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यह सावन सिर्फ सावन नहीं था…मैंने अपनी आंखों से देखा, जब भक्ति बन जाती है तपस्या-शान्तनु शुक्ल

भूख-प्यास, शरीर की पीड़ा से परे, केवल देवाधिदेव महादेव की सेवा में लीन रहे आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि जी महाराज ने साबित किया जब भक्ति बन जाती है तपस्या.

यह सावन सिर्फ सावन नहीं था…मैंने अपनी आंखों से देखा, जब भक्ति बन जाती है तपस्या-शान्तनु शुक्ल
Image Source- NMF News INPUT
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-शान्तनु शुक्ला

एक साधक अपने आराध्य के लिए कितना समर्पित हो सकता है, दुनिया ने इस सावन में देखा, भूख-प्यास से परे, शरीर की पीड़ा से परे, केवल महादेव की सेवा में लीन रहे पूज्य आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि जी महाराज.  कुछ यात्राएँ जीवन में केवल पूरी नहीं होतीं, वे जीवन का हिस्सा बन जाती हैं. मेरे लिए यह सावन ऐसी ही एक यात्रा थी. मैंने इस एक महीने में जो देखा, उसे शब्दों में लिखना मेरे लिए आसान नहीं है. क्योंकि कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें कलम लिख तो सकती है, लेकिन उनकी गहराई को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकती. यह सावन कुछ खास था.

दुनिया ने देखा कि एक साधक अपने आराध्य के प्रति कितना समर्पित हो सकता है. मैंने देखा कि जब भक्ति अपने चरम पर पहुँचती है तो भूख-प्यास, थकान और शरीर की पीड़ा भी छोटी लगने लगती है. पूज्य गुरुदेव आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि जी महाराज साधना में लीन थे और उनके सामने केवल एक ही लक्ष्य था, अपने आराध्य भगवान महादेव की सेवा.

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घंटों की साधना, कठिन तपस्या, लगातार पूजा, रुद्राभिषेक और उसके बीच शरीर को होने वाली पीड़ा, लेकिन चेहरे पर शिकायत नहीं. मन में कोई दूसरा विचार नहीं. बस महादेव. यही दृश्य इस सावन में देश और दुनिया ने देखा. सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, न्यूज़ चैनलों और समाचार पत्रों के माध्यम से करोड़ों लोगों तक गुरुदेव की साधना पहुँची. दूर-दूर बैठे लोग घंटों गुरुदेव को साधना करते देखते रहे. हर किसी के मन में एक ही सवाल था-“आखिर यह संभव कैसे है?”
लेकिन जो लोग गुरुदेव के करीब रहे, वे जानते हैं कि इसका उत्तर शायद किसी शब्द में नहीं है. इसका उत्तर है—समर्पण.

मैं रुद्राभिषेक नहीं कर पाया, शायद गुरुदेव ने मेरे लिए कुछ और तय किया था. इस पूरे सावन में मेरे मन की भी एक इच्छा थी. मैं चाहता था कि भक्त के रूप में गुरुदेव की साधना में बैठूँ, रुद्राभिषेक करूँ और अपने आराध्य के चरणों में अपनी आस्था अर्पित करूँ, लेकिन इस बार शायद महादेव ने मेरे लिए कोई और सेवा लिखी थी. और शायद गुरुदेव पहले ही तय कर चुके थे कि मुझे क्या करना है. मैं रुद्राभिषेक नहीं कर पाया. पहले मन में थोड़ा दुःख हुआ, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, मुझे समझ आने लगा कि गुरुदेव ने मुझे किसी और रुद्राभिषेक की जिम्मेदारी दी है.

वह रुद्राभिषेक जल से नहीं, सूचनाओं और भावनाओं से था. मुझे जिम्मेदारी मिली कि गुरुदेव की साधना को दुनिया तक पहुँचाऊँ, लोगों को उनके दर्शन कराऊँ. उनकी तपस्या से लोगों को जोड़ूँ. और अधिक से अधिक लोगों तक यह संदेश पहुँचाऊँ कि सनातन की साधना आज भी जीवित है. मैंने वही किया. दिन-रात किया. कभी कैमरे के पीछे, कभी मीडिया के बीच, कभी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर और कभी किसी भक्त को गुरुदेव के दर्शन कराने में.

