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लोकतंत्र का सच्चा सेनानी, आपातकाल के गुमनाम नायक सूर्य कुमार...जननायक चंद्रशेखर के करीबी और गांधीनिष्ठ समाजवादी की रही पहचान

आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए जेल की कड़ी यातनाएं सहने वाले पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी के बेहद करीबी रहे सूर्य कुमार जी एक सच्चे गांधीनिष्ठ समाजवादी और 'लोकतंत्र सेनानी' हैं. उन्होंने अपने व्यक्तित्व से बताया कि राजनीति सत्ता का नहीं, बल्कि जन-सेवा और सामाजिक जागरूकता का माध्यम है.

लोकतंत्र का सच्चा सेनानी, आपातकाल के गुमनाम नायक सूर्य कुमार...जननायक चंद्रशेखर के करीबी और गांधीनिष्ठ समाजवादी की रही पहचान
सूर्य कुमार जी की फोटो डायरी से तस्वीर साभार
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25 जून 1975 की रात देश में आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा की गई. इस निर्णय का विरोध करने वाले देश भर के हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं, सामाजिक नेताओं और लोकतंत्र समर्थकों को गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया गया. लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले इन लोगों को आज हम 'लोकतंत्र सेनानी' के रूप में याद करते हैं.

जब भी आपातकाल के उस दौर की चर्चा होती है, तब उन अनगिनत लोकतंत्र सेनानियों के साहस, त्याग और संघर्ष को स्मरण करना आवश्यक हो जाता है, जिन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए व्यक्तिगत कठिनाइयाँ झेलीं. ऐसे ही लोकतंत्र सेनानियों में एक नाम सूर्य कुमार का भी है, जिन्होंने उस कठिन समय में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभाई और जेल यात्रा भी की.

सूर्य कुमार का जीवन इस बात का प्रमाण है कि आज भी 'चंद्रशेखर के लोग' कहे जाने वाले कुछ व्यक्तित्व सत्य, निष्ठा, त्याग और कर्तव्यपरायणता के समाजवादी आदर्शों को विपरीत परिस्थितियों में भी पूरी ईमानदारी से जी रहे हैं.

सूर्य कुमार का जीवन आधुनिक भारत के राजनीतिक और सामाजिक बदलावों का एक सीधा गवाह रहा है. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी के बेहद करीबी, विश्वासपात्र और गांधीनिष्ठ समाजवादी नेता के रूप में उन्होंने भारतीय राजनीति के उतार-चढ़ाव को बहुत करीब से देखा और समझा है.

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चंद्रशेखर के करीबी, सच्चे समाजवादी-सूर्य कुमार

उनका जन्म 25 फरवरी 1954 को उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के पयागपुर ब्लॉक (तहसील) के अंतर्गत आने वाले गाँव एलो में एक किसान परिवार में हुआ था. ग्रामीण परिवेश के सीधे-सरल माहौल में पले-बढ़े सूर्य कुमार को बचपन से ही सत्य, निष्ठा और परोपकार के संस्कार मिले. उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव की प्राइमरी पाठशाला, मल्लव से हुई. इसके बाद कक्षा 6 से 8 तक की पढ़ाई उन्होंने श्री राम नारायण सिंह इंटर कॉलेज, खजूरी से की और कक्षा 9 से 12वीं तक की शिक्षा के.वी. इंटर कॉलेज, पयागपुर से पूरी की. अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान ही उनके भीतर समाज के वंचित और शोषित वर्ग के प्रति संवेदनशीलता जागृत होने लगी थी.

स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ का रुख किया और शिया डिग्री कॉलेज से बी.एस.सी. (B.Sc.) की डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के विधि संकाय (Law Faculty) में एल.एल.बी. (LL.B.) में दाखिला लिया. वह दौर वैचारिक आंदोलनों का था, जिसके प्रभाव में आकर वे विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में सक्रिय हो गए. हालांकि, उनकी यह सक्रियता किसी पद के लिए नहीं, बल्कि छात्रों के अधिकारों और लोकतांत्रिक माहौल को बनाए रखने के लिए थी. इसी दौरान उनके राजनीतिक जीवन को एक नई दिशा मिली. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सी.बी. गुप्ता (चंद्रभान गुप्ता) जी के सानिध्य ने उनके विचारों और व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डाला.

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वर्ष 1974 में जब पूरा देश महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलित था, तब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने 'संपूर्ण क्रांति' का आह्वान किया. सूर्य कुमार भी निस्वार्थ भाव से इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन से जुड़ गए. शुरुआत में वे किसी राजनीतिक दल में शामिल नहीं थे, लेकिन वैचारिक समानता के कारण वे 'संगठन कांग्रेस' के नेताओं के साथ मिलकर सत्याग्रह में भाग लेने लगे. इस आंदोलन के दौरान पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लखनऊ जिला जेल भेज दिया, जहाँ वे करीब एक महीने तक बंद रहे. इस पहली जेल यात्रा ने उनके भीतर संघर्ष की नींव को और मजबूत किया. जेल से रिहा होने के बाद, वे औपचारिक रूप से 'संगठन कांग्रेस' के सदस्य बन गए.

