बार-बार रची जा रही साजिश... आखिर कौन बनाना चाहता है यूपी में 'दूसरा शाहीन बाग'?
मेरठ कलेक्ट्रेट में 'दूसरा शाहीन बाग' बनाने की पूरी तैयारी थी. पुलिस सूत्रों के मुताबिक, 2000 के आसपास लोग दिल्ली से इस प्रदर्शन में हिस्सा लेने आए थे. इस भीड़ में कई चेहरे ऐसे थे जिन्हें शाहीन बाग प्रदर्शन में अक्सर देखा गया था.
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यूपी में चुनाव पास हैं और विपक्ष इस कोशिश में जुटा है कि कुछ ऐसा खास कर दिया जाए कि सूबे में बलवा हो जाए और कानून व्यवस्था चरमराती दिखाई देने लगे. या फिर जाति-धर्म को लेकर कुछ बवाल हो जाए. मेरठ का ताज़ा केस देख कर तो ऐसा ही लगता है. मेरठ की लड़की ललिता की मई के महीने में हत्या हो जाती है, आरोपी पकड़े जाते हैं. पता चलता है कि ललिता और आरोपी दोनों एक दूसरे को जानते थे. लड़की दलित और आरोपी लड़का पिछड़े समाज का था. यानी राजनैतिक समीकरण में इस घटना से फायदा नहीं उठाया जा सकता था.
खबरों के मुताबिक, लड़के को लड़की पर शक था कि वो किसी और से भी बात करती है, इसलिए वह उसे बुलाता है और उसकी हत्या कर देता है. शव पर तेज़ाब भी डालता है. आरोपी सवर्ण नहीं था तो मामला दलितों के खिलाफ शोषण का बना नहीं. पुलिस ने तुरंत कार्रवाई कर आरोपियों को पकड़ भी लिया. लेकिन गौर करने वाली बात है कि आखिर जुलाई के महीने में ललिता की मौत पर बवाल क्यों हुआ? ये एक बड़ा सवाल है.
'दूसरा शाहीन बाग' बनाने की थी तैयारी!
सूत्रों के मुताबिक, जुलाई के महीने में मेरठ कलेक्ट्रेट के सामने ललिता को न्याय दिलाने के लिए भीड़ जुटी. भीड़ क्यों जुटी, जब ललिता की हत्या के आरोपी पकड़े जा चुके थे, यह बात समझ से परे है. पुलिस को इस बात पर शक हुआ कि इतने दिनों बाद इस मसले को किसकी शह पर उठाया जा रहा है. आखिर किस घटना को अंजाम देने की तैयारी हो रही थी. पुलिस सूत्रों के मुताबिक, 2000 के आसपास लोग दिल्ली से इस प्रदर्शन में हिस्सा लेने आए थे. इस भीड़ में कुछ चेहरे ऐसे थे जिन्हें शाहीन बाग प्रदर्शन में अक्सर देखा गया था. सूत्र बताते हैं कि लड़की की मौत के बहाने मेरठ कलेक्ट्रेट में 'दूसरा शाहीन बाग' बनाने की पूरी तैयारी थी.
SSP के थप्पड़ की गूंज से एक्टिव हुआ विपक्ष
लेकिन इस विरोध प्रदर्शन में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब ज़िले के SSP ने रवि गौतम नाम के प्रदर्शनकारी को पुलिस वैन में घुसकर थप्पड़ जड़ दिए. प्रत्यक्षदर्शियों ने देखा भी कि रवि गौतम पुलिस वालों को बार-बार उकसा रहा था कि वो उसे पीटें, जिससे ख़बर बन जाए. यह उसकी किस्मत ही थी कि एसएसपी ने उसकी पिटाई कर दी. अब एसएसपी हैं ब्राह्मण, रवि गौतम हैं दलित, तो विपक्षी राजनीतिक दलों के लिए परफेक्ट कॉम्बिनेशन बन गया. जाहिर है कि जो भीड़ प्रायोजित होकर दिल्ली से आई थी, वह अपने उद्देश्य में सफल हो गई. हंगामा हुआ, दलित उत्पीड़न का मामला बना. पहले चंद्रशेखर और फिर अखिलेश यादव ने इस घटना का अपने राजनीतिक हित साधने के लिए इस्तेमाल किया.
अचानक कैसे टूटी चंद्रशेखर की नींद?
इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि जो चंद्रशेखर दलित लड़की की हत्या पर नहीं जागे थे, क्योंकि आरोपी भी पिछड़े समुदाय का निकला था, वो चंद्रशेखर ब्राह्मण एसएसपी के थप्पड़ मारते ही सड़क पर आ गए. मुद्दा बना लिया कि दलितों को अपनी बात नहीं रखने दी जा रही है. जबकि ज़िले के अफसर इस लड़की के माता-पिता से कई बार मिले और पीड़ित परिवार पुलिस की कार्रवाई से आश्वस्त भी था. तो फिर ये मामला सड़क पर दो महीने बाद क्यों आ गया, ये गौर करने वाली बात है.
अखिलेश-चंद्रशेखर के बीच लगी जबरदस्त होड़
किसी भी समुदाय की बेटी की हत्या हो, वह बेहद शर्मनाक है. ऐसी घटनाओं का राजनैतिक इस्तेमाल पार्टियां अपने फायदे के लिए करती हैं. मेरठ में भी राजनीतिक फायदा उठाने की ज़बरदस्त होड़ लगी. चंद्रशेखर अपने समर्थकों को लेकर सड़क पर उतर आए. सपा सांसद इकरा हसन ने पीड़ित परिवार को अपनी कार में बिठाया और उसे लेकर सीधे दिल्ली आ गईं, अखिलेश से मुलाकात करवाने. अखिलेश नें पीड़ित परिवार को दो लाख रुपए का लिफाफा पकड़ाया और फोटो खिंचवाई. अब वही फोटो सोशल मीडिया पर वायरल की जा रही है.
आंदोलनजीवियों पर पैनी नज़र रखने की जरूरत
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मेरठ का ललिता कांड व्यक्तिगत कारणों से उपजे अपराध का था. लड़की दलित और आरोपी लड़का पिछड़े समुदाय का था. शायद इसीलिए दिल्ली से नेता मेरठ की ओर नहीं दौड़े. लेकिन, चुनाव सर पर है इसलिए राजनैतिक स्वार्थ के चलते हड़तालें भी करवाई जा सकती हैं. किसी ऐसे गैरज़रूरी आंदोलन को हवा दी जा सकती है, जिससे माहौल खराब हो, लोगों को परेशानी हो और फिर राजनेता अपनी-अपनी राजनीतिक फसल काटने सड़क पर उतर सकें. ज़रूरत है ऐसे आंदोलनजीवियों पर सतर्क नज़र रखने की.