साइबर अपराधियों की अब खैर नहीं... लखनऊ में ‘टेक-संगम’ से निकला जांच और फॉरेंसिक का नया रोडमैप
लखनऊ में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार ‘टेक-संगम’ का समापन हुआ। विशेषज्ञों ने साइबर अपराधों से निपटने, फॉरेंसिक तकनीक और वैज्ञानिक साक्ष्यों को मजबूत बनाने पर जोर दिया.
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उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस (यूपीएसआईएफएस), लखनऊ में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार ‘टेक-संगम’ का रविवार को समापन हो गया. समापन सत्र में न्यायपालिका, पुलिस, शिक्षाविदों और तकनीकी विशेषज्ञों ने साइबर अपराध की बदलती चुनौतियों, वैज्ञानिक साक्ष्यों की विश्वसनीयता, डेटा संरक्षण और आधुनिक तकनीकों के प्रभावी इस्तेमाल पर विचार साझा किए. मुख्य अतिथि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस राजीव सिंह ने कहा कि तकनीक के विकास के साथ अपराधी भी अपराध करने के नए रास्ते खोजते हैं. ऐसे में जांच एजेंसियों और फॉरेंसिक विशेषज्ञों को हमेशा अपराधियों से एक कदम आगे रहने की जरूरत है.
समापन समारोह की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन से हुई. संस्थान के संस्थापक निदेशक डॉ. जीके गोस्वामी ने जस्टिस राजीव सिंह को अंगवस्त्र और स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया. इस दौरान सेमिनार में योगदान देने वाले प्रमुख प्रतिभागियों को भी सम्मानित किया गया. कार्यक्रम में तकनीकी नवाचारों को न्यायिक प्रक्रिया और जमीनी पुलिसिंग से जोड़ने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया गया. जस्टिस राजीव सिंह ने कहा कि यूपीएसआईएफएस अब केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि बहुआयामी चिंतन और नवाचार का महत्वपूर्ण मंच बन चुका है. संस्थान का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाना उसकी मेहनत और दूरदर्शिता का प्रमाण है. उन्होंने विद्यार्थियों को मिल रहे उत्कृष्ट कैंपस प्लेसमेंट और क्वांटम तकनीक तथा फॉरेंसिक विज्ञान जैसे आधुनिक क्षेत्रों में प्रशिक्षण की सराहना की. उन्होंने उम्मीद जताई कि यहां से प्रशिक्षित विद्यार्थी भविष्य में वैश्विक स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे और नई तकनीकों के विकास में अग्रणी भूमिका निभाएंगे.
डेटा संरक्षण कानून की व्यावहारिक व्याख्या जरूरी
जस्टिस राजीव सिंह ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) अधिनियम का उल्लेख करते हुए कहा कि कानून लागू होने के बावजूद बाजार में उपलब्ध कानूनी व्याख्याओं में व्यावहारिक और सटीक विश्लेषण की कमी है. उन्होंने संस्थान के विशेषज्ञों से संसदीय बहसों, समिति की रिपोर्टों और विशेषज्ञों के विश्लेषण के आधार पर उच्च स्तरीय मानक कमेंट्री तैयार करने का आह्वान किया. ऐसी सामग्री न्यायपालिका और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए उपयोगी मार्गदर्शक बन सकती है. उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक और डिजिटल साक्ष्यों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी अपराध की जांच. प्रयोगशाला के भीतर मानव डीएनए से छेड़छाड़ जैसे संवेदनशील मामलों का उल्लेख करते हुए उन्होंने जांच प्रक्रिया में सतर्कता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की जरूरत रेखांकित की. उन्होंने विद्यार्थियों से ऐसे समाधान विकसित करने की अपील की, जो सुरक्षित समाज के निर्माण और न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाने में सहायक हों. इस अवसर पर उन्होंने सेंटर ऑफ एक्सपीरियंस फॉर आईटी-ओटी सिक्योरिटी एंड फॉरेंसिक्स का भी शुभारंभ किया.
