'पुशी पेरेंटिंग' से बचें | बच्चों पर परफेक्ट होने का दबाव मेंटल हेल्थ के लिए बेहद खराब, क्या है सही पेरेंटिंग स्टाइल?
मनोविज्ञान के अनुसार, पुशी पेरेंटिंग का मतलब है बच्चे पर अपनी इच्छाएं थोपना और उसे हमेशा परफेक्ट बनने के लिए मजबूर करना। इसमें देखने में लगता है कि बच्चा अच्छा कर रहा है, लेकिन अंदर ही अंदर वह तनाव महसूस करता रहता है। बच्चा खेल, सीखने और खुशी से ज्यादा केवल परफॉर्मेंस के बारे में सोचने लगता है।
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आजकल हर जगह कॉम्पीटीशन है, हर माता-पिता अपने बच्चे को सबसे बेहतर देखना चाहते हैं, हर किसी का सपना होता है कि उनका बच्चा जीवन में सबसे सफल हो। जीवन में कुछ बड़ा और अच्छा करने के लिए प्रेरित करना बिल्कुल गलत नहीं है। लेकिन लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब माता-पिता अपनी इन उम्मीदों को बच्चों पर थोपने लगते हैं और उन्हें 'परफेक्ट' बनने के लिए मजबूर करते हैं।
इसे साइकोलॉजिकल भाषा में 'पुशी पेरेंटिंग' कहा जाता है। बाहर से देखने पर ये भले ही अनुशासन या सफलता के लिए लिया गया कदम नजर आए, लेकिन अंदर ही अंदर ये बच्चे के कोमल मन और मानसिक विकास के लिए बेहद खतरनाक साबित हो रहा है।
क्या होती है पुशी पेरेंटिंग?
मनोविज्ञान के अनुसार, पुशी पेरेंटिंग का मतलब है बच्चे पर अपनी इच्छाएं थोपना और उसे हमेशा परफेक्ट बनने के लिए मजबूर करना। इसमें देखने में लगता है कि बच्चा अच्छा कर रहा है, लेकिन अंदर ही अंदर वह तनाव महसूस करता रहता है। बच्चा खेल, सीखने और खुशी से ज्यादा केवल परफॉर्मेंस के बारे में सोचने लगता है।
पुशी पेरेंटिंग में माता-पिता हमेशा बच्चे से सबसे ज्यादा नंबर या हर काम में नंबर वन आने की उम्मीद करते हैं। अगर बच्चा अच्छे नंबर भी ले आए, लेकिन टॉप नहीं कर पाया, तो उसे डांट मिलती है। इससे बच्चे को लगने लगता है कि उसकी मेहनत की कोई कीमत नहीं है। धीरे-धीरे उसके अंदर डर पैदा हो जाता है। वह खुद को तभी अपनाता है जब वह दूसरों की उम्मीदों पर खरा उतरता है।
पुशी पेरेंटिंग के दूसरे संकेत में बच्चे की पसंद को नजरअंदाज कर दिया जाता है। कई बार बच्चे को किसी खेल, कला या शौक में रुचि होती है, लेकिन माता-पिता उसे अपनी मर्जी के करियर या पढ़ाई की तरफ धकेलते हैं। इससे बच्चा अपनी खुशी और रुचि को दबाने लगता है और केवल वही करने की कोशिश करता है जिससे माता-पिता खुश हों।
इससे बच्चों के मन में आती है हीन भावना
इसके अलावा, जब बच्चों की तुलना दूसरों से की जाती है, तो ये आदत बच्चे के आत्मविश्वास को कमजोर कर देती है। वह खुद को दूसरों से कम समझने लगता है और धीरे-धीरे उसके मन में हीन भावना आ सकती है। मनोवैज्ञानिक इसे सेल्फ-डाउट पैटर्न कहते हैं, जिसमें बच्चा खुद पर भरोसा करना छोड़ देता है।
अक्सर देखा जाता है कि माता-पिता बच्चे के हर छोटे-बड़े फैसले खुद लेने लगते हैं। जैसे क्या पहनना है, क्या खाना है, किससे दोस्ती करनी है या खाली समय में क्या करना है। जब बच्चे को अपने फैसले खुद लेने का मौका नहीं मिलता, तो वह आत्मनिर्भर नहीं बन पाता। बड़े होकर भी उसे हर बात के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चों को दिशा देना जरूरी है, लेकिन उन पर दबाव डालना सही नहीं है।
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Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य ज्ञान और जागरूकता के उद्देश्य से है. प्रत्येक व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति और आवश्यकताएं अलग-अलग हो सकती हैं. इसलिए, इन टिप्स को फॉलो करने से पहले अपने डॉक्टर या किसी विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.