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मध्य प्रदेश ने रचा इतिहास, वक्फ बोर्ड में पहली बार शामिल किए गए गैर-मुस्लिम; जिन दो हिंदुओं को दी जगह, वे कौन?

मध्य प्रदेश ने वक्फ कानून के संशोधित प्रावधानों को लागू कर दिया है. इसके तहत वक्फ बोर्ड का गठन किया गया है. वक्फ बोर्ड के इतिहास में पहली बार किसी हिंदू को सदस्य बनाया गया है. मोहन यादव सरकार ने पुनर्गठित बोर्ड में दो हिंदुओं को भी जगह दी है.

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06 Jul 2026
( Updated: 06 Jul 2026
01:46 PM )
मध्य प्रदेश ने रचा इतिहास, वक्फ बोर्ड में पहली बार शामिल किए गए गैर-मुस्लिम; जिन दो हिंदुओं को दी जगह, वे कौन?
MP Waqf Board (File Photo) Image Source: IANS
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मध्य प्रदेश के वक्फ बोर्ड में इतिहास रचा गया है. मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड देश का पहला बोर्ड बन गया है जिसमें गैर-मुस्लिम (हिंदू) सदस्यों की नियुक्ति हुई है. आपको बता दें कि राज्य सरकार ने वक्फ बोर्ड का पुनर्गठन किया है. इसमें इंदौर के मनोज मालपानी और गुना के राघौगढ़ निवासी अनिमेष भार्गव को सदस्य बनाया गया है. वहीं, सनवर पटेल को दोबारा बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है.

पहली बार वक्फ बोर्ड में शामिल किए गए दो हिंदू सदस्य!

इस हवाले से मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार ने दावा किया है कि वक्फ (संशोधन) अधिनियम-2025 के संशोधित प्रावधानों के तहत बोर्ड का पुनर्गठन करने वाला मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है. आपको बता दें कि पुनर्गठित बोर्ड में कुल 10 सदस्य हैं. इससे पहले वक्फ अधिनियम-1995 के तहत राज्य वक्फ बोर्ड के सदस्य केवल मुस्लिम समुदाय से ही हो सकते थे.

हालांकि, कुछ सदस्यों को राज्य सरकार भी नामित किया करती थी, लेकिन वे भी मुस्लिम समुदाय से ही होते थे; उनके लिए भी मुसलमान होना अनिवार्य होता था. मालूम हो कि 2025 में कानून में संशोधन के बाद प्रत्येक राज्य वक्फ बोर्ड में कम-से-कम दो गैर-मुस्लिम सदस्यों की अनिवार्यता तय कर दी गई है.

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मध्य प्रदेश में पुनर्गठित वक्फ बोर्ड में कौन क्या है?

अध्यक्षः डॉ. सनवर पटेल (उज्जैन)

सदस्य:

नजमा हेपतुल्ला (नई दिल्ली)

आतिफ अकील, विधायक भोपाल (उत्तर)

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फैजान खान (उज्जैन)

बहन फातेमा चौधरी (इंदौर)

शाइस्ता सुल्तान, पार्षद बैरसिया (भोपाल)

शबाना खान, पार्षद (रतलाम)

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मनोज मालपानी (इंदौर)

अनिमेष भार्गव (राघौगढ़, गुना)

आयुक्त, पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यक कल्याण

दो हिंदू सदस्यों के अलावा बोर्ड में नजमा हेपतुल्ला को फिर से जगह दी गई है. उनका नाम पहले के कार्यकाल के आधार पर शामिल किया गया है. उनका कार्यकाल अप्रैल 2028 तक है. मध्य प्रदेश राजपत्र (असाधारण) में 4 जुलाई 2026 को जारी अधिसूचना के अनुसार, राज्य शासन ने वक्फ अधिनियम की धारा 13(1) के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह पुनर्गठन किया है.

दो हिंदू सदस्य कौन-कौन हैं?

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अनिमेष भार्गव: गुना जिले के राघौगढ़ के रहने वाले हैं. उन्होंने फाइनेंस स्ट्रीम में MBA किया है. उन्हें वित्त क्षेत्र में 18 वर्षों का और वक्फ से संबंधित मामलों में 8 वर्षों का कार्य करने का अनुभव है. वर्तमान में वे मध्य प्रदेश भाजपा में मीडिया पैनलिस्ट हैं.