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और हर बार मन में एक ही बात थी,“गुरुदेव, यह मैं नहीं कर रहा… आप मुझसे करवा रहे हैं.” शायद मेरा रुद्राभिषेक यही था, आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मैंने रुद्राभिषेक नहीं किया, लेकिन गुरुदेव की साधना का संदेश करोड़ों लोगों तक पहुँचाने का सौभाग्य मिला. सैकड़ों लोग गुरुदेव के दर्शन और आशीर्वाद से जुड़े. कितने ही लोगों ने पहली बार गुरुदेव की साधना देखी. कितने लोगों ने संदेश भेजकर कहा, “ऐसी साधना हमने पहले कभी नहीं देखी.” उनके शब्द पढ़कर मेरे मन में एक ही भाव आता था, शायद यही मेरी सेवा थी. शायद गुरुदेव ने मुझे शिवलिंग पर जल चढ़ाने के बजाय गुरुदेव की साधना को लोगों के हृदय तक पहुँचाने का पात्र बनाया था. 

पुण्य कितना मिला, यह मैं नहीं जानता. उसका हिसाब भी नहीं रखना चाहता. मेरे लिए तो इतना ही काफी है कि गुरुदेव की सेवा में मेरा नाम नहीं, मेरा काम भी नहीं—केवल उनका आशीर्वाद दिखाई दे.

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इस एक महीने ने मुझे बदल दिया मैंने इस एक महीने में सीखा कि गुरु की सेवा हमेशा वही नहीं होती जो हम करना चाहते हैं. कभी-कभी गुरु हमें वह काम देते हैं, जिसके बारे में हमने सोचा भी नहीं होता. हम समझते हैं कि हम गुरु के लिए कुछ कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है, गुरु हमसे अपना काम करवा रहे होते हैं. आज मुझे लगता है कि इस सावन में मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि कोई संख्या नहीं थी. न कोई प्रचार. न कोई व्यक्तिगत उपलब्धि. मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि मैं गुरुदेव की साधना का एक छोटा सा माध्यम बन सका.

गुरुदेव की महानता मैंने केवल देखी नहीं, महसूस की है, किसी संत की महानता केवल मंच पर दिए गए प्रवचन से नहीं समझी जा सकती. उसे समझने के लिए उसके साथ कुछ समय बिताना पड़ता है. उसकी साधना को देखना पड़ता है. उसकी तपस्या के बीच उसकी आँखों में अपने आराध्य के प्रति प्रेम देखना पड़ता है. और मैंने इस सावन में यही देखा. एक ऐसा साधक जो अपने आराध्य के सामने स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर देता है. जिसके लिए सेवा ही साधना है और साधना ही जीवन. स्वामी कैलाशानंद गिरि जी महाराज को देखकर मुझे बार-बार यही लगा कि भक्ति जब सच्ची होती है, तो शरीर पीछे छूट जाता है और केवल आत्मा अपने आराध्य के साथ रह जाती है.

अब जब सावन अगले साल फिर से आने के लिए विदा हो गया है, मेरे भीतर यह यात्रा कभी खत्म नहीं होगी. मेरे पास इस एक महीने की अनगिनत यादें हैं. गुरुदेव की साधना के दृश्य हैं. भक्तों की आँखों में दिखाई देने वाली श्रद्धा है. महादेव के प्रति गुरुदेव का समर्पण है. और सबसे बढ़कर; गुरुदेव का आशीर्वाद है. मैं नहीं जानता कि मैंने इस सावन में क्या पाया, लेकिन इतना जरूर जानता हूँ कि मैं जैसा सावन के पहले दिन था, वैसा सावन के बाद नहीं हूँ.

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मेरे भीतर सेवा का अर्थ बदल गया है. श्रद्धा का अर्थ बदल गया है. और गुरु के प्रति समर्पण का अर्थ भी बदल गया है. आज मन से केवल एक ही बात निकलती है—

“गुरुदेव, मैं रुद्राभिषेक नहीं कर पाया, लेकिन आपने मुझे अपनी साधना का संदेश दुनिया तक पहुँचाने की सेवा दी. मेरे लिए यही मेरा रुद्राभिषेक था. यही मेरी साधना थी. और यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है.”मैंने जो कुछ किया, वह मेरा नहीं था. आपकी प्रेरणा थी, आपकी कृपा थी, आपका आशीर्वाद था, मैं तो केवल एक माध्यम था. और अगर जीवन में कभी कोई मुझसे पूछे कि इस सावन में तुम्हें सबसे बड़ी क्या उपलब्धि मिली? तो मेरा उत्तर होगा, “मैंने महादेव की साधना करते अपने गुरुदेव को देखा. और उनकी सेवा करने का सौभाग्य पाया.” इससे बड़ा सौभाग्य मेरे लिए और कुछ नहीं.

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हर हर महादेव.
जय गुरुदेव. 🙏

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लेख: शान्तनु शुक्ला
अंतर्राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी, 
आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि जी महाराज
एडिट: केशव झा 

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