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ईरान-अमेरिका समझौते में 'ड्रामा’ कर रहा था पाकिस्तान, अमेरिका ने खोल दी पर्दे के पीछे की असली कहानी

अमेरिका-ईरान संघर्ष विराम के बीच पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, जब समझौता अंतिम चरण में था, तब पीएम शाहबाज शरीफ ने एक्स पर ट्रंप से ईरान की डेडलाइन बढ़ाने की अपील की, जबकि असली बातचीत कूटनीतिक चैनलों से पहले ही पूरी हो चुकी थी.

ईरान-अमेरिका समझौते में 'ड्रामा’ कर रहा था पाकिस्तान, अमेरिका ने खोल दी पर्दे के पीछे की असली कहानी
Image Source: IANS
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अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए संघर्ष विराम को लेकर पाकिस्तान खुद को एक अहम मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है, लेकिन अब इस पूरी कहानी का दूसरा पहलू सामने आ गया है. ताजा रिपोर्ट्स ने पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे उसकी कूटनीतिक विश्वसनीयता पर बहस तेज हो गई है.

सोशल मीडिया बनाम कूटनीतिक हकीकत

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जिस समय अमेरिका और ईरान के बीच समझौते को अंतिम रूप दिया जा रहा था, उसी दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सक्रिय नजर आए. उन्होंने अमेरिका से ईरान को दी गई चेतावनी की डेडलाइन दो सप्ताह बढ़ाने की सार्वजनिक अपील की. यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया जब पर्दे के पीछे कूटनीतिक स्तर पर बातचीत लगभग पूरी हो चुकी थी.

पाकिस्तान की अपील

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जानकारी के मुताबिक, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा तय की गई डेडलाइन तेजी से खत्म होने वाली थी. ऐसे में पाकिस्तान ने खुद को बीच का रास्ता निकालने वाला देश दिखाने की कोशिश की. प्रधानमंत्री शरीफ ने न केवल अपील की, बल्कि ट्रंप और उनके शीर्ष सलाहकारों को टैग भी किया. हालांकि, रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि व्हाइट हाउस ने शरीफ के पोस्ट से पहले ही ईरान के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिए थे. इससे साफ होता है कि पाकिस्तान की सार्वजनिक अपील का वास्तविक फैसले पर कोई खास असर नहीं पड़ा.

लेबनान को लेकर विवाद

इतना ही नहीं, लेबनान को लेकर भी पाकिस्तान का दावा गलत साबित हुआ. प्रधानमंत्री शरीफ ने कहा था कि संघर्ष विराम में लेबनान भी शामिल है, लेकिन अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया. इस विरोधाभास ने पाकिस्तान की स्थिति को और कमजोर कर दिया है.

व्हाइट हाउस का दबाव

एक अन्य रिपोर्ट में दावा किया गया है कि व्हाइट हाउस ने पाकिस्तान पर दबाव बनाया था कि वह ईरान के साथ अस्थायी युद्धविराम कराने में मदद करे. इससे यह संकेत मिलता है कि पाकिस्तान पूरी तरह स्वतंत्र मध्यस्थ नहीं था, बल्कि अमेरिका के प्रस्ताव को आगे बढ़ाने का माध्यम बन रहा था. बातचीत से जुड़े सूत्रों के अनुसार, अमेरिका ने पाकिस्तान से कहा था कि वह वॉशिंगटन का प्रस्ताव ईरान के सामने रखे. इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर की भूमिका भी महत्वपूर्ण बताई जा रही है. उन्होंने अमेरिकी अधिकारियों के साथ बातचीत में सक्रिय भागीदारी निभाई. इससे यह स्पष्ट होता है कि इस प्रक्रिया में केवल राजनीतिक नेतृत्व ही नहीं, बल्कि सैन्य नेतृत्व भी शामिल था.

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इस्लामाबाद में अगली बड़ी बैठक

अब पाकिस्तान शुक्रवार को अमेरिका और ईरान के बीच उच्च स्तरीय वार्ता की मेजबानी करने जा रहा है. इस बैठक का उद्देश्य मौजूदा युद्धविराम को मजबूत करना और क्षेत्र में बढ़ते तनाव को नियंत्रित करना है. दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंच चुके हैं या पहुंचने वाले हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि बातचीत का दौर आगे भी जारी रहेगा. बुधवार को अमेरिका और ईरान दो सप्ताह के सशर्त युद्धविराम पर सहमत हुए थे. अब इस अस्थायी समझौते को स्थायी शांति में बदलने की चुनौती सामने है. ऐसे में पाकिस्तान की भूमिका पर उठे सवाल यह तय करेंगे कि वह एक भरोसेमंद मध्यस्थ बन पाता है या नहीं.

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बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम ने यह जरूर साफ कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में केवल सार्वजनिक बयानबाजी ही नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे की रणनीति भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है.

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