पितृ पक्ष में क्यों पहुंचते हैं लोग जगन्नाथ पुरी? भार्गवी नदी के तट पर पिंडदान का महत्व
जगन्नाथपुरी हिंदू धर्मों के चार धामों में से एक है, इस वजह से भी यहां बहने वाली भार्गवी नदी के तट पर लोग बड़ी संख्या में तर्पण करते हैं.
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पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए पितृ पक्ष में तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य किए जाते हैं. इस वर्ष पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) की शुरुआत 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध से और विधिवत प्रतिपदा तिथि से 27 सितंबर को होगी, जिसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा. बड़ी संख्या में लोग पितरों के तर्पण और पिंडदान के लिए ओडिशा के जगन्नाथ पुरी भी आते हैं.
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जगन्नाथ पुरी में पिंडदान का क्या है महत्व?
पितृ पक्ष के दौरान बड़ी संख्या में लोग पूर्वजों के पिंडदान के लिए कई पवित्र नदियों के तट पर पहुंचते हैं. इसी में से एक पवित्र भार्गवी नदी के तट पर भी लोग अपने पूर्वजों के लिए तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य करने के लिए पहुंचते हैं. मान्यता है कि इस नदी के तट पर पिंडदान करने से पितरों के शांति और मोक्ष मिलता है. मान्यता है कि पिंडदान करने से पूर्वक जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाते हैं. इसको 'मुक्ति' का द्वार कहते हैं.
कहा जाता है पितरों के लिए 'मुक्ति' द्वार
जगन्नाथपुरी हिंदू धर्मों के चार धामों में से एक है, इस वजह से भी यहां बहने वाली भार्गवी नदी के तट पर लोग बड़ी संख्या में तर्पण करते हैं. मान्यता है कि जो भी चार धामों की यात्रा करता है, उसे सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है. सभी कोणों से पिंडदान करने से परिवार के सदस्यों को पुण्य मिलता और आत्मा को शांति मिलती है.
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कौए को पितृ दूत और यम से जुड़ा प्रतीक माना गया है; इसी वजह से श्राद्ध के भोजन में कौए को हिस्सा देने की परंपरा रही है. मान्यता है कि कौए के माध्यम से दिया गया भोजन पितरों तक पहुंचता है. धार्मिक मान्यता है कि पितृ पक्ष में पितरों को जल और तिल से तर्पण करने पर उनकी आत्मा तृप्त होती है. पूर्वज परिवार के कल्याण के लिए आशीर्वाद देते हैं.