आपातकाल के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले गुमनाम सिपाही

25 जून 1975 को जब देश में आपातकाल लागू हुआ, तब विपक्षी नेताओं और छात्र आंदोलनकारियों की धरपकड़ तेज हो गई. पुलिस की गिरफ्तारी से बचने के लिए सूर्य कुमार भूमिगत हो गए. वे लखनऊ-कानपुर हाईवे पर स्थित नवाबगंज के पास अपनी मौसी के गाँव 'कुसहरी' चले गए और वहीं छिपकर अपनी एल.एल.बी. की परीक्षाओं की तैयारी करने लगे. इसी बीच उनके एल.एल.बी. प्रथम वर्ष की परीक्षाओं की तारीखें आ गईं. ऐसे कठिन और जोखिम भरे माहौल में भी उन्होंने साहस का परिचय दिया और पुलिस की नजरों से बचते-छिपते, भेष बदलते हुए अपनी परीक्षाएं दीं.

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परीक्षाओं के बाद, लखनऊ के हजरतगंज में सूर्य कुमार की मुलाकात इंटेलिजेंस ब्यूरो (I.B.) के एक वरिष्ठ अधिकारी ए.बी. सिंह से हुई. अधिकारी ने उन्हें टोकते हुए कहा, "अगर राजनीति ही करनी है तो संजय गांधी के साथ आ जाओ, वरना जेल जाने के लिए तैयार रहो." लेकिन एक सच्चे समाजवादी की तरह उन्होंने सिद्धांतों से समझौता करने के बजाय संघर्ष का कठिन रास्ता चुना.

इसके बाद, वे अपने सहयोगियों ओमप्रकाश त्रिपाठी और विमल बहुगुणा के साथ लखनऊ के व्यस्त अमीनाबाद चौराहे पर 'प्रकाश कुल्फी' के सामने सरकार विरोधी भूमिगत पर्चे (लोक संग्राम) बांटने लगे. जैसे ही पुलिस की नजर उन पर पड़ी, सूर्य कुमार जी बिना डरे ट्रैफिक पुलिस के ऊंचे चबूतरे पर चढ़ गए और 'इन्दिरा गांधी मुर्दाबाद, जयप्रकाश नारायण जिंदाबाद' के नारे लगाने लगे. शनिवार का दिन होने के कारण बाजार में भारी भीड़ थी और नारे सुनते ही सैकड़ों लोग वहां जमा हो गए. माहौल बिगड़ता देख, पुलिस ने खौफ पैदा करने के लिए चौराहे पर ही तीनों नौजवानों पर बेरहमी से लाठियां बरसाईं और उन्हें घसीटते हुए थाने ले गई.

थाने की हवालात में उन्हें बिना अन्न-जल के रखा गया और अमानवीय यातनाएं दी गईं. पुलिस ने एक दलाल की गवाही पर उन्हें 'नक्सलाइट' नेटवर्क से जोड़कर झूठी चार्जशीट बना दी. इस क्रूरता से उनके शरीर पर हुए गहरे घावों का इलाज डॉ. सुरेश चंद्र श्रीवास्तव ने किया. बाद में अदालत में, कानून के मेधावी छात्र सूर्य कुमार जी ने खुद पैरवी की और पुलिस के दलाल गवाह 'नंदलाल' व दरोगा के आपसी संबंधों को उजागर कर इस झूठी कहानी को बेनकाब कर दिया.

जेल प्रशासन ने प्रताड़ित करने के लिए उन्हें अपराधियों के साथ 'सर्किल' में डाल दिया. वहाँ उनकी मुलाकात उम्रकैद काट रहे नक्सली डॉ. सत्यपाल से हुई, जिन्होंने अपनी सूखी रोटियों को जलाकर बनाई 'काली चाय' इन घायल नौजवानों को पिलाई, जिससे उन्हें राहत मिली. जब राजनीतिक बैरक के वरिष्ठ नेताओं को इस अन्याय का पता चला, तो पूर्व मंत्री चंद्रमोहन सिंह नेगी के नेतृत्व में कैदियों ने विद्रोह कर दिया. इसके बाद जेलर को माफी मांगनी पड़ी और सूर्य कुमार को पॉलिटिकल बैरक में शिफ्ट कर दिया गया. तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हौसला नहीं खोया और लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा जेल में ही बनाए गए विशेष केंद्र से एल.एल.बी. द्वितीय और तृतीय वर्ष की परीक्षाएं दीं.

