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मोदी-ताकाइची की मुलाकात से घबराया चीन! जिनपिंग को किस बात का है डर? सामने आई बड़ी वजह

Modi Takaichi Meeting: नरेंद्र मोदी और जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची की मुलाकात के बाद एशिया की राजनीति में हलचल तेज हो गई है. इस बैठक में दोनों देशों ने कई अहम क्षेत्रों में साथ मिलकर काम करने का फैसला किया. बैठक खत्म होने के कुछ ही घंटो बाद चीन की प्रतिक्रिया भी सामने आ गई.

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04 Jul 2026
( Updated: 04 Jul 2026
10:26 AM )
मोदी-ताकाइची की मुलाकात से घबराया चीन! जिनपिंग को किस बात का है डर? सामने आई बड़ी वजह
Image Source: PM Modi/x Post
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Modi Takaichi Meeting: नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची की मुलाकात के बाद एशिया की राजनीति में हलचल तेज हो गई है. इस बैठक में दोनों देशों ने कई अहम क्षेत्रों में साथ मिलकर काम करने का फैसला किया. बैठक खत्म होने के कुछ ही घंटो बाद चीन की प्रतिक्रिया भी सामने आ गई. चीन ने कहा कि किसी भी देश के बीच होने वाला सहयोग किसी तीसरे देश को निशाना बनाने वाला नहीं होना चाहिए और छोटे छोटे रणनीतिक गुट बनाने से बचना चाहिए. देखने में यह एक सामान्य बयान लग सकता है, लेकिन इसके पीछे चीन की बढ़ती चिंता साफ दिखाई देती है. दरअसल, भारत और जापान अब केवल अच्छे दोस्त नहीं रह गए हैं, बल्कि ऐसे क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ा रहे हैं जिनका सीधा असर चीन की ताकत और उसके प्रभाव पर पड़ सकता है..

किन क्षेत्रों में बढ़ा भारत और जापान का सहयोग?

इस शिखर बैठक में दोनों देशों ने रक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), महत्वपूर्ण खनिज (क्रिटिकल मिनरल्स), ऊर्जा सुरक्षा और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन जैसे कई अहम क्षेत्रों में मिलकर काम करने का फैसला किया. आज दुनिया में यही वे क्षेत्र हैं जिन्हें भविष्य की ताकत माना जा रहा है.सेमीकंडक्टर के बिना मोबाइल, कंप्यूटर, कार और रक्षा उपकरण बनाना मुश्किल है, जबकि क्रिटिकल मिनरल्स इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरियों और आधुनिक हथियारों के लिए बेहद जरूरी हैं. ऐसे में भारत और जापान का इन क्षेत्रों में साथ आना चीन के लिए चिंता की वजह बन गया है.

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क्रिटिकल मिनरल्स पर चीन की पकड़ को मिल सकती है चुनौती

दुनिया के कई जरूरी दुर्लभ खनिजों की प्रोसेसिंग में आज चीन का दबदबा है. कई बार चीन ने इन खनिजों के निर्यात को विदेश नीति के एक हथियार की तरह भी इस्तेमाल किया है. अब भारत और जापान मिलकर ऐसी सप्लाई चेन तैयार करना चाहते हैं, जिससे किसी एक देश पर निर्भरता कम हो सके. भले ही यह बदलाव तुरंत न आए, लेकिन लंबे समय में इससे चीन का प्रभाव कमजोर हो सकता है. यही वजह है कि बीजिंग इस साझेदारी को सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक चुनौती के रूप में देख रहा है.

रक्षा क्षेत्र में भी बढ़ी साझेदारी

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इस बैठक की एक और बड़ी उपलब्धि रक्षा क्षेत्र में सहयोग रही. दोनों देशों ने यूनिफाइड कॉम्प्लेक्स रेडियो एंटीना (UNICORN) नाम की पहली संयुक्त रक्षा परियोजना शुरू करने की घोषणा की. माना जा रहा है कि इससे नौसेना की ताकत बढ़ाने में मदद मिलेगी. जापान लंबे समय तक हथियारों के निर्यात को लेकर बेहद सख्त नीति अपनाता रहा, लेकिन अब वह दूसरे देशों के साथ रक्षा उत्पादन और तकनीक साझा करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. अगर जापान की आधुनिक तकनीक और भारत की उत्पादन क्षमता एक साथ आती है, तो भविष्य में ड्रोन, नौसैनिक उपकरण और कई उन्नत रक्षा प्रणालियों का निर्माण तेज हो सकता है. यही बात चीन को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है.

क्वाड की मजबूती भी चीन को खटक रही है

भारत और जापान ने इस बैठक में क्वाड (Quad) के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराई. इस समूह में भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं. इन चारों देशों का उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति, सुरक्षित समुद्री मार्ग और नियमों पर आधारित व्यवस्था को मजबूत करना है. हालांकि चीन लंबे समय से क्वाड को अपने खिलाफ बन रहे एक रणनीतिक समूह के रूप में देखता है. इसलिए जब भारत और जापान इस मंच को और मजबूत करने की बात करते हैं, तो चीन इसे अपने क्षेत्रीय प्रभाव के लिए चुनौती मानता है.

जापान की नई नीति ने बढ़ाई चीन की चिंता

जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची को चीन पहले से ही एक सख्त नेता के रूप में देखता है. उन्होंने ताइवान, रक्षा नीति और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर स्पष्ट और मजबूत रुख अपनाया है. इसके अलावा जापान ने फिलीपींस, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया और नाटो देशों के साथ भी सुरक्षा सहयोग बढ़ाया है. ऐसे में भारत का जापान के साथ तेजी से मजबूत होता रिश्ता चीन के लिए और बड़ी चिंता बन गया है, क्योंकि भारत इस क्षेत्र की एक ऐसी ताकत है जो आर्थिक और सैन्य दोनों स्तरों पर संतुलन बनाने की क्षमता रखता है.

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विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और जापान की यह साझेदारी सिर्फ किसी एक समझौते तक सीमित नहीं है. दोनों देश धीरे-धीरे ऐसे क्षेत्रों में साथ आ रहे हैं जो आने वाले वर्षों में दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था तय करेंगे. सप्लाई चेन, नई तकनीक, रक्षा और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में बढ़ता सहयोग एक मजबूत और भरोसेमंद साझेदारी की ओर इशारा करता है. चीन की सबसे बड़ी चिंता यही है कि अगर यह सहयोग लगातार बढ़ता रहा, तो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसका मौजूदा दबदबा पहले जैसा नहीं रह पाएगा. यही वजह है कि भारत और जापान की बढ़ती नजदीकियों पर बीजिंग लगातार नजर बनाए हुए है..

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