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'हारने वाले शर्तें कैसे थोप सकते हैं...', ट्रंप के सीजफायर बढ़ाने के फैसले को ईरान ने ठुकराया, बोला- नाकेबंदी 'एक्ट ऑफ वॉर'

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव में नया मोड़ आया है. डोनाल्ड ट्रंप ने सीजफायर बढ़ाने का ऐलान किया, लेकिन ईरान ने इसे खारिज कर दिया. कड़े बयानों के बावजूद जमीनी हालात अपेक्षाकृत शांत हैं और एक अनौपचारिक सीजफायर जैसा माहौल बना हुआ है.

'हारने वाले शर्तें कैसे थोप सकते हैं...', ट्रंप के सीजफायर बढ़ाने के फैसले को ईरान ने ठुकराया, बोला- नाकेबंदी 'एक्ट ऑफ वॉर'
Image Source: Donald Trump ( Videograb / @WhiteHouse)- Abbas Araghachi Via IANA
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मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के रूख के चलते तनाव कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने जहां सीजफायर बढ़ाने का ऐलान किया, वहीं ईरान ने इस फैसले को साफ तौर पर खारिज कर दिया. तेहरान का कहना है कि वह किसी भी एकतरफा फैसले को स्वीकार नहीं करेगा और अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर ही आगे बढ़ेगा.

ईरान की सख्त प्रतिक्रिया

ईरान की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया भी सामने आई है. ईरानी संसद के स्पीकर के सलाहकार महदी मोहम्मदी ने तीखे शब्दों में कहा कि ट्रंप का सीजफायर एक्सटेंशन उनके लिए कोई मायने नहीं रखता. उन्होंने यहां तक कह दिया कि 'हारने वाले शर्तें नहीं थोप सकते'. यह बयान साफ दिखाता है कि ईरान झुकने के मूड में बिल्कुल नहीं है और अपने रुख पर कायम है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि बयानबाज़ी जितनी तीखी है, जमीनी हालात उतने ही शांत नजर आ रहे हैं. बड़े स्तर पर न तो कोई हमला हो रहा है और न ही हालात पूरी तरह बेकाबू हुए हैं. समुद्री रास्तों पर जहाज सामान्य तरीके से गुजर रहे हैं और सैन्य गतिविधियां भी सीमित दिखाई दे रही हैं. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि दोनों देश भले ही अलग-अलग बातें कर रहे हों, लेकिन व्यवहार में एक तरह का अनौपचारिक सीजफायर बना हुआ है.

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अमेरिका की दलील

वैश्विक मामलों के जानकारों ने एक संतुलन की स्थिति मान रहे हैं. जहां कोई भी देश खुलकर पीछे हटना नहीं चाहता, लेकिन पूरी ताकत के साथ टकराव भी नहीं बढ़ा रहा. अमेरिका ने सीजफायर बढ़ाने की वजह भी साफ की है. उनका कहना है कि ईरान की सरकार के भीतर अलग-अलग विचारधाराएं हैं, जिससे एकमत निर्णय लेना मुश्किल हो रहा है. इसी कारण पाकिस्तान को और समय दिया जा रहा है ताकि वह दोनों देशों के बीच एक ठोस प्रस्ताव तैयार कर सके.

बातचीत पर अनिश्चितता

हालांकि बातचीत की दिशा अभी भी साफ नहीं है. अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) का इस्लामाबाद दौरा रद्द हो चुका है. दूसरी तरफ ईरान ने भी यह संकेत दे दिया है कि वह तय समय पर अपने प्रतिनिधि नहीं भेजेगा. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची (Abbas Araghchi) ने अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को “एक्ट ऑफ वॉर” बताया है और इसे सीजफायर का उल्लंघन करार दिया है.

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ट्रंप का सख्त रुख

इस बीच ट्रंप का रुख भी सख्त नजर आ रहा है. उन्होंने साफ कहा है कि अगर बातचीत से कोई नतीजा नहीं निकलता है, तो बमबारी दोबारा शुरू हो सकती है. उनका कहना है कि वह शांति चाहते हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर कड़े कदम उठाने से पीछे नहीं हटेंगे. इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका बातचीत और दबाव दोनों रणनीतियों पर एक साथ काम कर रहा है.

होर्मुज स्ट्रेट और न्यूक्लियर मुद्दा

इस पूरे विवाद में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) और ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम सबसे बड़े मुद्दे बने हुए हैं. अमेरिका चाहता है कि इस अहम समुद्री रास्ते पर जहाजों की आवाजाही पूरी तरह सामान्य हो, जबकि ईरान इसे अपने दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल कर रहा है. वहीं ईरान की मांग है कि अमेरिका उसकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाए और इजरायल-हिज्बुल्लाह संघर्ष पूरी तरह खत्म किया जाए.

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बहरहाल, अगर मौजूदा स्थिति को आसान भाषा में समझें, तो दोनों देश अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं. कोई भी खुलकर पीछे हटने को तैयार नहीं है, लेकिन हालात ऐसे भी नहीं हैं कि पूरी तरह युद्ध शुरू हो जाए. यह एक ऐसा दौर है, जहां कागजों पर सीजफायर नहीं है, लेकिन जमीन पर शांति जैसी स्थिति बनी हुई है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह तनाव बातचीत के रास्ते सुलझेगा या फिर आने वाले दिनों में टकराव एक बार फिर तेज होगा. फिलहाल दुनिया की नजरें इसी पर टिकी हुई हैं.

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