पाकिस्तान का मित्र देश अब भारत के भरोसे! रूस से सप्लाई घटते ही India की ओर किया रुख, जानें पूरा मामला
ग्लोबल तनाव के बीच तेल-गैस सप्लाई प्रभावित होने से कई देशों में महंगाई बढ़ी है. वहीं भारत की रिफाइनिंग क्षमता और विविध आयात रणनीति के चलते वह तुर्की, यूरोप और केन्या जैसे देशों के लिए अहम डीजल सप्लायर बनकर उभरा है.
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दुनिया के कई हिस्सों में जारी युद्ध और तनाव का असर अब सिर्फ कूटनीति या शेयर बाजार तक सीमित नहीं है. इसका सीधा असर तेल और गैस की सप्लाई पर भी दिखाई दे रहा है. रूस-यूक्रेन युद्ध, अमेरिका-ईरान संघर्ष और पश्चिम एशिया में बिगड़े हालात ने कई पारंपरिक ईंधन सप्लाई रूट को प्रभावित किया है. इसका नतीजा यह हुआ कि दुनिया के कई देशों को पेट्रोल और डीजल के लिए नए सप्लायर तलाशने पड़ रहे हैं. ऐसे समय में भारत की रिफाइनिंग क्षमता ने उसे वैश्विक ईंधन बाजार में एक महत्वपूर्ण भूमिका दे दी है.
भारत खुद अपनी जरूरत के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है, लेकिन देश में मौजूद विशाल रिफाइनिंग क्षमता उसे क्रूड को पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों में बदलकर निर्यात करने की ताकत देती है. यही वजह है कि मौजूदा संकट के बीच भारत से कई देशों की ईंधन खरीद बढ़ी है. इसमें सबसे बड़ा नाम तुर्की का है जो पाकिस्तान का काफी क़रीबी माना जाता था वो अब भारत पर तेल के लिए आश्रित हो गया है. इसका खुलासा एक रिपोर्ट में हुआ है.
तुर्की ने रूस से दूरी के बीच भारत से बढ़ाई डीजल खरीद
इस बदलाव का एक बड़ा उदाहरण तुर्की है. रूस लंबे समय से तुर्की के लिए डीजल का प्रमुख सप्लायर रहा है, लेकिन अगस्त 2026 में रूसी सप्लाई में तेज गिरावट आई. इसके पीछे रूस का डीजल निर्यात प्रतिबंध और वहां रिफाइनरियों पर हुए हमलों से पैदा हुई सप्लाई बाधाएं बताई गई हैं. ऐसे में तुर्की जिसने पाकिस्तान का हमेशा समर्थन दिया, वो अब भी अब भारत के भरोसे हैं. दूसरे देशों से ईंधन खरीद बढ़ाई. आजतक की एक रिपोर्ट में Kpler के आंकड़ों के मुताबिक अगस्त में तुर्की ने भारत से प्रतिदिन 1.20 लाख बैरल से ज्यादा डीजल खरीदा. यह Kpler के 2017 से उपलब्ध आंकड़ों में सबसे ऊंचे मासिक स्तरों में रहा. इसी दौरान अमेरिका से तुर्की की डीजल खरीद करीब 90 हजार बैरल प्रतिदिन रही. वहीं रूस से आने वाला डीजल घटकर करीब 80 हजार बैरल प्रतिदिन रह गया. हालांकि, अलग-अलग डेटा एजेंसियों के आंकड़ों में अंतर भी दिखाई देता है. Energy Aspects ने अगस्त में भारत से तुर्की को करीब 74 हजार बैरल प्रतिदिन डीजल सप्लाई का अनुमान दिया. फिर भी उसके अनुसार यह 2022 के बाद भारत की सबसे ऊंची सप्लाई थी.
यूरोप की डीजल जरूरत में भारत की बड़ी हिस्सेदारी
भारत की बढ़ती भूमिका सिर्फ तुर्की तक सीमित नहीं है. यूरोप के लिए भी भारतीय रिफाइनरियां महत्वपूर्ण सप्लायर बनकर सामने आई हैं. Vortexa के आंकड़ों के मुताबिक अगस्त 2026 में Bab-el-Mandeb से यूरोप की ओर जाने वाले डीजल और गैसऑयल की आवाजाही करीब 2 लाख बैरल प्रतिदिन रही. इसमें लगभग 60 फीसदी हिस्से की सप्लाई भारतीय रिफाइनरों से हुई. यह बदलाव ऐसे समय में आया जब रूसी डीजल निर्यात काफी कमजोर हुआ और अमेरिकी सप्लाई में भी अगस्त के दौरान गिरावट देखने को मिली. यूरोप में सर्दियों से पहले ईंधन की मांग बढ़ने की उम्मीद रहती है, ऐसे में भारतीय रिफाइनरियों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि यूरोप की पूरी डीजल जरूरत भारत पूरी कर रहा है. यह आंकड़ा खास तौर पर Bab-el-Mandeb से यूरोप की ओर जाने वाली सप्लाई से जुड़ा है.