तकनीक और जमीनी पुलिसिंग का समन्वय आवश्यक
संस्थान के संस्थापक निदेशक डॉ. जीके गोस्वामी ने कहा कि डिजिटल युग में साइबर अपराध और फॉरेंसिक जांच की चुनौतियां लगातार जटिल हो रही हैं. केवल सैद्धांतिक ज्ञान से इन चुनौतियों का सामना नहीं किया जा सकता. इसके लिए तकनीकी नवाचारों को जमीनी पुलिसिंग और न्यायालयों की व्यावहारिक जरूरतों से जोड़ना जरूरी है. उन्होंने कहा कि संस्थान विद्यार्थियों को विश्वस्तरीय अवसर उपलब्ध कराने के साथ पुलिस अधिकारियों को आधुनिक साइबर कानूनों और फॉरेंसिक साक्ष्यों का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दे रहा है. डॉ. गोस्वामी ने कहा कि तकनीक का वास्तविक उद्देश्य आम नागरिक को सुरक्षा और न्याय उपलब्ध कराना है. ‘टेक-संगम’ ने अकादमिक ज्ञान, अत्याधुनिक तकनीक और कानून प्रवर्तन के बीच समन्वय की संभावनाओं को सामने रखा है. विद्यार्थियों की रचनात्मकता, वरिष्ठ अधिकारियों के मार्गदर्शन और न्यायविदों के दृष्टिकोण ने इस आयोजन को महत्वपूर्ण बनाया. उन्होंने आयोजन में योगदान देने वाले संकाय सदस्यों और प्रतिभागियों का आभार जताया.
नवाचार को बाजार तक पहुंचाने पर जोर
प्रो. पवन शर्मा ने उद्योग जगत की अपेक्षाओं, वैश्विक परियोजनाओं, छात्र नवाचारों और मेंटरशिप की भूमिका पर विचार रखे. उन्होंने कहा कि आधुनिक भर्ती प्रक्रिया में केवल ग्रेड प्वाइंट औसत (जीपीए) ही नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की व्यावहारिक क्षमता और पूरे इकोसिस्टम की समझ भी महत्वपूर्ण है. उन्होंने विद्यार्थियों के नवाचारों और उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने में सहयोग की प्रतिबद्धता जताई. उन्होंने विद्यार्थियों से संस्थान में उपलब्ध वैश्विक अवसरों का पूरा लाभ उठाने की अपील की. अहमदाबाद के आईजी राघवेंद्र वत्स ने फॉरेंसिक विज्ञान और उभरती तकनीकों में अंतर्विषयक शिक्षा, व्यावहारिक अनुभव तथा उद्योग की जरूरतों के अनुरूप कौशल विकसित करने पर जोर दिया. उन्होंने शिक्षाविदों, उद्योग प्रतिनिधियों, सरकारी अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों को एक मंच पर लाने के लिए सम्मेलन की सराहना की. उन्होंने कहा कि डीपीडीपी अधिनियम पर हुई विस्तृत चर्चाओं से कानून की समझ और उसके व्यावहारिक अनुप्रयोग को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी.
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वैज्ञानिक साक्ष्य ही निष्पक्ष न्याय का आधार
विशिष्ट अतिथि एसएसएफ के सेनानायक डॉ. सतीश कुमार ने आपराधिक न्याय प्रणाली में वैज्ञानिक और डिजिटल साक्ष्यों की अहमियत बताई. उन्होंने महाकुंभ-2025 के दौरान 65 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं की सुरक्षा व्यवस्था के समन्वय और अपनी टीम को मिले ‘महाकुंभ सेवा पदक’ से जुड़े अनुभव साझा किए. डेविड एप्स्टीन की पुस्तक ‘रेंज’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विभिन्न विषयों का व्यापक ज्ञान बड़े नवाचारों को जन्म देता है. उन्होंने कानून, फॉरेंसिक, क्वांटम कंप्यूटिंग और साइबर सुरक्षा के विद्यार्थियों से मिलकर नए उपकरण, सॉफ्टवेयर और प्रक्रियाएं विकसित करने का आह्वान किया. उन्होंने स्पष्ट किया कि कमजोर साक्ष्य पूरी जांच प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए निष्पक्ष न्याय के लिए सटीक वैज्ञानिक और डिजिटल साक्ष्य अनिवार्य हैं.
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बताते चलें कि ‘टेक-संगम’ सेमिनार ने साइबर अपराधों से निपटने, वैज्ञानिक साक्ष्यों की विश्वसनीयता बढ़ाने और आधुनिक तकनीकों को न्यायिक प्रक्रिया से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण विचार साझा किए. विशेषज्ञों ने उम्मीद जताई कि अकादमिक ज्ञान, तकनीकी नवाचार और जमीनी पुलिसिंग के बेहतर समन्वय से न केवल जांच प्रक्रिया मजबूत होगी, बल्कि सुरक्षित समाज और निष्पक्ष न्याय के लक्ष्य को भी नई गति मिलेगी.