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सूर्य कुमार कुल 14 महीने जेल में रहे. उस समय जेल के भीतर राजनीतिक कैदी अलग-अलग विचारधाराओं (आरएसएस/जनसंघ, समाजवादी और संगठन कांग्रेस) में बंटे हुए थे. 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती पर सभी राजनीतिक बंदियों ने सामूहिक रूप से एक क्रांतिकारी निर्णय लिया कि वे जेल के शौचालयों और नालियों की सफाई करेंगे और सफाई कर्मचारियों के साथ बैठकर सह-भोज करेंगे. लेकिन जब कथनी और करनी को साबित करने का समय आया, तो इस सामूहिक निर्णय के बावजूद मैदान में केवल तीन राजनीतिक बंदी—सूर्य कुमार, बब्बन सिंह और स्वतंत्रता सेनानी राम सागर मिश्रा—ही झाड़ू-पंजा लेकर आगे आए. याद रहे, उस दौर में जेलों में फ्लश सिस्टम नहीं था और इन तीनों ने मिलकर करीब 250 बंदियों के मलमूत्र को सीधे साफ करने का बेहद कठिन श्रमदान किया.

असली वैचारिक टकराव भोजन के समय हुआ. जब सफाईकर्मियों को कैदियों के बीच बैठाया गया, तो छुआछूत की भावना और रूढ़िवादी सोच के कारण कुछ लोगों ने साथ भोजन करने से साफ इनकार कर दिया. इसके विपरीत, सूर्य कुमार और उनके समाजवादी साथी अपने सिद्धांतों पर अंत तक डटे रहे और बिना किसी भेदभाव के सफाईकर्मियों के साथ बैठकर भोजन किया.

जेल में ही एक बार कागजी भ्रम के कारण पुलिस जबरन कुछ छात्रों को बरेली जेल भेजने लगी. लोक दल के वरिष्ठ नेता, पूर्व मेयर इलाहाबाद महानगर पालिका तथा तत्कालीन विधायक सत्य प्रकाश मालवीय ने इसका कानूनी विरोध किया, तो अगले दिन ए.डी.एम. सिटी भारी पीएसी बल के साथ बैरक में घुस आए. प्रशासन का यह दमन देख बुजुर्ग स्वतंत्रता सेनानी राम सागर मिश्रा ने आगे बढ़कर सीधे ए.डी.एम. का गला पकड़ लिया, जिससे घबराकर प्रशासन को अपनी फोर्स पीछे हटानी पड़ी. इसके बाद समाजवादी नेता हर्षवर्धन सिंह के ट्रांसफर को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया. नियमों के मुताबिक कैदियों को सर्दियों का कोट मिलना था, लेकिन हर्षवर्धन जी के लंबे कद के नाप का कोट स्टोर में नहीं था. समाजवादियों ने अड़ंगा लगा दिया कि बिना कोट के वे कदम बाहर नहीं रखेंगे. मामला बढ़ता देख जेलर ने अपना खुद का निजी कोट उतारकर उन्हें पहना दिया. हर्षवर्धन जी ने वह कोट पहना और फिर तुरंत सम्मानपूर्वक वापस सौंप दिया. इस अनोखे सांकेतिक विरोध के साथ यह विवाद शांत हुआ.

14 महीने बाद जब उनकी रिहाई हुई, तो वे अपने गाँव पहुंचे. लेकिन कुछ ही घंटे बाद पुलिस उनके घर धमक गई और भविष्य में सरकार विरोधी राजनीति न करने का एक हलफनामा मांगने लगी. सूर्य कुमार ने इसके लिए साफ मना कर दिया. उनके इस अडिग समाजवादी तेवर और पिता जी के बीच-बचाव के आगे पुलिस को खाली हाथ वापस लौटना पड़ा.

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आपातकाल के बाद सूर्य कुमार ने लखनऊ विश्वविद्यालय के 'एम.ए. इन पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन' कोर्स में दाखिला लिया. उस समय उस्मानिया विश्वविद्यालय की तर्ज पर इसे एक प्रोफेशनल डिग्री बनाने के लिए सूर्य कुमार और उनके साथी सुरेंद्र नाथ शुक्ला 'देहाती' ने एक बड़ा छात्र आंदोलन शुरू किया. इस मांग को लेकर करीब चार साल तक छात्र संघर्ष चलता रहा, जिस दौरान विश्वविद्यालय में परीक्षाएं भी बाधित रहीं. आखिरकार प्रशासन को झुकना पड़ा और लखनऊ विश्वविद्यालय ने इसे 'मास्टर इन पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन' (M.P.A.) नाम से एक प्रोफेशनल कोर्स के रूप में बहाल कर दिया. जब यह मांग पूरी हुई और परीक्षाएं दोबारा शुरू हुईं, तब तक अन्य साथियों ने तो परीक्षा पास कर ली, लेकिन सूर्य कुमार पूरी तरह सांगठनिक और सामाजिक गतिविधियों में व्यस्त हो चुके थे, जिसके कारण उनकी यह डिग्री अधूरी रह गई.

