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US में 67 देशों की बैठक में भारत का सख्त संदेश, रुबियो के सामने आतंकवाद पर कही ऐसी बात जिसे सुनकर कांप जाएगा पाकिस्तान
वाशिंगटन में वामपंथी आतंकवाद पर आयोजित बैठक में भारत समेत 67 देशों ने हिस्सा लिया. भारत ने स्पष्ट किया कि आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति ही प्रभावी समाधान है.
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आतंकवाद आज भी दुनिया के सामने सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौतियों में से एक है. बदलती तकनीक, इंटरनेट और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क ने इसे पहले से अधिक जटिल बना दिया है. इसी चुनौती पर चर्चा के लिए अमेरिका के वाशिंगटन शहर में एक उच्च स्तरीय मंत्रिस्तरीय बैठक आयोजित की गई, जिसमें भारत सहित 67 देशों ने भाग लिया. इस बैठक का मकसद वामपंथी चरमपंथ और आतंकवाद के खिलाफ साझा रणनीति तैयार करना था. हालांकि चर्चा के दौरान एक ऐसा मुद्दा सामने आया जिसने वैश्विक आतंकवाद पर अलग-अलग देशों की सोच को भी उजागर कर दिया.
मार्को रुबियो ने वामपंथी आतंकवाद पर दिया जोर
बैठक में अमेरिका की ओर से विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दुनिया के देशों से वामपंथी आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होकर कार्रवाई करने की अपील की. उन्होंने कहा कि बीते वर्षों में जिहादी आतंकवाद का खतरा काफी कम हुआ है और अब दुनिया को वामपंथी चरमपंथ पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है. रुबियो के इस बयान ने कई देशों का ध्यान अपनी ओर खींचा क्योंकि सभी देश इस आकलन से पूरी तरह सहमत नहीं दिखे.
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भारत ने दोहराई जीरो टॉलरेंस की नीति
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भारत की ओर से अमेरिका में भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा ने देश का प्रतिनिधित्व किया. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आतंकवाद को किसी एक विचारधारा तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता. भारत का मानना है कि आतंकवाद चाहे किसी भी नाम, विचारधारा या संगठन के माध्यम से सामने आए, उसके खिलाफ समान और सख्त कार्रवाई होनी चाहिए. उन्होंने दोहराया कि भारत की नीति हर प्रकार के आतंकवाद के प्रति "जीरो टॉलरेंस" की रही है. भारत का यह बयान और रूख एक तरह से पाकिस्तान के लिए खुला संदेश है कि आतंकवाद को भारत किसी भी रूप में ना तो स्वीकार करेगा और ना हे बर्दाश्त करेगा.
नक्सलवाद से लेकर सीमा पार आतंकवाद तक भारत का अनुभव
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बैठक के दौरान विनय क्वात्रा ने भारत के लंबे अनुभवों का भी उल्लेख किया. उन्होंने बताया कि भारत ने वर्षों तक वामपंथी उग्रवाद यानी नक्सलवाद का मुकाबला किया है और इस चुनौती से निपटने के लिए सुरक्षा, विकास और स्थानीय भागीदारी जैसे कई स्तरों पर काम किया है. इसके साथ ही उन्होंने सीमा पार आतंकवाद और अलगाववादी एजेंडे को समर्थन देने वाले नेटवर्क पर भी चिंता जताई. भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मुद्दा उठाता रहा है कि आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले ढांचों पर सख्त कार्रवाई जरूरी है.
कई देशों ने एजेंडे पर जताई असहमति
इस बैठक में करीब 67 देशों ने भाग लिया, लेकिन कई देशों ने अपने विदेश मंत्रियों की जगह जूनियर राजनयिकों को भेजा. इसकी एक बड़ी वजह बैठक का एजेंडा माना गया, जो मुख्य रूप से वामपंथी खतरे पर केंद्रित था. कुछ देशों का मानना था कि मौजूदा वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों में इस्लामिक चरमपंथ और अन्य प्रकार के आतंकवाद को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यही कारण रहा कि इस मुद्दे पर सभी देशों की सोच पूरी तरह एक जैसी नहीं दिखी.
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बदलते आतंकवाद पर अमेरिका की चिंता
मार्को रुबियो ने अपने संबोधन में कहा कि आधुनिक दौर का आतंकवाद पहले से कहीं अधिक संगठित और अंतरराष्ट्रीय हो चुका है. उनके अनुसार, आतंकवादी एक देश से फंड जुटाते हैं, दूसरे देश में डिजिटल नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं, तीसरे देश में प्रशिक्षण लेते हैं और किसी अन्य देश में हमला करते हैं. उनका कहना था कि ऐसे नेटवर्क को खत्म करने के लिए देशों के बीच खुफिया जानकारी साझा करना, कानून प्रवर्तन एजेंसियों का सहयोग बढ़ाना और सीमाओं के पार समन्वय मजबूत करना बेहद जरूरी है.
जिहादी आतंकवाद पर भारत और अमेरिका की अलग सोच
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हालांकि भारत की सबसे बड़ी चिंता रुबियो के उस बयान को लेकर रही, जिसमें उन्होंने जिहादी आतंकवाद के खतरे को पहले की तुलना में काफी कम बताया. भारत का आकलन इससे अलग है. भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और सरकार का लगातार यह कहना रहा है कि देश के लिए सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद आज भी गंभीर चुनौती बना हुआ है. भारत का मानना है कि आतंकवाद को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि किसी भी प्रकार का आतंकवाद निर्दोष लोगों की जान लेता है और वैश्विक शांति को नुकसान पहुंचाता है.
आतंकवाद पर भारत का स्पष्ट संदेश
भारत लगातार यह संदेश देता रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में किसी तरह का दोहरा मापदंड नहीं अपनाया जाना चाहिए. यदि दुनिया केवल एक प्रकार के आतंकवाद पर ध्यान केंद्रित करेगी और दूसरे खतरों को कम करके आंकेगी, तो वैश्विक सुरक्षा रणनीति कमजोर पड़ सकती है. यही वजह है कि भारत हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर आतंकवाद के सभी स्वरूपों के खिलाफ समान कार्रवाई की वकालत करता है.
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बताते चलें कि वाशिंगटन में हुई यह बैठक एक बार फिर इस बात का संकेत देती है कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक सहयोग पहले से अधिक जरूरी हो गया है. लेकिन इसके साथ ही यह भी साफ है कि अलग-अलग देशों की प्राथमिकताएं और सुरक्षा चिंताएं अलग हो सकती हैं. भारत का रुख स्पष्ट है कि आतंकवाद का कोई अच्छा या बुरा चेहरा नहीं होता. जब तक दुनिया हर प्रकार के आतंकवाद के खिलाफ समान दृढ़ता के साथ खड़ी नहीं होगी, तब तक इस वैश्विक चुनौती का स्थायी समाधान निकालना आसान नहीं होगा.