यामानाशी–उत्तर प्रदेश: हरित विकास की नई साझेदारी
उत्तर प्रदेश में नोएडा जैसे शहर वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझते रहे हैं. सार्वजनिक परिवहन को डीकार्बोनाइज करना इस चुनौती से निपटने का सबसे कारगर तरीका है. बसों और ईवी चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में जापानी तकनीक का इस्तेमाल इन शहरों की हवा को साफ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
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-नम्रता नारायण
उत्तर प्रदेश और जापान का यह रिश्ता द्विपक्षीय सहयोग पर टिका है. उत्तर प्रदेश के पास संसाधन हैं, बड़ा बाजार है और सबसे बढ़कर, एक विशाल युवा शक्ति है. यामानाशी के पास तकनीक है, अनुभव है और वैश्विक स्तर की विशेषज्ञता है. योगी सरकार इन दोनों बलों के संयोजन से उत्तर प्रदेश में विकास की नई इबारत लिख रही है.
किसी भी राज्य में विकास की निरंतरता तभी बरकरार रह सकती है, जब उसके पास पर्याप्त ऊर्जा संसाधन होने के साथ ही भविष्य के ऊर्जा स्रोत के बारे में भी गंभीरता से सोचा जाए. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के लिए तो ऐसा और भी जरूरी है, क्योंकि यहां तेजी से औद्योगीकरण हो रहा है और जिसका पर्यावरणीय प्रभाव पड़ता है. यहां सौर ऊर्जा, बायोमास आदि प्राकृतिक ऊर्जा विकास के बड़े आधार हैं, लेकिन सरकार ने अपनी दूरदर्शी सोच के तहत भविष्य की ऊर्जा के लिए ग्रीन हाईड्रोजन की ओर कदम बढ़ाया है, जिसमें भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा अर्थव्यवस्था की महती संभावना निहित है. जापान के यामानाशी प्रांत से उत्तर प्रदेश की साझेदारी इसी दिशा में एक बड़ा कदम है. यामानाशी को ग्रीन हाईड्रोजन और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल है और कोई दो राय नहीं कि उसका अनुभव भारत में ऊर्जा की नई संभावनाएं लेकर आएगा.
यामानाशी से उत्तर प्रदेश के दौरे पर आए 200 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने इन दोनों प्रांतों की साझेदारी को नया आयाम दिया है. उत्तर प्रदेश के विशाल औद्योगिक आधार, बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और बड़े बाजार के साथ यामानाशी की हाइड्रोजन तकनीक, अनुसंधान क्षमता और हरित ऊर्जा का अनुभव एक नए विकास मॉडल की नींव बन सकता है. इससे उद्योगों के डीकार्बोनाइजेशन से लेकर स्वच्छ परिवहन, हरित हाइड्रोजन, ऊर्जा भंडारण और रोजगार सृजन तक में नए रास्ते खुलेंगे. यह साझेदारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय एक-दूसरे का पूरक बनाने की दिशा दिखाती है. उत्तर प्रदेश वन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रहा है. इसे हासिल करने में ग्रीन हाईड्रोजन की अहम भूमिका हो सकती है.
नवीकरणीय ऊर्जा के भंडारण की चुनौती का व्यावहारिक हल
यामानाशी प्रांत स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में आगे बढ़ा है तो इसका मुख्य कारण है कि उसने अपनी प्राकृतिक ऊर्जा को बर्बाद होने नहीं दिया. दिन के समय जब सौर पैनल जरूरत से ज्यादा बिजली पैदा करते हैं, तो आमतौर पर यह अतिरिक्त ऊर्जा या तो बेकार चली जाती है या ग्रिड पर दबाव बनाती है. यामानाशी ने इस समस्या का जवाब पावर-टू-गैस यानी P2G तकनीक में खोजा और अतिरिक्त बिजली से पानी को तोड़कर ग्रीन हाइड्रोजन बनाया. इसे सुरक्षित तरीके से टैंकों में संग्रहित कर लिया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में कार्बन का शून्य उत्सर्जन होता है. यह हाइड्रोजन बाद में फैक्ट्रियों की थर्मल ऊर्जा जरूरतों, बसों-वाहनों के ईंधन और स्थानीय हीटिंग सिस्टम में इस्तेमाल होता है. शून्य कार्बन उत्सर्जन की वजह से यह हाइड्रोजन उत्तर प्रदेश के लिए महत्वपूर्ण है. नवीकरणीय ऊर्जा की सबसे बड़ी चुनौती भंडारण का व्यावहारिक हल भी इसमें मौजूद है. उत्तर प्रदेश में सौर और पवन ऊर्जा का उत्पादन असमान होता है, लेकिन हाइड्रोजन के रूप में इसे संग्रहित कर हम इसे जरूरत के समय इस्तेमाल कर सकते हैं.