वर्ष 1980 में जनता पार्टी के बिखराव के बाद, सारनाथ में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन बेहद सफलतम अधिवेशन रहा, जिसने बिखर चुकी जनता पार्टी में एक नई संजीवनी फूंकने का काम किया. इस ऐतिहासिक अधिवेशन के बाद सूर्य कुमार को 'जनता पार्टी (उत्तर प्रदेश)' का 'प्रांत सचिव' जैसी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई. संगठन में नई जान फूंकने के लिए उन्होंने लखनऊ से मेरठ तक की पहली ऐतिहासिक साइकिल यात्रा निकाली. उन्होंने गाँवों में चौपालें लगाईं और हजारों कार्यकर्ताओं से सीधा संपर्क कर बिखरे संगठन को दोबारा खड़ा किया.

जब चंद्रशेखर जी ने अपनी प्रसिद्ध 'भारत यात्रा' शुरू की, तो सूर्य कुमार कन्याकुमारी से उनके साथ शामिल हुए. इस यात्रा के बीच में ही चंद्रशेखर जी के निर्देश पर उन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के गाँव 'सिताब दियारा' से राजस्थान के 'धौलपुर' तक 1000 किलोमीटर की दूसरी कठिन साइकिल यात्रा का नेतृत्व किया. ग्रामीण अंचलों में जनचेतना जगाने वाली इस यात्रा के दौरान बरेली की एक जनसभा में उन्होंने धर्मों की उत्पत्ति से पहले 'मानवता के धर्म' पर बेहद तार्किक और ओजस्वी भाषण दिया, जिसकी काफी चर्चा हुई.

सूर्य कुमार के लिए राजनीति कभी सत्ता प्राप्ति या जीत-हार के संकीर्ण दायरों तक सीमित नहीं रही. उनके द्वारा 1980, 1993 और 1996 में लड़े गए विधानसभा चुनाव महज तारीखें नहीं, बल्कि उनके गहरे सामाजिक सरोकारों के गवाह थे. वे चुनाव के मैदान में हार-जीत का गणित लगाने नहीं, बल्कि जनता को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति जागरूक करने उतरे थे. उनका मानना था कि चुनाव केवल सत्ता में पहुंचने का जरिया नहीं, बल्कि जनचेतना और राष्ट्र निर्माण का एक सशक्त माध्यम है.

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सूर्य कुमार के जीवन पर जननायक चंद्र शेखर का गहरा प्रभाव रहा है. वर्ष 1977 से उनका साथ मिला तथा भारत यात्रा से लेकर चंद्रशेखर जी के अंतिम समय तक सूर्य कुमार उनके साथ साये की तरह रहे. जब चंद्रशेखर जी प्रधानमंत्री बने और उसके बाद भी सूर्य कुमार गुरुग्राम के भोंडसी आश्रम में अक्सर रात का भोजन उनके साथ ही करते थे, जहां पर समसामयिक, राजनैतिक और सामाजिक चर्चाएं चलती रहती थीं.

चंद्रशेखर जी के निधन के बाद, बहराइच के देवग्राम सम्मेलन में सूर्य कुमार ने ही उन्हें सर्वप्रथम 'जननायक' कहकर संबोधित किया था, जिसे पूरे देश ने स्वीकार किया. उन्होंने देवग्राम में स्वाभिमान स्थल का निर्माण कराकर चंद्रशेखर जी के अस्थि कलश की स्थापना कराई, जिसका उद्घाटन पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने किया था.

आज उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका लोकतंत्र सेनानी और गांधीनिष्ठ समाजवादी रूप थका नहीं है. वर्तमान में वे भारत यात्रा ट्रस्ट के ट्रस्टी और बहराइच भारत यात्रा केंद्र के प्रभारी के रूप में समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की सेवा में जुटे हैं. आजकल वे 'जागो भारत जागो' कार्यक्रम के माध्यम से युवाओं को चंद्र शेखर के विचारों और देश की समसामयिक समस्याओं से अवगत करा रहे हैं. उनका सादगी और संघर्ष से भरा जीवन हमें हमेशा निस्वार्थ लोक-सेवा की प्रेरणा देता रहेगा.

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लेखक:
मोहम्मद इरफान ऊर्फी 
नोट: मोहम्मद इरफान ऊर्फी, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी के वैचारिक विषयों के शोधार्थी एवं पेशे से फार्मास्यूटिकल मैन्युफैक्चरिंग में क्वालिटी कंट्रोल मैनेजर हैं.

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