अधर में लटका अमेरिका-ईरान शांति समझौता! इजरायल ने लेबनान में की भीषण बमबारी; वेंस का स्विट्जरलैंड दौरा हुआ रद्द
अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए शुरुआती शांति समझौते पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. दक्षिणी लेबनान में इजरायली बमबारी और स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित अमेरिका-ईरान वार्ता के टलने से पश्चिम एशिया में शांति प्रक्रिया को बड़ा झटका लगा है.
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पश्चिम एशिया में शांति की नई उम्मीद जगाने वाला अमेरिका और ईरान के बीच हुआ शुरुआती समझौता अब गंभीर चुनौतियों से घिरता दिखाई दे रहा है. दरअसल, महज दो दिन पहले जिस समझौते को क्षेत्र में तनाव कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा था, उसी पर अब अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह दक्षिणी लेबनान में हुई ताजा सैन्य कार्रवाई और स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित महत्वपूर्ण वार्ता का टल जाना है.
लेबनान में फिर गूंजे धमाके
जानकारी के अनुसार, फ्रांस के वर्साय महल में अमेरिका और ईरान के बीच हुए शुरुआती शांति समझौते का उद्देश्य क्षेत्र में जारी संघर्ष को कम करना था. इस समझौते में लेबनान समेत विभिन्न मोर्चों पर सैन्य गतिविधियां रोकने की बात कही गई थी. हालांकि समझौते के कुछ ही समय बाद दक्षिणी लेबनान में हवाई हमलों की खबरों ने हालात को फिर तनावपूर्ण बना दिया. बताया जा रहा है कि इन हमलों में कई लोगों की जान गई और बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए. इससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या शांति की दिशा में उठाया गया यह कदम वास्तव में जमीन पर असर दिखा पाएगा या नहीं.
इजरायल का सख्त रुख बना चिंता का कारण
इजरायल की ओर से यह स्पष्ट संकेत दिए गए हैं कि वह अपनी सुरक्षा को लेकर किसी तरह का जोखिम नहीं उठाना चाहता. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का कहना है कि जब तक हिजबुल्लाह से जुड़े खतरे पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाते, तब तक सैन्य कार्रवाई और सुरक्षा अभियान जारी रह सकते हैं. यही वजह है कि क्षेत्रीय राजनीति पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ इस घटनाक्रम को बेहद संवेदनशील मान रहे हैं. उनका मानना है कि यदि सभी पक्ष एक जैसी प्रतिबद्धता नहीं दिखाते, तो किसी भी शांति पहल का सफल होना मुश्किल हो सकता है.
स्विट्जरलैंड में होने वाली अहम बैठक टली
शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए शुक्रवार को स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक रिसॉर्ट में तकनीकी स्तर की बातचीत प्रस्तावित थी. इस बैठक को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा था क्योंकि यहां शुरुआती समझौते को स्थायी रूप देने की दिशा में चर्चा होनी थी. लेकिन अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के दौरे के स्थगित होने के बाद यह बैठक भी टाल दी गई. व्हाइट हाउस ने इसके पीछे व्यवस्थागत कारण बताए हैं. वहीं कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि लेबनान में जारी घटनाओं से असंतुष्ट होकर ईरान ने अपने प्रतिनिधियों को भेजने से इनकार किया. जानकारों का मानना है कि शांति समझौते की सफलता केवल दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने से तय नहीं होती, बल्कि जमीन पर उसके पालन से होती है. बुधवार को हुए समझौते में 60 दिनों तक संघर्षविराम बढ़ाने की सहमति बनी थी, लेकिन ताजा घटनाक्रम ने इस लक्ष्य को कठिन बना दिया है.
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फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि आने वाले दिनों में अमेरिका, ईरान और इजरायल किस तरह के कदम उठाते हैं. यदि तनाव कम नहीं हुआ, तो क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने की यह बड़ी कूटनीतिक कोशिश गंभीर संकट में पड़ सकती है.