे कहा, 'वंदे मातरम एक जोश भरने वाला नारा बन गया, क्योंकि इसने लोगों को प्रेरित किया. इसलिए, ध्रुवीकरण की वजह से आप इसे नकार नहीं सकते. आपको इसे स्वीकार करना होगा.’
अंगमो ने भारत के अलग-अलग संस्कृतियों को अपनाने के लंबे इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि देश ने अपनी परंपराओं को छोड़े बिना ही दूसरी संस्कृतियों के असर को अपनाया है. उन्होंने कहा,
‘भारत ने हमेशा बाहर से आए प्रभावों को अपनाया है। चाहे वह मुगल प्रभाव हो या कोई और सांस्कृतिक प्रभाव, भारत ने बहुत कुछ अपनाया और आत्मसात किया है, लेकिन अपनाने का मतलब यह नहीं है कि हमें अपनी उस संस्कृति को दिखाने में शर्म आनी चाहिए जो दस 10,000 साल पहले से मौजूद है. हमें दूसरों को जगह देने के लिए खुद को छोटा नहीं करना चाहिए.’ पूर्व राष्ट्रपति को बताया मिसाल
गीतांजलि अंग्मो ने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का उदाहरण दिया. जिन्होंने भारतीय सोच की अलग-अलग धाराओं को गहराई से समझा था. उन्होंने कहा कि किसी दूसरी परंपरा को जानने-समझने से अपनी आस्था कमजोर नहीं होती.
‘अब्दुल कलाम उपनिषद, गीता और श्री अरबिंदो की रचनाएं पढ़ते थे. मैं खुद सूफी कविताएं पढ़ती हूं. इससे धर्म के दूषित होने का कोई सवाल ही नहीं उठता. अगर कोई हिंदू उर्दू बोलता है या कोई मुसलमान संस्कृत बोलता है, तो इससे उनका धर्म दूषित नहीं होता। बल्कि, हमें एक-दूसरे से सीखना चाहिए.’
गीतांजलि ने बताया वंदे मातरम का मतलब
'वंदे मातरम' का उनके लिए क्या मतलब है, यह बताते हुए अंगमो ने कहा कि यह वाक्यांश मातृभूमि के प्रति सम्मान जाहिर करता है. उन्होंने कहा, ‘वंदे मातरम का सार है, हे मां, मैं तुम्हें नमन करती हूं, हजारों सालों से हमने इस जमीन को सिर्फ एक इलाका नहीं, बल्कि एक मां के तौर पर देखा है. इसलिए, हम उस भावना को छोड़ नहीं सकते.’
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उन्होंने कहा कि भारत को अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाते हुए खुले विचारों वाला और सबको साथ लेकर चलने वाला देश बने रहना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘हमारा दिल इतना बड़ा होना चाहिए कि हम सबको अपना सकें, लेकिन साथ ही हमें अपनी जीवन-शक्ति, अपनी संस्कृति और अपनी विरासत को भी जिंदा रखना चाहिए. यही मेल भारत को एक महान देश बना सकता है.’
वंदे मातरम के खिलाफ कांग्रेस ने पारित किया था प्रस्ताव
वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस और सत्ता पक्ष के बीच विवाद जारी है. इस मुद्दे कांग्रेस कार्यसमिति में चर्चा हुई. जिसमें फैसला किया गया था कि कांग्रेस वंदे मातरम के शुरुआती दो पैराग्राफ ही गाएगी. इस प्रस्ताव को BJP ने बेहद निंदनीय बताया था.
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With IANS Input