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'कर्मभूमि के लिए रहें वफादार, मातृभूमि का भी न भूलें फर्ज...', US में संघ प्रमुख ने समझाया प्रवासी भारतीयों का DNA

प्रवासी भारतीयों से संघ प्रमुख मोहन भागवत ने खास अपील की है. उन्होंने कहा कि भारतवंशी कर्मभूमि के लिए हमेशा वफादार रहें, पहली जिम्मेदारी उन्हीं के प्रति है. इस दौरान उन्होंने इशारों ही इशारों में बता दिया कि आखिर विदेश में रह रहे भारत वासियों और दूसरों में क्या अंतर है.

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30 Aug 2026
( Updated: 30 Aug 2026
12:13 PM )
'कर्मभूमि के लिए रहें वफादार, मातृभूमि का भी न भूलें फर्ज...', US में संघ प्रमुख ने समझाया प्रवासी भारतीयों का DNA
Image Source- X/ @rss.org
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन से बता दिया कि भारत, भारतीयता और भारतवंशियों के मूल्य, संस्कार और सोच दूसरों की तुलना में कितना अलग है. उनके एक बयान ने बता दिया है कि आख़िर भारतवंशी क्यों पाकिस्तानी, खाड़ी के देशों सहित दूसरों से कैसे अलग हैं और क्यों उनकी तरक्की दूसरों की तुलना में ज्यादा है. 

कर्मभूमि के प्रति रहें वफादार: RSS प्रमुख

'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन' में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, "अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों का अपनी कर्मभूमि के प्रति एक कर्तव्य है और उन्हें उसे पूरा करना चाहिए. उन्हें अपनी कर्मभूमि के प्रति वफादार रहना चाहिए. चूंकि भारत उनकी जन्मभूमि है, इसलिए अगर वे कुछ करना चाहते हैं, तो अपनी कर्मभूमि के प्रति कर्तव्य पूरा करने के बाद ऐसा कर सकते हैं; ऐसा करने पर कोई रोक नहीं है. लेकिन यह अनिवार्य नहीं है. आपकी जन्मभूमि आपसे यह उम्मीद करती है कि आप उन मूल्यों के अनुसार जिएं जो उसने आपको सिखाए हैं..."

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'जन्मभूमि का फर्ज भी रखें याद'

आरएसएस प्रमुख ने आगे कहा कि, “विदेश में रहने वाले भारतीयों के लिए भारत ही उनकी जन्मभूमि है, अगर उनमें इसके लिए कुछ करने की इच्छा है और वे अपनी कर्मभूमि के प्रति अपना फर्ज पूरा करने के बाद ऐसा कर सकते हैं, तो इसकी कोई मनाही नहीं है." 

भागवत ने बताया भारतीयों और दूसरों में अंतर!

भागवत का कहा कि भारतीय जिस देश में भी जाते हैं, वहां के ही हो जाते हैं. अपने संस्कार ले जाते हैं, उसका पालन भी करते हैं, लेकिन दूसरों को ना फोर्स करते हैं और ना ही ऐसा ही करने के लिए कहते हैं. अपने विचार, धार्मिक रिति रिवाज को अपनी घर की बंद दीवार के अंदर रखते हैं. वहां जाकर हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र, पूजा-पाठ आदि के लिए दबाव नहीं बनाते, नारे नहीं लगाते हैं. जबकि दूसरों को देख सकते हैं कि कैसे दूसरे देश में जाकर भी अपना गंध नहीं भूलते, अपना धर्म, कट्टरता आदि को मेजबान देश पर थोपना शुरू कर देते हैं. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी इसी सोच की अपील कर बता दिया है कि भारतीयों के लिए जन्मभूमि के साथ-साथ कर्मभूमि भी उतना ही महत्वपूर्ण है और उसके लिए वो मरते दम तक वफादार रहते हैं, गद्दारी नहीं करते.

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने अंतर-धार्मिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहे धार्मिक नेताओं को संगठन का समर्थन देने का ऐलान किया. उन्होंने कहा कि जमीनी स्तर पर लगातार किए गए प्रयासों से दुनिया में संघर्ष और अविश्वास के माहौल को बदला जा सकता है. 

न्यूयॉर्क में आयोजित 'वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी' कार्यक्रम में 30 देशों के 180 से अधिक प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि आरएसएस पूरी ताकत के साथ आपके साथ है, क्योंकि हम एक ही सोच पर हैं.

उन्होंने कहा कि धार्मिक विविधता का सम्मान और उसकी रक्षा की जानी चाहिए. अलग-अलग धर्म एक ही अंतिम सत्य तक पहुंचने के अलग-अलग रास्ते हैं.

