PM मोदी ने ऐसे पलटा विपक्ष का पूरा सियासी खेल! धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के पीछे की 24 घंटे की Inside Story
शनिवार को केंदिय शिक्षा मंत्री रहे धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दिया. इसके पीछे 24 घंटे की रणनीति में PM मोदी की अहम भूमिका रही, जिसे विपक्ष भी भांप नहीं सका.
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देश की राजधानी दिल्ली में जब नीट पेपर लीक मामले को लेकर जब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जब कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने जब जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन शुरू किया तो सोशल मीडिया से जन्मी इस पार्टी को भी अंदाज़ा नहीं होगा कि ये कब आंदोलन में बदल जाएगा. धरनारत छात्रों की संख्या लगातार बढ़ती रही. इसके बाद अंत में मोदी सरकार ने छात्रों की सभी मांग को मान ली और शनिवार को धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा भी दे दिया. लेकिन यह इस्तीफ़ा इतनी आसानी से नहीं हुआ बल्कि इसके पीछे 24 घंटे का वो घटनाक्रम रहा, जिसने दिल्ली के राजनीति में हलचल मचा दी थी.
सरकार ने विपक्ष को दी मात
दरअसल, सीजेपी के प्रतिनिधिमंडल के ने जब गुरुवार को सरकार के साथ पहले दौर की बात की तभी उनकी दो मांगो को मान लिया गया था लेकिन शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े पर कोई बात नहीं बनी थी. शुक्रवार सुबह तक केंद्र सरकार का रुख सख्त बना हुआ था. शीर्ष स्तर पर यह धारणा थी कि हालात को नियंत्रित करने के लिए अब तक उठाए गए कदम पर्याप्त हैं. इसी क्रम में उच्च शिक्षा सचिव को पद से हटा दिया गया था, जबकि एनटीए के 47 कर्मचारियों की सेवाएं भी समाप्त कर दी गई थीं. सरकार को उम्मीद थी कि पेपर लीक रोकने के लिए नए कानून को मंजूरी देने और मामलों के त्वरित निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की घोषणा से छात्रों का आक्रोश कम होगा. लेकिन इस स्थिति के बीच पार्टी के भीतर लगातार मंथन चल रहा था की विपक्षी दल युवाओं को यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि केंद्र सरकार उनकी विरोधी है. इसलिए पार्टी ने इस तरह की नैरेटिव को तत्काल खत्म के लिए शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की मांग को स्वीकार की. ताकि इसका खामियाजा यूपी समेत कई राज्यों में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में ना पड़े और पार्टी का नुकसान ना हो.
BJP के चाणक्य की मामले पर थी पैनी नजर
राजनीतिक जानकारों की माने दिल्ली में हुए इस पूरे घटनाक्रम के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर्दे के पीछे रहकर हालात पर लगातार नजर बनाए हुए थे. यही वजह रही कि सरकार की ओर से बातचीत की जिम्मेदारी केंद्रीय जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह को सौंपी गई. युवाओं के बीच भरोसा कायम रखने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री ने भी दो बार सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी बात रखी. हालांकि, शनिवार दोपहर तक सरकार को यह साफ हो गया कि केवल प्रशासनिक कदम उठाकर स्थिति को सामान्य नहीं किया जा सकता. सरकार के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, आशंका जताई गई कि आंदोलन की आड़ में राष्ट्रविरोधी तत्व सक्रिय हो सकते हैं. इसी पृष्ठभूमि में व्यापक विचार-विमर्श के बाद इस्तीफे जैसा कठिन और बड़ा फैसला लिया गया.
PM मोदी को क्यों आना पड़ा आगे?
इसके साथ ही जब मामला ज्यादा कंट्रोल से बाहर जाता दिखा तो शुक्रवार देर रात से शनिवार सुबह तक स्थिति बदली. इसी दौरान खुफिया और प्रशासनिक एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को भेजी, जिसमें संकेत दिया गया कि हालात धीरे-धीरे नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं. रिपोर्ट में यह भी आशंका जताई गई कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो सड़क से लेकर संसद तक सरकार पर दबाव और बढ़ सकता है तथा आंदोलन अधिक व्यापक रूप ले सकता है. इन इनपुट्स के सामने आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ख़ुद स्थिति की निगरानी की जिम्मेदारी संभाली और संकट से निपटने के लिए तेजी से अहम फैसले लेने की प्रक्रिया शुरू की. इसके बाद अब स्थिति सामान्य और सरकार की चिंता बना यह आंदोलन समाप्त हुआ.
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बहरहाल, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के साथ यह आंदोलन थम गया है और सरकार ने तत्काल संकट को टाल दिया है. हालांकि, यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि युवाओं से जुड़े मुद्दे अब सीधे राजनीतिक असर डालते हैं. ऐसे में आने वाले समय में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ वादे करने की नहीं, बल्कि परीक्षा प्रणाली में भरोसा बहाल करने की होगी.