यूपी की हाइड्रोजन नीति और यामानाशी की तकनीक में तालमेल
उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्रीन हाइड्रोजन नीति के तहत 2028 तक 10 लाख मीट्रिक टन सालाना उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित कर रखा है. योगी सरकार की ग्रीन हाइड्रोजन नीति और यामानाशी की P2G तकनीक के बीच एक स्वाभाविक तालमेल दिखाई देता है. बुंदेलखंड और पूर्वांचल जैसे क्षेत्रों में विशाल सौर ऊर्जा क्षमता मौजूद है, जिसका अब तक पूरा दोहन नहीं हो पाया है. अगर इन इलाकों में दिन के समय पैदा होने वाली सरप्लस सौर ऊर्जा को हाइड्रोजन में बदला जाए, तो राज्य अपनी बिजली ग्रिड को संतुलित रख सकता है. यह कदम राज्य को सिर्फ ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर ही नहीं बनाएगा, बल्कि उसे देश के 'ग्रीन एनर्जी हब' के रूप में स्थापित करेगा. बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र यदि हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था के केंद्र बनते हैं, तो क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने में भी मदद मिलेगी. ऊर्जा उत्पादन और भंडारण की सुविधाएं स्थानीय स्तर पर रोजगार और औद्योगिक गतिविधियों को नई गति दे सकती हैं.
जापानी निवेश और नए औद्योगिक गलियारे
तकनीक के साथ-साथ पूंजी का प्रवाह भी इस साझेदारी को मजबूती दे रहा है. यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र में जापानी सिटी और इंडस्ट्रियल पार्कों के निर्माण की योजना इसका प्रमाण है. जापानी कंपनियां पहले से ही विनिर्माण और ग्रीन मोबिलिटी क्षेत्र में भारी निवेश कर रही हैं. जब वैश्विक कंपनियां किसी क्षेत्र में उत्पादन इकाइयां लगाती हैं, तो उनके साथ प्रशिक्षित मानव संसाधन, गुणवत्ता मानक और तकनीकी हस्तांतरण की पूरी श्रृंखला भी आती है. उत्तर प्रदेश के संदर्भ में यह बिंदु भी महत्वपूर्ण है.
युवा जनसांख्यिकी और कौशल का संगम
उत्तर प्रदेश और जापान का यह रिश्ता द्विपक्षीय सहयोग पर टिका है. उत्तर प्रदेश के पास संसाधन हैं, बाजार है और सबसे बढ़कर, एक विशाल युवा शक्ति है. यामानाशी के पास तकनीक है, अनुभव है और वैश्विक स्तर की विशेषज्ञता है. योगी सरकार इन दोनों बलों के संयोजन से उत्तर प्रदेश में विकास की नई इबारत लिख रही है. जब यह दोनों ताकतें एक साथ आती हैं, तो परिणाम ऊर्जा क्षेत्र में सुधार तक सीमित नहीं रहता. यह रोजगार सृजन, औद्योगिक विकास, पर्यावरण संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को एक साथ मजबूत करने वाला व्यापक बदलाव बन जाता है. यामानाशी और उत्तर प्रदेश के बीच हुए समझौतों के तहत राज्य के तकनीकी संस्थानों के छात्रों को हाइड्रोजन तकनीक, रोबोटिक्स और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में उच्च-स्तरीय प्रशिक्षण की बात भी है. इस पहल को राज्यव्यापी कौशल विकास मिशन का भी हिस्सा बनाया जाना चाहिए. यह राज्य के लिए ब्रेन-ड्रेन को ब्रेन-गेन में बदलने का भी सुनहरा मौका है.
ई-मोबिलिटीः स्वच्छ शहर, स्वच्छ भविष्य
उत्तर प्रदेश में नोएडा जैसे शहर वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझते रहे हैं. सार्वजनिक परिवहन को डीकार्बोनाइज करना इस चुनौती से निपटने का सबसे कारगर तरीका है. बसों और ईवी चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में जापानी तकनीक का इस्तेमाल इन शहरों की हवा को साफ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. यह बदलाव पर्यावरणीय दृष्टि से ही नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी जरूरी है. बेहतर वायु गुणवत्ता का सीधा असर नागरिकों के जीवन स्तर और उत्पादकता पर पड़ता है, जो अंततः राज्य की समग्र आर्थिक प्रगति में भी योगदान देता है.
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लेखक : नम्रता नारायण (उद्यमी), प्रबंध निदेशक, मैत्रेयी माइक्रो प्रोडक्ट्स, नोएडा