"विविधता हमारी आंतरिक एकता की सजावट"

संघ प्रमुख ने कहा, "विविधता हमारी आंतरिक एकता की सजावट है. इसे स्वीकार करना होगा. इसका सम्मान करना होगा. इसकी रक्षा करनी होगी. जैसे मैं अपनी विशिष्ट प्रकृति की रक्षा करता हूं, वैसे ही मुझे दूसरों की भी रक्षा करनी होगी."

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उन्होंने कहा कि आरएसएस का मानना है कि यह संदेश भारत से बाहर ले जाने की उसकी जिम्मेदारी है. हम आरएसएस के रूप में सोचते हैं कि हमारे पास यह ज्ञान है कि पूरी मानवता एक है, इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम पूरी दुनिया में जाएं और सबको बताएं कि हमारी विविधता के बावजूद हम एक हैं. विविधता प्रकृति का नियम है, एकता उसके पीछे का सत्य है."

मुसलमानों पर क्या बोले संघ प्रमुख?

कार्यक्रम में आरएसएस प्रमुख ने मुसलमानों को लेकर संगठन के नजरिए पर पूछे गए सवालों का भी जवाब दिया. उन्होंने 2018 में दिल्ली में मुस्लिम प्रतिभागियों के साथ हुई बातचीत को याद किया, जिसमें उनसे पूछा गया था कि क्या हिंदू राष्ट्र की अवधारणा के तहत मुसलमानों को भारत से बाहर निकाल दिया जाएगा. भागवत ने कहा, "तब मैंने कहा था- 'नहीं. वह हिंदू नहीं है. अगर कोई हिंदू सोचता है कि भारत में कोई मुसलमान नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा.' अगर आप खुद को हिंदू कहना चाहते हैं, तो आपको यह मानना होगा कि सभी रास्ते एक ही ओर ले जाते हैं. और हर इंसान की एक गरिमा है. इंसानों में कोई भेद नहीं है."

मोहन भागवत ने बताया कि 2018 की उस बैठक के बाद से भारत में मुस्लिम और ईसाई समुदायों के साथ संवाद लगातार जारी है.

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उन्होंने कहा कि संवाद और सेवा दोनों को साथ-साथ चलना चाहिए और इसकी शुरुआत राजनीति से नहीं, बल्कि समाज के भीतर से होनी चाहिए.

उन्होंने कहा, "ये चीजें राजनीति से नहीं होतीं. दुख के साथ कहना पड़ रहा है, लेकिन सच यह है कि राजनीति अब स्वार्थ का खेल बन गई है. हम और हमारा समाज ही समाधान है. तो भारत में हमारा अनुभव है कि हमें समाज से शुरुआत करनी होगी."

उन्होंने कहा कि जब समाज में एक मजबूत जन-सहमति बनती है, तो राजनीतिक नीतियां भी उससे प्रभावित होती हैं. लोकतंत्र में राजनेताओं के लिए जनता की राय को नजरअंदाज करना मुश्किल हो जाता है.

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मोहन भागवत ने कहा, "आज हम जो भी करने का फैसला करें, हमें अपने ही देश में शुरुआत करनी चाहिए और निस्वार्थ सेवा, एकता के माहौल के ऐसे क्षेत्र बनाने चाहिए. हमें अपने ही स्थान पर उस दुनिया के मॉडल बनाने चाहिए, जो हम चाहते हैं."

उन्होंने अंतर-धार्मिक संवाद को राष्ट्रीय नेतृत्व के मंचों से आगे बढ़ाकर प्रांत, जिले और स्थानीय ब्लॉक स्तर तक ले जाने का आह्वान किया. संघ प्रमुख ने कहा कि स्थानीय स्तर पर जुड़ाव से अविश्वास को दूर किया जा सकता है और यह दिखाया जा सकता है कि समुदाय सेवा के माध्यम से कैसे सहयोग कर सकते हैं.

उन्होंने कहा, "अगर हम मिलकर काम करना शुरू करें, तो हम दुनिया की स्थिति को बदल सकते हैं." हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि इस प्रयास में धैर्य की जरूरत होगी, क्योंकि लोगों की सोच को बदलने में समय लगेगा.

बिना किसी धार्मिक भेदभाव के RSS करता है सबकी सेवा: मोहन भागवत

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि संगठन बिना किसी धार्मिक भेदभाव के लोगों की सेवा करता है. उन्होंने अरब देशों के दो विमानों से जुड़ी एक हवाई दुर्घटना के दौरान संगठन की ओर से की गई मदद का उदाहरण दिया, जिनमें ज्यादतर यात्री मुस्लिम थे.

