जिस पर देशकरता है भरोसा
Advertisement

दीपावली पर क्यों खास है पद्मावती अम्मावारी मंदिर का दर्शन? जानिए 'सारे' की परंपरा और आस्था

देवी लक्ष्मी के जाने के बाद भगवान विष्णु भी उनकी तलाश में धरती शेषाचल पर्वत (तिरुमला) पर 'वेंकटेश्वर' नाम से निवास करना शुरू किया और ध्यान में लीन हो गए. दूसरी ओर, पृथ्वी पर नारायणवनम के राजा आकाशराज संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ कर रहे थे.

दीपावली पर क्यों खास है पद्मावती अम्मावारी मंदिर का दर्शन? जानिए 'सारे' की परंपरा और आस्था
Image Credits: AI/IANS
Advertisement

देशभर में दीपावली की रौनक शुरू होते ही मंदिरों में भी उत्सव का माहौल बन जाता है. मां लक्ष्मी के आशीर्वाद पाने के लिए इस पर्व पर हर कोई उनकी अराधना करता है. इसी कड़ी में आंध्र प्रदेश के तिरुचानूर में स्थित श्री पद्मावती अम्मावारी मंदिर में दीपावली का पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. यह मंदिर माता पद्मावती को समर्पित है, जिन्हें देवी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है, इसलिए दीपावली पर यहां का महत्व और भी बढ़ जाता है.

यह मंदिर देवी लक्ष्मी के अवतार माता पद्मावती को समर्पित है 

यह मंदिर देवी लक्ष्मी के अवतार माता पद्मावती को समर्पित है और अपनी भव्यता व शांति के लिए जाना जाता है. चूंकि देवी पद्मावती को साक्षात महालक्ष्मी का अवतार माना जाता है, इसलिए दीपावली के अवसर पर यहां का उत्सव और माहौल देखने लायक होता है.

जानिए 'सारे' की परंपरा और आस्था 

Advertisement

धन की देवी माता पद्मावती के इस धाम में दीपावली के दौरान विशेष पूजा, सजावट और भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, जो इस त्योहार की आध्यात्मिकता को और भी गहरा बना देती है. दीपावली के शुभ अवसर पर एक खास परंपरा भी है, जिसके अनुसार, तिरुमाला पहाड़ियों पर स्थित श्री वेंकटेश्वर स्वामी (भगवान बालाजी) के मुख्य मंदिर से उनकी पत्नी देवी पद्मावती के लिए विशेष उपहार (जिसे 'सारे' कहा जाता है) भेजा जाता है.

इस उपहार में देवी के लिए रेशमी वस्त्र (पट्टू साड़ी), आभूषण, कुमकुम, हल्दी और विशेष नैवेद्य (प्रसाद) शामिल होते हैं. तिरुमाला से इस भेंट को धूमधाम से गाजे-बाजे के साथ तिरुचनूर लाया जाता है और अम्मावारी (देवी) को समर्पित किया जाता है. इसी के साथ ही, दीपावली के शुभ अवसर पर मंदिर के पुजारियों द्वारा 'दीपावली आस्थानम' नामक एक विशेष धार्मिक सभा या दरबार का आयोजन किया जाता है और देवी पद्मावती के गर्भगृह में विशेष पूजा-अर्चना, महा मंगल आरती और विशेष वैदिक मंत्रोच्चार किए जाते हैं.

पूरा मंदिर परिसर स्वर्ण आभा से चमक उठता है

चूंकि दीपावली से ही पवित्र कार्तिक मास के दीपदान की शुरुआत होने लगती है, इसलिए मंदिर परिसर को हजारों पारंपरिक तेल के दीयों (दीपम) और आधुनिक रंग-बिरंगी रोशनी से दुल्हन की तरह सजाया जाता है. शाम के समय जब 'सहस्र दीपलंकरण सेवा' (हजारों दीयों के बीच देवी की सेवा) जैसी रस्में होती हैं, तो पूरा मंदिर परिसर स्वर्ण आभा से चमक उठता है.

माता लक्ष्मी वैकुंठ छोड़कर पृथ्वी लोक (कोल्हापुर) चली आईं 

Advertisement

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, तिरुमला जाने वाले भक्तों की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है, जब तक वे तिरुचिानूर जाकर देवी पद्मावती के दर्शन नहीं कर लेते. दरअसल, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता पद्मावती साक्षात देवी लक्ष्मी का अवतार हैं और करुणा व दया की मूर्ति हैं. यह माना जाता है कि एक सामान्य भक्त सीधे भगवान वेंकटेश्वर (नारायण) के उग्र और ऐश्वर्यपूर्ण रूप के सामने जाने की पात्रता आसानी से नहीं पाता. इसलिए, माता पहले भक्त की भक्ति को स्वीकार कर अपने पति (भगवान वेंकटेश्वर) से उसे स्वीकार करने की सिफारिश करती हैं. इसे 'पुरुषकारम' कहा जाता है. इस मंदिर को लक्ष्मी-नारायण का पुनर्मिलन भी कहा जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु के वक्षस्थल (छाती) पर लात मार दी. चूंकि भगवान विष्णु के हृदय में माता लक्ष्मी का वास होता है, इसलिए माता ने इसे अपना घोर अपमान माना. भगवान विष्णु द्वारा ऋषि को दंड न दिए जाने से रुष्ट होकर माता लक्ष्मी वैकुंठ छोड़कर पृथ्वी लोक (कोल्हापुर) चली आईं और वहां तपस्या करने लगीं.

कन्या वास्तव में माता लक्ष्मी का ही रूप थीं

देवी लक्ष्मी के जाने के बाद भगवान विष्णु भी उनकी तलाश में धरती शेषाचल पर्वत (तिरुमला) पर 'वेंकटेश्वर' नाम से निवास करना शुरू किया और ध्यान में लीन हो गए. दूसरी ओर, पृथ्वी पर नारायणवनम के राजा आकाशराज संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ कर रहे थे. जब वे भूमि जोत रहे थे, तो उन्हें पद्म सरोवर (तालाब) में एक सुनहरे कमल के फूल के ऊपर एक दिव्य कन्या मिली. कमल (पद्म) से प्रकट होने के कारण राजा ने उसका नाम पद्मावती रखा. वह कन्या वास्तव में माता लक्ष्मी का ही रूप थीं.

Advertisement

जब पद्मावती बड़ी हुईं, तो एक बार उनकी मुलाकात जंगल में भगवान वेंकटेश्वर से हुई. दोनों एक-दूसरे को पहचान गए और उनमें प्रेम हो गया. भगवान वेंकटेश्वर ने आकाश राजा से पद्मावती का हाथ मांगा और देवताओं की उपस्थिति में दोनों का भव्य विवाह हुआ.

यह भी पढ़ें

चूंकि माता लक्ष्मी (पद्मावती) धरती पर पहले आईं और उन्होंने ही इस लीला की शुरुआत की थी, इसलिए भक्तों के लिए नियम बनाया गया कि वे नारायण के पास जाने से पहले उनकी आह्लादिनी शक्ति माता पद्मावती के चरणों में शीश नवाएं.

Tags

Advertisement
टिप्पणियाँ 0
G
Guest (अतिथि)
LIVE
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
शॉर्ट्स
वेब स्टोरीज़
होम वीडियो खोजें