केन्या में भी बढ़ी भारतीय ईंधन की पहुंच
अफ्रीका में भी भारतीय पेट्रोलियम उत्पादों की मांग बढ़ी है. उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक भारत ने संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब को पीछे छोड़ते हुए केन्या के लिए पेट्रोलियम उत्पादों का प्रमुख सप्लायर बनने में बढ़त बनाई है. इसमें पेट्रोल, डीजल, जेट फ्यूल और फ्यूल ऑयल जैसे उत्पाद शामिल हैं. पश्चिम एशिया से आने वाली सप्लाई और समुद्री रास्तों में बाधा के बीच अफ्रीकी खरीदारों के लिए सप्लायर में विविधता बढ़ाना जरूरी हो गया है. भारत के लिए यह स्थिति अपने रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात को बढ़ाने का अवसर भी लेकर आई है.
भारत की असली ताकत है विशाल रिफाइनिंग क्षमता
भारत की इस भूमिका को समझने के लिए देश की रिफाइनिंग क्षमता पर नजर डालना जरूरी है. भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनर है. देश में 22 चालू रिफाइनरियों की कुल स्थापित क्षमता 258.1 मिलियन टन प्रति वर्ष है. यह क्षमता घरेलू पेट्रोलियम उत्पादों की मांग से अधिक है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 61.5 मिलियन टन पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात किया था. यानी भारत का मॉडल केवल कच्चा तेल खरीदकर उसे घरेलू बाजार में खपाने तक सीमित नहीं है. देश दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से क्रूड ऑयल खरीदता है, उसे अपनी आधुनिक रिफाइनरियों में प्रोसेस करता है और फिर पेट्रोल, डीजल, जेट फ्यूल तथा दूसरे उत्पाद तैयार करता है. घरेलू जरूरत पूरी करने के बाद उपलब्ध अतिरिक्त उत्पादों को विदेशी बाजारों में भेजा जाता है.
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रूस से तेल खरीद ने भी बदला समीकरण
भारत की ऊर्जा रणनीति में रूस से मिलने वाला कच्चा तेल भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. हालांकि, अगस्त 2026 में भारत के रूसी तेल आयात में 16.5 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई और आयात करीब 2.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहा. इसके बावजूद रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चे तेल का सप्लायर बना रहा. इसी दौरान भारतीय रिफाइनरों ने इराक और पश्चिम एशिया के दूसरे स्रोतों से भी खरीद को समायोजित किया. इससे एक अहम बात सामने आती है. वैश्विक ऊर्जा संकट के दौर में किसी एक देश या एक रूट पर निर्भर रहना जोखिम बढ़ा सकता है. भारत के लिए अलग-अलग स्रोतों से कच्चा तेल हासिल करना और मजबूत रिफाइनिंग नेटवर्क बनाए रखना ऊर्जा सुरक्षा की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है.
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बताते चलें कि दुनिया में तेल संकट के बीच तस्वीर तेजी से बदल रही है. रूस की सप्लाई में व्यवधान, पश्चिम एशिया की अस्थिरता और समुद्री रास्तों पर दबाव ने ईंधन बाजार का समीकरण बदल दिया है. ऐसे समय में भारत की रिफाइनिंग क्षमता उसे एक महत्वपूर्ण वैश्विक सप्लायर बना रही है. तुर्की से लेकर यूरोप और अफ्रीका तक बढ़ती मांग यह संकेत देती है कि आने वाले समय में वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत की भूमिका सिर्फ एक बड़े तेल आयातक की नहीं, बल्कि रिफाइंड ईंधन के बड़े निर्यातक की भी बनी रहेगी. हालांकि, कच्चे तेल की उपलब्धता, अंतरराष्ट्रीय कीमतें और समुद्री परिवहन की स्थिति आगे इस भूमिका की मजबूती तय करने में अहम रहेंगी.