न्यूयॉर्क में धार्मिक नेताओं की "एक दुनिया, एक मानवता" सभा को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि समुदायों के बीच बातचीत के साथ-साथ सेवा भी होनी चाहिए.

उन्होंने कहा, "बातचीत पहला कदम है. सेवा दूसरा कदम है. ऐसा नहीं है कि एक के बाद दूसरा कदम उठाया जाए. ये दोनों काम एक साथ शुरू होने चाहिए." भागवत ने कहा कि आरएसएस की शुरुआत से ही सेवा उसके काम का मुख्य हिस्सा रही है. स्वयंसेवक मदद चाहने वाले लोगों का धर्म या पहचान नहीं पूछते थे. भागवत ने कहा, "शुरुआत से ही हम सेवा कर रहे हैं. सेवा करते समय हम कोई भेदभाव नहीं करते. जिसे भी जरूरत होती है, हम उसकी सेवा करते हैं."

उन्होंने कहा कि समाज के सहयोग से आरएसएस के स्वयंसेवक अलग-अलग स्तर के 1,30,000 सेवा कार्य चला रहे हैं. भागवत ने अपनी बात को पुख्ता करने के लिए हरियाणा में हुए दो विमानों की टक्कर का उदाहरण दिया.

उन्होंने कहा कि आरएसएस के स्वयंसेवक घटनास्थल पर पहुंचे और विमान में सवार लोगों के धर्म की परवाह किए बिना मदद की. दोनों विमान अरब देशों के थे और ज्यादातर यात्री मुसलमान थे."

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भागवत ने बताया कि स्वयंसेवकों ने बचे हुए कुछ लोगों का इलाज किया, शवों को बाहर निकाला, अंतिम संस्कार की व्यवस्था में मदद की और बाद में पीड़ितों की पहचान करने में उनके रिश्तेदारों की सहायता की.

उन्होंने कहा, "उस समय हमने कभी नहीं सोचा कि ये मुसलमान हैं. हम ऐसा इसलिए कर सके क्योंकि हम राजनीति में नहीं हैं. हम ऐसा करते हैं. हम सिर्फ देते हैं. हमें कुछ नहीं चाहिए."

RSS के प्रति संघ प्रमुख ने दूर की दुर्भावना

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भागवत ने माना कि आरएसएस के बारे में लोगों की कुछ धारणाएं बन गई हैं, क्योंकि संगठन ने अपने ज्यादातर कामों का प्रचार-प्रसार नहीं किया है. उन्होंने लोगों से कहा कि वे संगठन के बारे में कोई राय बनाने से पहले उसे अंदर से देखें और समझें.

उन्होंने कहा, "इसीलिए प्रचार-प्रसार के मामले में हम काफी पीछे हैं. गलत बातों और धारणाओं की वजह से कई तरह की गलतफहमियां पैदा हो गई हैं. लेकिन जब आप आकर हमें अंदर से देखेंगे, तो वे सारी गलतफहमियां एक ही दिन में दूर हो जाएंगी."

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भागवत ने कहा कि सेवा का काम मदद पाने वालों में भी बदलाव ला सकता है. उन्होंने कहा कि "ऐसे प्रोजेक्ट्स की मदद से मुश्किल हालात से उबरने वाले लोग अक्सर बाद में खुद ही दूसरों की मदद करने के लिए लौट आते हैं, बिना किसी के कहे."

कुछ लाभार्थियों की प्रतिक्रिया का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा, "इस प्रोजेक्ट ने मुझे बहुत कुछ दिया है. अब मुझे भी कुछ वापस देना है. हम उन्हें ऐसा करने के लिए कहते नहीं हैं. लेकिन यह भावना अपने आप पैदा होती है." भागवत ने धार्मिक नेताओं से आग्रह किया कि वे अपने देशों में निस्वार्थ सेवा के ऐसे ही उदाहरण पेश करें और लगातार बातचीत के जरिए आपस में जुड़ें.

बता दें कि 1996 में हरियाणा के हुई चरखी दादरी में हवा में सऊदी अरब एयरलाइंस का एक विमान और कजाकिस्तान एयरलाइंस के विमान टकरा गए थे. एविएशन के इतिहास की सबसे घातक हवाई टक्करों में से एक इस घटना में दोनों विमानों में सवार सभी 349 लोगों की मौत हो गई थी.

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आरएसएस की स्थापना 1925 में नागपुर में के.बी. हेडगेवार ने की थी और 2025 में इसने अपनी स्थापना के 100 साल पूरे किए. इस संगठन का पूरे देश में वॉलंटियर्स का नेटवर्क है, जबकि इससे जुड़े संगठन शिक्षा, समाज सेवा, मज़दूर और आदिवासी कल्याण जैसे क्षेत्रों में काम करते हैं.

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