मनोज मालपानी: इंदौर के रहने वाले हैं. उनकी शिक्षा-दीक्षा बीकॉम तक हुई है. वे पिछले 30 सालों से संघ और आनुषांगिक संगठनों से जुड़े रहे हैं. उन्हें वक्फ मामलों में लंबे समय तक कार्य करने का अनुभव है और छात्र जीवन से सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं. हालांकि, उन्होंने राजनीति से दूरी बनाई हुई है और संघ को सदैव सेवा का माध्यम माना है.

वक्फ संशोधन विधेयक को बीते साल संसद से मंजूरी मिली थी

आपको बता दें कि बीते साल वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 को संसद से मंजूरी मिली थी. इस विधेयक का उद्देश्य वक्फ अधिनियम में संशोधन के जरिए वक्फ बोर्ड के ढांचे में बदलाव करना और कानूनी विवादों को कम करना है. इस दौरान पेश बिल के ड्राफ्ट में सभी के सुझावों को ध्यान में रखा गया. वक्फ बिल के मूल ड्राफ्ट और मौजूदा ड्राफ्ट में कई बदलाव किए गए. इसमें जेपीसी के ज्यादातर सुझाव स्वीकार किए गए.

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वक्फ बोर्ड के 11 सदस्य में तीन गैर मुस्लिम सदस्य का प्रावधान

नए कानून के तहत वक्फ बोर्ड के 11 सदस्यों में तीन से ज्यादा गैर-मुस्लिम नहीं होंगे, इसका प्रावधान किया गया है, ताकि मुसलमानों के हितों के साथ समझौता न हो. जमीनी विवाद के निपटारे को लेकर वक्फ में कलेक्टर से ऊपर के अफसर को रखा गया है.

'कलेक्टर को प्रॉपर्टी विवाद पर फैसला लेने का अधिकार नहीं'

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इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल 15 सितंबर को वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए इस पर पूरी तरह से रोक लगाने से इनकार कर दिया था. कोर्ट ने कहा था कि किसी भी कानून की संवैधानिकता की धारणा होती है और उसे केवल अत्यंत दुर्लभ मामलों में ही रोका जा सकता है. हालांकि, कोर्ट ने वक्फ कानून के कुछ प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाई थी. कोर्ट के फैसले के बाद कलेक्टर को भी प्रॉपर्टी विवाद पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं रह गया है.

तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने इस मामले में अंतरिम राहत पर फैसला सुनाया था. सुप्रीम कोर्ट ने 22 मई को फैसला सुरक्षित रखा था. इस दौरान कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि कानून के संपूर्ण प्रावधानों पर रोक लगाने का कोई आधार नहीं है, लेकिन कुछ धाराओं पर अंतरिम संरक्षण जरूरी है.

पूर्व सीजेआई बीआर गवई ने टिप्पणी की थी कि, "हमने प्रत्येक धारा को दी गई प्रथम दृष्टया चुनौती पर विचार किया है. हमने पाया कि कानून के संपूर्ण प्रावधानों पर रोक लगाने का कोई मामला नहीं बनता. हालांकि, कुछ धाराओं को संरक्षण दिए जाने की जरूरत है." कोर्ट ने यह भी कहा कि पूर्वधारणा हमेशा कानून की संवैधानिकता के पक्ष में होती है और हस्तक्षेप सिर्फ दुर्लभतम मामलों में किया जाता है. फैसला देते हुए सीजेआई बीआर गवई ने कहा कि वे नए कानून के कुछ प्रावधानों पर रोक लगा रहे हैं.

कोर्ट ने आदेश में कहा कि कलेक्टर को नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों का निर्णय करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. कलेक्टर को ऐसी शक्तियों से संबंधित प्रावधान पर रोक रहेगी. इसके अलावा, कोर्ट ने फैसला दिया कि वक्फ करने के लिए 5 साल की इस्लाम की प्रैक्टिस करने की अनिवार्यता पर रोक लगाई जाती है.

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सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ निकायों में गैर-मुस्लिमों को शामिल करने के प्रावधान पर भी विचार किया. कोर्ट ने आदेश दिया कि वक्फ बोर्ड में 3 से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य शामिल नहीं किए जाने चाहिए. फिलहाल वक्फ परिषदों में कुल 4 से अधिक गैर-मुस्लिम शामिल नहीं किए जाएंगे.

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