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अमेरिका के दबाव के बीच भारत के समर्थन में आया यूरोप का यह देश, रूसी तेल पर दिया बड़ा बयान, जानें पूरा मामला

अमेरिका की ओर से रूस से तेल खरीदने पर भारत पर पेनल्टी की चर्चा के बीच फिनलैंड ने भारत का समर्थन किया है. फिनलैंड की विदेश मंत्री एलिना वाल्टोनेन ने कहा कि भारत ने पश्चिमी देशों के प्राइस कैप नियमों के तहत ही रूसी तेल खरीदा है.

अमेरिका के दबाव के बीच भारत के समर्थन में आया यूरोप का यह देश, रूसी तेल पर दिया बड़ा बयान, जानें पूरा मामला
Image Source: X/ @DrSJaishankar
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रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं और अमेरिका की ओर से संभावित पेनल्टी की चर्चाओं के बीच भारत को एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला है. फिनलैंड की विदेश मंत्री एलिना वाल्टोनेन ने खुलकर कहा है कि भारत ने रूस से तेल खरीदने में किसी नियम का उल्लंघन नहीं किया है. उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत ने पश्चिमी देशों द्वारा तय किए गए ऑयल प्राइस कैप के दायरे में रहकर ही रूसी तेल का आयात किया है.

दरअसल, यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा सुरक्षा, तेल की कीमतों और रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रभावों पर बहस तेज बनी हुई है. फिनलैंड में आयोजित कुलटारेंटा टॉक्स कार्यक्रम के दौरान एक पैनल चर्चा में यह मुद्दा प्रमुखता से उठा. इस चर्चा में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और संयुक्त अरब अमीरात की सहायक विदेश मंत्री लाना नुसेबेह भी शामिल थीं.

फिनलैंड की विदेश मंत्री ने क्या कहा?

एलिना वाल्टोनेन ने अपने वक्तव्य में कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने जो ऑयल प्राइस कैप व्यवस्था लागू की थी, उसका उद्देश्य दुनिया के देशों को रूसी तेल खरीदने से पूरी तरह रोकना नहीं था. उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था का मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना था कि वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बनी रहे और दुनिया को ऊर्जा संकट का सामना न करना पड़े. फिनलैंड की विदेश मंत्री ने कहा कि भारत ने उसी व्यवस्था के तहत तेल खरीदा है जिसके लिए प्राइस कैप बनाया गया था. उनके अनुसार, यदि पूरी दुनिया रूसी तेल खरीदना बंद कर देती तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा संकट खड़ा हो सकता था. इसलिए उस समय ऐसी व्यवस्था बनाई गई थी जिससे तेल की सप्लाई जारी रहे और रूस को अत्यधिक आर्थिक लाभ भी न मिले.

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 भारत की ऊर्जा नीति का जयशंकर ने किया बचाव

इस दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी भारत की ऊर्जा नीति का मजबूती से बचाव किया. उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि भारत हमेशा अपनी जरूरतों, कीमत और उपलब्धता को ध्यान में रखकर तेल खरीदता है. उन्होंने कहा कि किसी भी देश की पहली जिम्मेदारी अपने नागरिकों की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करना होती है और भारत भी यही कर रहा है. जयशंकर ने याद दिलाया कि वर्ष 2022 में रूस पर विभिन्न प्रतिबंध लगाए जाने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार पूरी तरह बदल गया था. उस समय यूरोप के कई देश मध्य पूर्व से बड़ी मात्रा में तेल खरीदने लगे थे. मध्य पूर्व लंबे समय तक भारत के लिए प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता रहा है. ऐसे हालात में भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने के लिए नए विकल्पों की तलाश करनी पड़ी. उन्होंने यह भी दावा किया कि उस दौर में अमेरिका ने स्वयं भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया था ताकि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में स्थिरता बनी रहे. जयशंकर के अनुसार, उस समय प्राथमिकता वैश्विक ऊर्जा बाजार को संतुलित रखना थी, न कि किसी देश को अलग-थलग करना.

यूरोप को भी दिया स्पष्ट संदेश

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चर्चा के दौरान जयशंकर ने यूरोप को भी एक महत्वपूर्ण संदेश दिया. उन्होंने कहा कि कई यूरोपीय देश वर्षों से ऐसे हथियार बेचते रहे हैं जिनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया जाता रहा है. उन्होंने कहा कि भारत ने कभी भी यूरोप की सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने वाला कोई कदम नहीं उठाया है, इसलिए भारत की परिस्थितियों और जरूरतों को भी समझा जाना चाहिए.

खाड़ी देशों के साथ रिश्तों पर क्या बोले जयशंकर?

खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंधों को लेकर उठने वाले सवालों पर भी विदेश मंत्री ने स्थिति स्पष्ट की. उन्होंने कहा कि यह धारणा पूरी तरह गलत है कि भारत खाड़ी देशों से दूरी बना रहा है. उन्होंने बताया कि वर्तमान में रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है, जबकि अमेरिका सबसे बड़ा गैस आपूर्तिकर्ता बन चुका है. इससे पहले यह स्थान कतर के पास था. जयशंकर ने जोर देकर कहा कि भारत और खाड़ी देशों के रिश्ते केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं हैं. व्यापार, निवेश, सुरक्षा, तकनीक और लोगों के बीच मजबूत संबंध दोनों पक्षों को और करीब लाते हैं.

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बहरहाल, फिनलैंड की ओर से मिला यह समर्थन भारत के लिए कूटनीतिक स्तर पर एक बड़ी राहत माना जा रहा है. इससे यह संदेश भी गया है कि भारत की ऊर्जा नीति को लेकर दुनिया के कई देश उसकी व्यावहारिक जरूरतों और परिस्थितियों को समझ रहे हैं. आने वाले समय में यह मुद्दा वैश्विक राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा की बहस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहेगा.

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