इस साल CMF की कमान मिलने के बाद भी पाकिस्तान अपने नाविकों को क्यों नहीं बचा पा रहा है?
दुनिया के सबसे व्यस्त और संवेदनशील समुद्री इलाकों में काम करने वाले इस बहुराष्ट्रीय गठबंधन में पाकिस्तान की भूमिका को उसकी नौसेना लगातार अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करती रही है.
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इस साल जनवरी 2026 के आखिरी हफ्ते में पाकिस्तान को Combined Maritime Forces (CMF) की कमान मिली. यहीं नहीं पाकिस्तान CMF के शुरुआती साझेदार देशों में शामिल रहा है. दुनिया के सबसे व्यस्त और संवेदनशील समुद्री इलाकों में काम करने वाले इस बहुराष्ट्रीय गठबंधन में पाकिस्तान की भूमिका को उसकी नौसेना लगातार अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करती रही है. लेकिन 2026 की एक घटना ने पाकिस्तान के इस दावे के सामने बड़ा और असहज सवाल खड़ा कर दिया है. CMF की एक अहम टास्क फोर्स की कमान के बावजूद उसी व्यापक समुद्री क्षेत्र में पाकिस्तानी नाविक हमले का शिकार हो गए. ऐसे में सवाल तो उठता है कि अगर दो दशक की साझेदारी, संयुक्त समुद्री अभियान और टास्क फोर्स की कमान संभालने के बाद भी पाकिस्तान अपने नागरिकों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे पा रहा, तो उसकी इस समुद्री कूटनीति का वास्तविक फायदा क्या है?
इस साल पाकिस्तान के पास थी CTF-150 की कमान
पाकिस्तानी नौसेना ने 28 जनवरी 2026 को Combined Task Force-150 यानी CTF-150 की कमान संभाली थी. पाकिस्तान के कमोडोर मुहम्मद यासिर ताहिर ने यह जिम्मेदारी संभाली और पाकिस्तान जुलाई के आखिर तक इस टास्क फोर्स की कमान में रहा. यह पाकिस्तान के लिए CTF-150 की कमान संभालने का 14वां मौका था.
CTF-150 का काम अरब सागर, हिंद महासागर और आसपास के समुद्री क्षेत्रों में गैर-राज्य तत्वों और अवैध गतिविधियों से जुड़े खतरों पर नजर रखना और समुद्री सुरक्षा में सहयोग करना है. पाकिस्तान ने इस कमान को अपनी नौसेना की अंतरराष्ट्रीय भूमिका और समुद्री सुरक्षा में बढ़ते महत्व के तौर पर पेश किया. लेकिन इसी साल जब पाकिस्तानी नागरिक समुद्री हिंसा की चपेट में आए, तो एक बार फिर यह साफ हुआ कि किसी बहुराष्ट्रीय टास्क फोर्स की कमान संभालना और अपने हर नागरिक को सुरक्षा की गारंटी दे पाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं.
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CMF में शामिल होना सुरक्षा की गारंटी नहीं
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात CMF की वास्तविक भूमिका को समझना है. CMF कोई ऐसा संगठन नहीं है, जो किसी सदस्य देश के हर नागरिक या हर जहाज को व्यक्तिगत सुरक्षा प्रदान करता हो. इसका काम विभिन्न देशों की नौसेनाओं के बीच सहयोग बढ़ाना, समुद्री डकैती, हथियार और ड्रग्स की तस्करी जैसे खतरों से निपटना और महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों में सुरक्षा सहयोग करना है.
यानी पाकिस्तान का CMF में शामिल होना महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किसी विदेशी झंडे वाले जहाज पर काम कर रहे पाकिस्तानी नाविक को संकट के समय विशेष सुरक्षा मिल जाएगी. यही अंतर पाकिस्तान की आधिकारिक तस्वीर और जमीनी हकीकत के बीच दिखाई देता है.
CMF की कमान के बावजूद पाकिस्तान की क्या मजबूरी थी?
पाकिस्तान के सामने सबसे कठिन सवाल खड़ा होता है. अगर पाकिस्तान के पास इस साल CTF-150 की कमान थी, तो फिर पाकिस्तानी नाविकों की सुरक्षा के लिए कोई विशेष चेतावनी, समन्वय या निकासी व्यवस्था क्यों नजर नहीं आई?
बेशक, हर हमले को रोकना किसी भी नौसेना या बहुराष्ट्रीय गठबंधन के लिए संभव नहीं होता. लेकिन किसी देश के लिए असली परीक्षा संकट के बाद शुरू होती है. क्या खतरे वाले समुद्री क्षेत्रों में काम कर रहे पाकिस्तानी नागरिकों के लिए कोई अलग सुरक्षा तंत्र था? क्या विदेशी जहाजों पर काम करने वाले पाकिस्तानी नाविकों के लिए संकट के समय विशेष निकासी योजना बनाई गई थी? यही सवाल अब पाकिस्तान की समुद्री रणनीति पर उठ रहे हैं.
तस्वीरों से ज्यादा जरूरी है संकट के समय कार्रवाई
टास्क फोर्स की कमान संभालते नौसेना अधिकारियों की तस्वीरें, अंतरराष्ट्रीय बैठकें और दूसरे देशों की नौसेनाओं के साथ संयुक्त अभ्यास कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होते हैं. लेकिन समुद्र में मिसाइल या ड्रोन हमले के बीच फंसे किसी नाविक के लिए इन तस्वीरों से ज्यादा मायने इस बात के होते हैं कि संकट के समय उसकी मदद के लिए कौन पहुंचेगा. पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा व्यवस्था में सक्रिय भागीदार जरूर है, लेकिन दूर-दराज के संकटग्रस्त क्षेत्रों में अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करने की उसकी क्षमता सीमित है.
भारत का तरीका क्यों अलग दिखता है?
इसी समुद्री क्षेत्र में भारत ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ-साथ स्वतंत्र क्षमता विकसित करने पर भी जोर दिया है. भारतीय नौसेना ने अलग-अलग संकटों के दौरान अपने युद्धपोतों की तैनाती, व्यापारी जहाजों की सुरक्षा और नागरिकों को निकालने के अभियान चलाए हैं. इसका मतलब यह नहीं कि भारत अकेले हर समुद्री संकट का समाधान कर सकता है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के साथ काम करने के बावजूद उसके पास स्वतंत्र कार्रवाई का विकल्प मौजूद है.
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पाकिस्तान के सामने यही सबसे बड़ा अंतर है. उसकी समुद्री रणनीति में अंतरराष्ट्रीय गठबंधन की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन संकट के समय उसके पास अपने नागरिकों के लिए स्वतंत्र कार्रवाई के विकल्प अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देते हैं. 2026 की त्रासदी ने पाकिस्तान के सामने इसी अंतर को सबसे कड़वे तरीके से उजागर कर दिया है.