जिस पर देशकरता है भरोसा
Advertisement

मरने के लिए छोड़ा, अस्थियां लेने भी नहीं आईँ बेटियां, अब मौत के बाद इनकी जिंदगी रौशन करेंगी शिवचरण की आंखें

ये कहानी है शिवचरण की, जिनका आखिरी इंतजार और उम्मीद आखिरी सांस के साथ खत्म हो गया लेकिन मौत के चंद मिनट पहले तक भी उन्हें आस थी कि शायद मोबाइल की स्क्रीन चमकेगी और उनकी बेटियां आखिरी बार उनका हाल जानते हुए कहेंगी कि पापा कैसे हो आप?

Author
06 Aug 2026
( Updated: 06 Aug 2026
03:28 PM )
मरने के लिए छोड़ा, अस्थियां लेने भी नहीं आईँ बेटियां, अब मौत के बाद इनकी जिंदगी रौशन करेंगी शिवचरण की आंखें
Photo- Viral Video/Social Media/X
Advertisement

‘जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है’ 

इसका मतलब है जब भी किसी मनुष्य पर बुरा समय या विनाश आता है, तो उसकी सही-गलत सोचने की बुद्धि (विवेक) पहले ही मर जाती है. 

राष्ट्रकवि दिनकर ने यूं तो यह कविता महाभारत के संदर्भ में लिखी थी, लेकिन यह आज भी यह समाज की दशा और दिशा बताती है. जब दौलत की दौड़ और स्वार्थ में आदमी इतना अंधा हो जाता है कि उसका न केवल विवेक मरता है बल्कि सोचने समझने और महसूस करने की तमाम शक्तियां भी नष्ट हो जाती हैं और फिर रिश्तों की तस्वीर बदल जाती है जो महज एक मोबाइल स्क्रीन तक सिमटकर रह जाती है. 

ये कहानी है शिवचरण की, जिनका आखिरी इंतजार और उम्मीद आखिरी सांस के साथ खत्म हो गया लेकिन मौत के चंद मिनट पहले तक भी उन्हें आस थी कि शायद मोबाइल की स्क्रीन चमकेगी और उनकी बेटियां आखिरी बार उनका हाल जानते हुए कहेंगी कि पापा कैसे हो आप? लेकिन बेटियों के पास पिता से मिलने का तो दूर एक कॉल करने का भी समय न था. शिवचरण की सांसें थम गईं, लेकिन बेटियों को आत्मग्लानि तक न हुई. जो बेटियां पिता की बीमारी पर उनका सहारा नहीं बन पाईं उन्होंने अपनी असवेंदनशीलता को बरकरार रखते हुए अंतिम संस्कार भी वीडियो कॉल से ही अटेंड किया. 

मुंबई का कपड़ा व्यापारी जिसे चिता भी अपनों ने न दी

Advertisement

पूरा नाम- शिवचरण रामरतन गुप्ता, मुंबई के एक प्रतिष्ठित कपड़ा व्यापारी, उनकी तीन बेटियां हैं, जिनको पढ़ाने लिखाने काबिल बनाने से लेकर ब्याहने तक में उन्होंने कोई कमी नहीं रखी. व्यापार में सफलता से ज्यादा शिवचरण के लिए उनकी तीनों बेटियों की सफलता गर्व का पल थी. उन्होंने बेटियों के लिए जो बन सका वो सब कुछ किया. लेकिन जब उन्हें अपने बच्चों की सबसे ज्यादा जरूरत थी तभी बेटियों ने साथ छोड़ दिया. 

हारी-बीमारी और हर परेशानी शिवचरण और उनकी पत्नी मीना गुप्ता ने अकेले ही संभाली, कोई हाल चाल भी न पूछता. फिर डेढ़ साल पहले शिवचरण और मीना हरियाणा के सोनीपत के वृद्धाश्रम में रहने आ गए. यहां भी शिवचरण का इकलौता सहारा उनकी पत्नी मीना गुप्ता उन्हें छोड़कर चली गईं. बीमारी के बाद उनका निधन हो गया. 

अंतिम सांस तक बेटियों ने एक फोन का इंतजार रहा 

शिवचरण की जिंदगी अकेले बीतने लगी, पत्नी के जाने के गम के बीच उन्होंने वृद्धाश्रम के लोगों को ही परिवार बना लिया, लेकिन मन में वो जो दबी सी आस थी कि बेटियां एक बार कॉल ही कर लें. 

