MP में BJP का नया फॉर्मूला, अब रील्स-पोस्ट तय करेंगी नेताओं का कद; फॉलोअर्स घटे तो जाएगी कुर्सी!
BJP: मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले की कोलारस विधानसभा से सामने आया एक मामला इसी बदलती राजनीति की ओर इशारा करता है. यहां बीजेपी विधायक महेंद्र यादव ने पार्टी के स्थानीय पदाधिकारियों के लिए सोशल मीडिया फॉलोअर्स को भी एक तरह के ‘डिजिटल रिपोर्ट कार्ड’ का हिस्सा बनाने की बात कही है
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BJP: 21वीं सदी की राजनीति का तरीका तेजी से बदल रहा है. पहले नेताओं की ताकत का अंदाजा उनकी रैलियों में जुटने वाली भीड़, गांव की चौपालों में उनकी पकड़ और लोगो के बीच उनकी मौजूदगी से लगाया जाता था. लेकिन अब वहीं तस्वीर कुछ अलग है. लोगों के हाथ मे स्मार्टफोन है और उनकी नजरें लगातार सोशल मीडिया पर रहती हैं. ऐसे में नेता भी समझने लगे हैं कि जनता के बीच अपनी मौजूदगी बनाए रखने के लिए जमीन के साथ-साथ डिजिटल दुनिया में भी मजबूत होना जरूरी है.
मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले की कोलारस विधानसभा से सामने आया एक मामला इसी बदलती राजनीति की ओर इशारा करता है. यहां बीजेपी विधायक महेंद्र यादव ने पार्टी के स्थानीय पदाधिकारियों के लिए सोशल मीडिया फॉलोअर्स को भी एक तरह के ‘डिजिटल रिपोर्ट कार्ड’ का हिस्सा बनाने की बात कही है. यानी अब किसी नेता का काम सिर्फ क्षेत्र में लोगों के बीच रहना और संगठन के लिए काम करना ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर उसकी पहुंच कितनी है, यह भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
पद चाहिए तो सोशल मीडिया पर भी मजबूत होना होगा
कोलारस में हुई मंडल बैठक के दौरान विधायक महेंद्र यादव ने पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी बढ़ाने की सलाह दी. बैठक में उन्होंने अलग-अलग संगठनात्मक पदों के लिए फॉलोअर्स की न्यूनतम संख्या का लक्ष्य भी बताया.
बताया गया कि मंडल अध्यक्ष के लिए कम से कम 25 हजार फॉलोअर्स, शक्ति केंद्र प्रमुख के लिए 5 हजार फॉलोअर्स और बूथ अध्यक्ष के लिए 1 हजार फॉलोअर्स का लक्ष्य रखा गया है. इसका मतलब साफ है कि संगठन के पदों पर काम करने वाले नेताओं से अब सोशल मीडिया पर भी सक्रिय रहने और अपनी डिजिटल पहुंच बढ़ाने की उम्मीद की जा रही है.
यह सिर्फ फॉलोअर्स की संख्या तक सीमित नहीं रहने वाली है. बैठक में यह बात भी सामने आई कि आने वाले समय में नेताओं की सोशल मीडिया ग्रोथ को भी देखा जा सकता है. यानी किसी नेता के फॉलोअर्स लगातार बढ़ रहे हैं या नहीं, उसकी पोस्ट और वीडियो पर लोगों की प्रतिक्रिया कैसी है और वह सोशल मीडिया के जरिए कितने लोगों तक पहुंच बना पा रहा है, इन चीजों को भी संगठन की समीक्षा का हिस्सा बनाया जा सकता है.
फॉलोअर्स कम हुए तो पद पर भी पड़ सकता है असर
इस फैसले की सबसे दिलचस्प बात यह है कि सोशल मीडिया की कमजोर मौजूदगी का असर संगठन में मिलने वाले पद पर भी पड़ सकता है. अगर किसी पदाधिकारी का डिजिटल प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहता है, तो भविष्य में उसके पद को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं.
यानी आने वाले समय में किसी नेता की जमीनी सक्रियता के साथ-साथ उसका डिजिटल प्रदर्शन भी देखा जा सकता है. हालांकि, कोलारस में सामने आया यह प्रयोग अभी स्थानीय स्तर का है, लेकिन इसने एक बड़ा राजनीतिक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या आने वाले दिनों में सोशल मीडिया फॉलोअर्स और एंगेजमेंट पार्टी संगठन में नेताओं की भूमिका तय करने का एक बड़ा पैमाना बन जाएंगे?
आखिर सोशल मीडिया नेताओं के लिए इतना जरूरी क्यों हो गया?
आज सोशल मीडिया सिर्फ फोटो या वीडियो डालने की जगह नहीं रह गया है..यह नेताओं के लिए जनता से सीधे जुड़ने का एक बड़ा माध्यम बन चुका है. किसी नेता को अपनी बात कहने के लिए अब हर बार बड़ी सभा करने या मंच तैयार करने की जरूरत नहीं पड़ती. वह अपने मोबाइल फोन से लाइव आ सकता है, कोई वीडियो रिकॉर्ड कर सकता है या अपनी बात पोस्ट के जरिए हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है.
एक बड़ी रैली आयोजित करने में पैसा, समय और संसाधन लगते हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर एक वीडियो कुछ ही मिनटों में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकता है. यही वजह है कि राजनीतिक दल और नेता डिजिटल प्लेटफॉर्म को गंभीरता से लेने लगे हैं. सोशल मीडिया का एक और फायदा यह है कि चुनाव सिर्फ पांच साल में एक बार होते हैं, लेकिन नेता पूरे पांच साल जनता के सामने अपनी मौजूदगी बनाए रख सकता है. अगर कोई विधायक अपने क्षेत्र में सड़क, अस्पताल, स्कूल या किसी दूसरी समस्या को लेकर लगातार वीडिय बनाकर लोगों तक अपनी बात पहुंचाता है, तो उसकी राजनीतिक पहचान सिर्फ चुनाव के समय नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल के दौरान बनी रह सकती है.
जमीन की राजनीति बनाम डिजिटल राजनीति नहीं, अब दोनों जरूरी
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इस पूरे मामले को सिर्फ सोशल मीडिया फॉलोअर्स की राजनीति के तौर पर देखना भी सही नहीं होगा. असली चुनौती यह है कि नेता डिजिटल दुनिया में लोकप्रिय होने के साथ-साथ जमीन पर भी लोगों से जुड़ा रहे. सिर्फ हजारों या लाखों फॉलोअर्स होने से यह साबित नहीं होता कि नेता की अपने क्षेत्र में भी उतनी ही पकड़ है.
किसी नेता की असली ताकत तब मानी जाएगी जब उसके सोसल मीडिया फॉलोअर्स के साथ-साथ उसके क्षेत्र के लोग भी उसके काम और पहुंच से संतुष्ट हों. इसलिए आने वाले समय में राजनीति का नया मॉडल शायद ‘जमीन + डिजिटल’ का हो सकता है, जहां नेता को संगठन के भीतर अपनी जगह बनाए रखने के लिए दोनों मोर्चों पर सक्रिय रहना पड़ेगा..
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