जिस पर देशकरता है भरोसा
Advertisement

‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’, मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर यूपी में छिड़ा पोस्टर विवाद, गरमाई सियासत

मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर प्रदेश के अलग-अलग शहरों में लगे पोस्टरों और उन्हें लेकर हुई झड़पों ने मुजफ्फरनगर दंगों को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है.

Author
07 Sep 2026
( Updated: 07 Sep 2026
12:45 PM )
‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’, मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर यूपी में छिड़ा पोस्टर विवाद, गरमाई सियासत
Image Credit: NMF input
Advertisement

मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर रविवार को प्रदेश के कई जिलों में लगाए गए पोस्टरों ने एक बार फिर 2013 की हिंसा और तत्कालीन सपा सरकार की भूमिका को राजनीतिक चर्चा में ला दिया है. लखनऊ, मुजफ्फरनगर, अलीगढ़, सहारनपुर और शामली समेत कई शहरों में लगे पोस्टरों पर बड़े अक्षरों में लिखा गया है, ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे.’

यूपी में खड़ा हुआ पोस्टर विवाद
 
पोस्टर लगाए जाने के दौरान कुछ जिलों में विवाद की स्थिति भी बनी. पोस्टरों का विरोध करने पहुंचे सपा कार्यकर्ताओं और इन्हें लगाने वाले लोगों के बीच कहासुनी और झड़प की बात सामने आई है. इसके बाद स्थानीय स्तर पर पुलिस को भी हस्तक्षेप करना पड़ा. पोस्टरों और उनके विरोध ने दंगों की बरसी पर प्रदेश का राजनीतिक माहौल गरमा दिया है.

'सिर्फ पढ़ना-लिखना काफी नहीं...', साक्षरता दिवस पर CM योगी का बड़ा संदेश, AI को बताया समय की जरूरत

मुजफ्फरनगर दंगों में गई थी 60 से अधिक लोगों की जान
 
सात सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर और आसपास के इलाकों में भड़की सांप्रदायिक हिंसा में 60 से अधिक लोगों की जान गई थी, जबकि 50 हजार से ज्यादा लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा था. हालात इतने बिगड़ गए थे कि हिंसा पर नियंत्रण के लिए सेना की मदद लेनी पड़ी थी.
 
उस समय प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार थी. कानून-व्यवस्था संभालने और समय रहते हिंसा रोकने में नाकामी को लेकर सरकार पर गंभीर सवाल उठे थे. सपा सरकार पर दंगाइयों को राजनीतिक संरक्षण देने के आरोप भी लगे थे, जिन्हें पार्टी खारिज करती रही है.

Advertisement

यह भी पढ़ें

दंगों को लेकर तत्कालीन सरकार पर विपक्ष ने उठाये थे सवाल 
 
दंगों के बाद राहत शिविरों और विस्थापित परिवारों की स्थिति को लेकर भी तत्कालीन सरकार विपक्ष के निशाने पर रही थी. वहीं, उस दौर में सैफई महोत्सव को लेकर भी अखिलेश सरकार की आलोचना हुई थी. विपक्ष ने इसे दंगा पीड़ितों के प्रति सरकार की असंवेदनशीलता से जोड़कर सवाल उठाए थे.
 
अब 13 साल बाद दंगों की बरसी पर प्रदेश के अलग-अलग शहरों में लगे पोस्टरों और उन्हें लेकर हुई झड़पों ने मुजफ्फरनगर दंगों को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है.

Tags

Advertisement
टिप्पणियाँ 0
G
Guest (अतिथि)
LIVE
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
अधिक
Advertisement
Advertisement
शॉर्ट्स
वेब स्टोरीज़
होम वीडियो खोजें