फिर एक दिन अचानक शिवचरण की तबीयत बिगड़ गई. उन्हें हॉस्पिटल ले जाया गया. वृद्धाश्रम संचालकों को पता था कि शिवचरण बेटियों को कितना याद करते हैं, ऐसे में उन्होंने बेटियों को शिवचरण की तबीयत के बारे में जानकारी दी. इससे बावजूद बेटियों उनसे मिलने नहीं आई. 

Advertisement

शिवचरण वृद्धाश्रम संचालक से पूछा करते थे कि क्या बेटियों का कोई कॉल आया, जवाब में वृद्धाश्रम वाले खामोश हो जाते और शिवचरण सब कुछ समझ जाते. फिर 4 अगस्त मंगलवार के दिन शिवचरण ने दुनिया को अलविदा कह दिया. 

एक बार फिर आश्रम वालों ने बेटियों को कॉल किया और बताया कि शिवचरण नहीं रहे, अगर वे अंतिम संस्कार में आ रही हैं तो उनका इंतजार किया जाए. उम्मीद थी कि अंतिम विदाई के लिए बेटियां आएंगी लेकिन इसके बजाय मुंबई में रहने वाली उनकी एक बेटी ने ऑनलाइन 5100 रुपये अंतिम संस्कार की प्रक्रिया के लिए भेज दिए. 

उसके अलावा शिवचरण की अन्य दो बेटियां नेपाल और आजमगढ़ में रहती हैं. वो भी न पहुंच सकी. शायद उन पर जिम्मेदारियों का बोझ होगा, ऐसा बोझ जो पिता को आखिरी बार न देख पाने के गम से भी बड़ा हो, जिसमें न कोई ग्लानि थी न कोई शर्म, बस एक बात कहनी थी वो ये कि सॉरी मैं नहीं आ पाऊंगी. 

Advertisement

वहीं, शिवचरण की मुंबई वाली बेटी ने वीडियो कॉल के जरिए पिता की चिता को जलते हुए देखा, इस चिता के साथ समाज की संवेदनशीलता, रिश्तों का अहसास, साथ और अपनापन भी जल रहा था. चिता से जो अंगारे निकल रहे थे वो एक अभिशाप और रिश्तों के घिनौने स्वरूप को बयां कर रहे थे. जिसमें तीनों बेटियों के संस्कार भी जल रहे थे. 

शिवचरण की आंखें करेंगी उजाला 

शायद शिवचरण अपनी मौत से पहले ही मर चुके थे, आत्मा पहले ही जी भरकर रो चुकी थी, जिन अपनों के साथ की आस थी वो एक कॉल न कर सके, उनके इंतजार में आंखें भी सूख चुकी थीं, ऐसे में शिवचरण ने मौत से पहले नेत्रदान का फैसला किया, ताकि वो किसी की जिंदगी में उजाला भर सकें. 

शिवचरण आखिरी सफर में खुद अकेले रह गए. न कोई अपना, न कोई कंधा, बस वीडियो कॉल पर बच्चों ने हाजिरी लगा दी. उनकी आखिरी ख्वाहिश और उम्मीद तो पूरी नहीं हुई लेकिन उनकी आंखें किसी की उम्मीदों को रौशन करेंगी. 

Advertisement

ये मामला काफी चर्चा में है लोग सोशल मीडिया पर शिवचरण की बेटियों को कलयुगी और अभिशाप कह रहे हैं. कवि और लेखक कुमार विश्वास ने भी इस भावुक कर देने वाली कहानी पर रिएक्ट किया है. उन्होंने सोशल मीडिया X पर शिवचरण से जुड़ी एक पोस्ट को शेयर करते हुए लिखा, 'लगा अगर गेहूं में कीड़ा बाहर से मंगवाओगे, ‘घुना’ हुआ चारित्रय देश का उसे कहां से लाओगे'. इसका मतलब है कि जब अपनों के बीच ही अपनों का ख्याल रखना छूट जाए और चरित्र का पतन भीतर से शुरू हो जाए, तो बाहरी व्यवस्था या दोषारोपण से सुधार संभव नहीं है. 

यह भी पढ़ें

यह भी पढ़ें- आतंकियों से लिया लोहा, अब दिल्ली में करेंगी क्राइम कंट्रोल, कौन हैं लेडी ऑफिसर तनुश्री? जिनके ट्रांसफर ने रुलाया

Tags

Advertisement
टिप्पणियाँ 0
G
Guest (अतिथि)
LIVE
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
शॉर्ट्स
वेब स्टोरीज़
होम वीडियो खोजें