Advertisement

आसमान से भी ऊपर देशभक्ति, ऐसी है राकेश शर्मा की कहानी

अंतरिक्ष यात्री बनना सिर्फ एक रोमांचक अनुभव नहीं, बल्कि खुद को गलाने जैसी प्रक्रिया थी. जब 1982 में उनका चयन हुआ, तो उन्हें मॉस्को के पास 'स्टार सिटी' भेजा गया. वहां का प्रशिक्षण किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था.

Author
13 Jan 2026
( Updated: 13 Jan 2026
03:57 PM )
आसमान से भी ऊपर देशभक्ति, ऐसी है राकेश शर्मा की कहानी

'ऊपर से भारत कैसा दिखता है आपको...' तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का यह सवाल जब सोवियत अंतरिक्ष स्टेशन 'सैल्यूट-7' पहुंचा, तो एक पल के लिए सन्नाटा छा गया. फिर एक शांत लेकिन आत्मविश्वास से भरी आवाज गूंजी, 'सारे जहां से अच्छा.'

3 अप्रैल 1984 की वह शाम सिर्फ एक मिशन की सफलता नहीं थी, बल्कि 70 करोड़ भारतीयों के गर्व की हुंकार थी. विंग कमांडर (तब स्क्वाड्रन लीडर) राकेश शर्मा ने जब सोयूज टी-11 के जरिए अंतरिक्ष की दहलीज लांघी, तो वह सिर्फ एक पायलट नहीं, बल्कि करोड़ों सपनों के दूत बन गए थे.

आसमान से पुराना रिश्ता

13 जनवरी 1949 को पंजाब के पटियाला में जन्मे राकेश शर्मा के लिए आसमान कभी भी अजनबी नहीं रहा. हैदराबाद की गलियों में बड़े होते हुए उन्होंने जो सपने देखे, उन्हें 1966 में नेशनल डिफेंस एकेडमी (एनडीए) में प्रवेश के साथ पंख मिल गए. उनकी असली परीक्षा 1971 के युद्ध में हुई, जहां एक युवा पायलट के तौर पर उन्होंने मिग-21 उड़ाते हुए 21 खतरनाक मिशनों को अंजाम दिया. यह वही फौलादी इरादे थे, जिन्होंने उन्हें बाद में 150 कद्दावर पायलटों की भीड़ में अंतरिक्ष यात्रा के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवार बनाया.

अंतरिक्ष यात्री बनना: एक अग्निपरीक्ष

अंतरिक्ष यात्री बनना सिर्फ एक रोमांचक अनुभव नहीं, बल्कि खुद को गलाने जैसी प्रक्रिया थी. जब 1982 में उनका चयन हुआ, तो उन्हें मॉस्को के पास 'स्टार सिटी' भेजा गया. वहां का प्रशिक्षण किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था.

उन्हें मात्र दो महीने में रूसी भाषा सीखनी थी, क्योंकि अंतरिक्ष यान के सारे मैनुअल रूसी में थे. बैंगलोर में उन्हें 72 घंटों तक एक बंद कमरे में अकेला रखा गया, ताकि यह जांचा जा सके कि वे अंतरिक्ष के अकेलेपन को झेल सकते हैं या नहीं. 'सेंट्रीफ्यूज' मशीनों में उनके शरीर पर गुरुत्वाकर्षण का इतना दबाव डाला जाता था कि सांस लेना भी दूभर हो जाता था. लेकिन राकेश शर्मा अडिग थे. उनके साथ बैकअप के तौर पर विंग कमांडर रवीश मल्होत्रा भी थे, जो अंतिम समय तक उनके साथ साए की तरह डटे रहे.

जब भारत पहुंचा अंतरिक्ष की दहलीज पर

3 अप्रैल 1984 को बैकोनूर कॉस्मोड्रोम से जब सोयूज-यू रॉकेट ने उड़ान भरी, तो भारत दुनिया का 14वां देश बन गया जिसने अपना मानव अंतरिक्ष में भेजा था. राकेश शर्मा ने अंतरिक्ष में 7 दिन, 21 घंटे और 40 मिनट बिताए.

अंतरिक्ष से बदला भारत का नक्शा

राकेश शर्मा का मिशन सामरिक रूप से भी महत्वपूर्ण था. 'टेरा' नामक सुदूर संवेदन प्रयोग के तहत उन्होंने अंतरिक्ष से भारत की ऐसी तस्वीरें लीं, जिन्होंने देश का नक्शा बदलने में मदद की. हिमालय में छिपे जल संसाधनों से लेकर वनों के घनत्व तक, उनकी ली गई तस्वीरों ने भारत के कई वर्षों के हवाई सर्वे का काम कुछ घंटों में कर दिया.

यह भी पढ़ें

आज जब भारत अपने स्वदेशी 'गगनयान' मिशन की तैयारी कर रहा है, तो 77 वर्षीय राकेश शर्मा उसके सबसे बड़े मार्गदर्शक हैं. हाल ही में जब ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला का चयन एक्सियम-4 मिशन के लिए हुआ, तो राकेश शर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह उनके लिए 'डेजा-वू' (पुरानी यादों का ताजा होना) जैसा है.

टिप्पणियाँ 0

LIVE
Advertisement
Podcast video
Arunachal पर कब्जा करने की कोशिश करने वाले ‘घुसपैठियों’ को उठाकर फेंक देने की सीधी धमकी | Taro Sonam
Advertisement
Advertisement
शॉर्ट्स
वेब स्टोरीज़
होम वीडियो खोजें