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कलयुग में त्रेतायुग का तप: 22 घंटे एक आसन पर बैठकर करते हैं शिव आराधना, हरिद्वार में गूंज रहा स्वामी कैलाशानंद गिरी का महा-रुद्राभिषेक

स्वामी कैलाशानंद गिरी जी की यह अखंड साधना आज की भागदौड़ भरी पीढ़ी के लिए आईना है. यह बताती है कि तकनीक और तेज रफ्तार के बीच भी मन को साधा जा सकता है.

कलयुग में त्रेतायुग का तप: 22 घंटे एक आसन पर बैठकर करते हैं शिव आराधना, हरिद्वार में गूंज रहा स्वामी कैलाशानंद गिरी का महा-रुद्राभिषेक
Image Source: X/@ShantanuShuklaG
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मोबाइल के नोटिफिकेशन, काम का दबाव और 2 मिनट की एकाग्रता भी मुश्किल हो गई है. ऐसे समय में देवभूमि उत्तराखंड की धरती पर हर सावन एक ऐसा दृश्य देखने को मिलता है जो सीधे त्रेतायुग के ऋषियों की याद दिला देता है.

श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी के आचार्य महामंडलेश्वर पूज्य स्वामी कैलाशानंद गिरी जी महाराज पिछले कई वर्षों से हरिद्वार में लोक कल्याण के लिए जिस अखंड शिव साधना का संकल्प ले रहे हैं, वह आज के युग में भक्ति और संयम की सबसे बड़ी मिसाल बन गई है.

एक आसन, 22 घंटे का मौन: शरीर नहीं, संकल्प बोलता है

हरिद्वार के सिद्धपीठ श्री दक्षिण काली पीठ में सावन शुरू होते ही महाराज जी 22 से 23 घंटे तक एक ही आसन पर विराजमान हो जाते हैं. कड़ाके की गर्मी, उमस और शरीर की थकान के बावजूद न हिलना, न डुलना, न बोलना. इस पूरे समय वे केवल भगवान कैलाशेश्वर महादेव के महा-रुद्राभिषेक और ध्यान में लीन रहते हैं. मंत्रोच्चार के बीच उनकी आंखें बंद और चेतना सिर्फ शिव तत्व में डूबी रहती है.

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आश्रम से जुड़े साधकों का कहना है कि बिना खाए-पीए और बिना विश्राम के इतनी लंबी साधना करना सामान्य इंसान के बस की बात नहीं. यह केवल योग बल, अटूट इच्छाशक्ति और भोलेनाथ के प्रति अनन्य समर्पण से ही संभव है.

"शिव को आडंबर नहीं, सच्चा भाव चाहिए": शिव महापुराण का संदेश

स्वामी कैलाशानंद गिरी जी महाराज इस साधना को अपनी व्यक्तिगत सिद्धि के लिए नहीं करते. उनका उद्देश्य स्पष्ट है: विश्व शांति, राष्ट्र कल्याण और सनातन संस्कृति का उत्थान.

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अपने प्रवचनों और शिव महापुराण की कथाओं में वे बार-बार यही कहते हैं: 

"महादेव आदि और अंत हैं. उन्हें पाने के लिए बड़े आयोजन की जरूरत नहीं. एक लोटा जल, एक बेलपत्र और सच्चा भाव ही काफी है." 

उनका मानना है कि कलयुग में भी अगर निष्काम भाव से साधना की जाए तो ईश्वर की कृपा तुरंत बरसती है.

शिव साधना के साथ पर्यावरण का संकल्प

महाराज जी की शिव भक्ति का एक और अनूठा पहलू प्रकृति से जुड़ा है. वे कहते हैं कि भगवान शिव स्वयं प्रकृति के स्वरूप हैं. इसलिए उनके अनुष्ठान का हिस्सा अब पौधरोपण भी बन गया है. सावन भर में देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को वे वृक्ष लगाने और पर्यावरण बचाने की शपथ दिलाते हैं. उनके आश्रम द्वारा चलाए जा रहे वृहद अभियान का संदेश साफ है: शिव की आराधना का मतलब सृष्टि की रक्षा भी है.

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आधुनिक समाज के लिए प्रेरणा

धर्माचार्यों का मानना है कि स्वामी कैलाशानंद गिरी जी की यह अखंड साधना आज की भागदौड़ भरी पीढ़ी के लिए आईना है. यह बताती है कि तकनीक और तेज रफ्तार के बीच भी मन को साधा जा सकता है. हरिद्वार की पावन भूमि पर होने वाला यह अनुष्ठान सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं है. यह संपूर्ण मानव जाति को अध्यात्म, संयम और शांति का मार्ग दिखाता है.

कलयुग में जब सब कुछ बदल रहा है, तब स्वामी कैलाशानंदस्वामी कैलाशानंद गिरी जी महाराज का यह तप यह याद दिलाता है कि श्रद्धा और संकल्प आज भी उतने ही जीवित हैं जितने त्रेतायुग में थे.

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लेखक: शांतनु शुक्ला
वरिष्ठ पत्रकार एवं प्रचार प्रसार प्रभारी स्वामी कैलाशानंद गिरी जी महाराज

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