'अंतिम चरण में थी डील, लेकिन…', ईरान ने बताई समझौते पर बात बिगड़ने की असली वजह, संदेह के घेरे में पाक
ईरान और अमेरिका के बीच पाकिस्तान में हुई उच्चस्तरीय वार्ता बिना किसी समझौते के खत्म हो गई. ईरान का दावा है कि डील करीब थी लेकिन अमेरिका के बदले रुख के कारण बात नहीं बन सकी, जबकि अमेरिका ने परमाणु मुद्दे पर असहमति को मुख्य वजह बताया.
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ईरान और अमेरिका के बीच पाकिस्तान में हुई हालिया उच्चस्तरीय बातचीत किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी. दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने के लिए यह वार्ता बेहद अहम मानी जा रही थी, लेकिन अंत में मतभेद और गहरे हो गए. ईरानी विदेश मंत्री का दावा है कि समझौता लगभग तय था, लेकिन अमेरिकी रुख ने स्थिति बदल दी। वहीं अमेरिका ने परमाणु मुद्दे को मुख्य बाधा बताया. इसके साथ ही इस समझौते की वार्ता को लेकर पाकिस्तान की भूमिका पर भी लोगों को अब संदेह हो रहा है.
वार्ता में ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व मोहम्मद बगेर गालिबफ ने किया जबकि अमेरिकी पक्ष की कमान उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के हाथ में रही. बातचीत का पहला चरण सीधे संवाद के रूप में हुआ जो करीब ढाई घंटे तक चला. इसके बाद विशेषज्ञ स्तर पर तकनीकी मुद्दों पर चर्चा की गई. दोनों पक्षों ने कई अहम बिंदुओं पर सहमति तलाशने की कोशिश की लेकिन ऊर्जा, सुरक्षा और परमाणु ढांचे जैसे मुद्दों पर दूरी बनी रही.
ईरान का पक्ष
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का कहना है कि बातचीत लगभग अंतिम चरण में थी लेकिन अचानक रखी गई नई शर्तों ने पूरा संतुलन बिगाड़ दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका ने समझौते की दिशा बदल दी और अंतिम क्षण में अतिरिक्त मांगें जोड़ दीं. उनके अनुसार ईरान ने पूरी ईमानदारी से शांति की कोशिश की लेकिन उसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिला. उन्होंने यह भी कहा कि दशकों बाद इतनी गंभीर बातचीत हुई थी लेकिन राजनीतिक दबाव ने रास्ता रोक दिया. ईरान की इस प्रतिक्रिया सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि क्या पाकिस्तान ने ईरान बोलकर बातचीत के टेबल पर लाया था या फिर पाकिस्तान को भी अमेरिका की चाल का कोई पता नहीं था कि बातचीत के दौरान शर्तों में बदलाव होगा.
अमेरिका का रुख
अमेरिका की ओर से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि कई घंटों की कोशिशों के बावजूद कोई अंतिम समझौता नहीं हो सका. उनके अनुसार कुछ मुद्दों पर सकारात्मक चर्चा हुई लेकिन सबसे अहम परमाणु कार्यक्रम पर दोनों पक्षों के बीच गहरी असहमति बनी रही. वहीं पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी बयान देते हुए कहा कि बातचीत का कुछ हिस्सा सफल रहा लेकिन निर्णायक बिंदु पर सहमति नहीं बन पाई. अमेरिकी पक्ष ने यह भी स्पष्ट किया कि वे अपनी सुरक्षा शर्तों से समझौता नहीं करेंगे.
होर्मुज जलमार्ग पर चिंता बरकरार
बातचीत विफल होने के कुछ ही घंटों बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में चिंता बढ़ गई है. अमेरिकी प्रशासन की ओर से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर सख्त रुख अपनाने की बात सामने आई है. रिपोर्टों के अनुसार समुद्री मार्ग पर निगरानी और नियंत्रण बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं, जिससे तेल आपूर्ति पर असर पड़ सकता है. पाकिस्तान ने संकेत दिया है कि वह दोनों देशों के बीच आगे भी मध्यस्थता जारी रखने को तैयार है ताकि बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद न हो। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव और बढ़ा तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा कीमतों पर साफ दिखाई देगा.
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बताते चलें कि मौजूदा परिस्थिति को देखते हुए विश्लेषकों का यह भी कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसका सीधा प्रभाव अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों और व्यापारिक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर पड़ेगा. यदि होर्मुज मार्ग में किसी प्रकार की रुकावट बढ़ती है तो एशिया और यूरोप के कई देशों में ऊर्जा संकट जैसी स्थिति भी बन सकती है. फिलहाल सभी पक्ष बातचीत के दरवाजे खुले रखने की बात कर रहे हैं लेकिन भरोसे की कमी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है. स्थिति पर नजरें अब आगामी दौर की बातचीत पर टिकी हुई हैं.
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