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काशी की गलियों में विराजते बाल भैरव, बटुक भैरव मंदिर की अद्भुत कथा और मान्यता

देवाधिदेव महादेव की नगरी वाराणसी को काशी के नाम से भी जाना जाता है, जहां यह मान्यता है कि यहां के कण-कण में भगवान शिव का वास है. इस पवित्र नगरी में स्थित हर छोटा-बड़ा मंदिर अपनी एक अनोखी कथा और आस्था समेटे हुए है.

काशी की गलियों में विराजते बाल भैरव, बटुक भैरव मंदिर की अद्भुत कथा और मान्यता
Image Credits: IANS
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मान्यता है कि देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी के कण-कण में उनका वास है. बाबा विश्वनाथ की नगरी में स्थित छोटे-बड़े हर एक मंदिर की अपनी एक अद्भुत कथा और मान्यता है, जो भक्तों के विश्वास और भक्ति को और भी मजबूत करता है. ऐसा ही एक मंदिर वाराणसी की तंग गलियों में हैं, जहां भैरव बाबा बाल या बटुक रूप में विराजते और दर्शन मात्र से संतान संबंधी समस्याओं के साथ ही अन्य कष्टों को भी दूर करते हैं. 

बाल रूप में विराजते हैं भैरव बाबा

शिवनगरी काशी में भगवान शिव के रौद्र रूप भैरव के बाल स्वरूप बटुक भैरव का एक छोटा लेकिन अत्यंत शक्तिशाली मंदिर है. भेलूपुर क्षेत्र की घुमावदार और संकरी गलियों में स्थित बटुक भैरव मंदिर भक्तों को सुरक्षा, राहत और हिम्मत के साथ शक्ति भी प्रदान करता है. यहां बाल देवता के रूप में विराजमान बटुक भैरव को बाल विशेश्वर भी कहा जाता है. बटुक भैरव को भगवान शिव और मां काली का पुत्र माना जाता है.

राक्षस वध की पौराणिक कथा

स्थानीय कथाओं के अनुसार, बटुक भैरव राक्षस अबद का वध करने के लिए बाल रूप में प्रकट हुए थे. कथा के अनुसार, अबद को वरदान मिला था कि कोई भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा, केवल एक बच्चा ही अबद का वध कर सकता है. काशी में भैरव बाबा ने यह भूमिका निभाई और भक्तों के रक्षक बन गए. मंदिर में बटुक भैरव की मूर्ति एक बच्चे के रूप में विराजमान हैं, जिनके आसपास ढेरों श्वान नजर आते हैं.

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मंदिर की विशेषताएं और अद्भुत मान्यताएं

काशी के बटुक भैरव की यह छवि कोमलता और भयानक शक्ति दोनों को एक साथ दर्शाती है. मंदिर की सबसे खास बात है इसका अखंड दीपक. यह दीपक लगातार जलता रहता है. भक्तों का विश्वास है कि इस दीपक के तेल में चमत्कारिक शक्ति है. इसे घावों के इलाज या जानवरों के काटने पर लगाया जाता है. मंदिर के आसपास व परिसर में ढेरों कुत्ते बिना किसी को नुकसान पहुंचाए स्वतंत्र रूप से घूमते रहते हैं, जिन्हें बाबा का वाहन माना जाता है. शाम की आरती हो या दिन की वे विशेष रूप से सक्रिय दिखते हैं.

अनोखा प्रसाद और पूजा विधि

मंदिर की खास बात यह भी है कि यहां भक्त प्रसाद के रूप में टॉफी, बिस्किट और खिलौने चढ़ाते हैं. बच्चे की तरह विराजमान देवता को ये चीजें बहुत प्रिय मानी जाती हैं. भक्त खासकर संतान संबंधी कष्ट, सुरक्षा और हिम्मत बढ़ाने के लिए यहां आते हैं. वे उन्हें दुलारते और प्यार करते भी नजर आते हैं. मंदिर में एक हवन कुंड भी है, जहां लोग पूजा-अनुष्ठान करते हैं.

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दर्शन का समय और पहुंचने का मार्ग

बटुक भैरव मंदिर रोजाना सुबह 5 बजे से दोपहर 12 बजे तक और शाम 4 बजे से रात 10 बजे तक खुला रहता है. विशेष तिथि पर समय में थोड़ा बदलाव हो सकता है. आम दिनों के साथ ही रविवार, मंगलवार और भैरव अष्टमी या जन्मोत्सव के दिन मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ लगती है.

बटुक भैरव मंदिर भेलूपुर-कमच्छा क्षेत्र में स्थित है, जो काशी विश्वनाथ मंदिर से लगभग 3 से 4 किलोमीटर दूर है. मंदिर तक वाराणसी जंक्शन या कैंट स्टेशन से ऑटो, टैक्सी या ई-रिक्शा से आसानी से पहुंचा जा सकता है. मुख्य सड़क से मंदिर तक 200-250 मीटर पैदल चलना पड़ता है, क्योंकि गलियां संकरी हैं.

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