BLA-TTP ने मिलाया हाथ, पाकिस्तान और CPEC के खिलाफ जंग का किया ऐलान, चीन की उड़ी नींद
बलूच लोग सालों से इस प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं, उनका कहना है कि इससे इलाके के लोगों को कोई फायदा नहीं होगा. उन्होंने पाकिस्तानी सरकार पर बलूचिस्तान के रिसोर्स लूटने का आरोप लगाया है. लोगों का कहना है कि इन रिसोर्स से जो पैसा इकट्ठा होता है, वह सिर्फ पाकिस्तान के बड़े शहरों तक पहुंच रहा है.
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बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा (केपी) दोनों में अगले कुछ दिनों में हिंसा में तेज वृद्धि की आशंका जताई जा रही है. कई आतंकवादी संगठन उभरती सुरक्षा स्थिति के जवाब में बड़े कदम उठाने की सोच रहे हैं.
सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) का मुकाबला करने के लिए को-ऑर्डिनेटेड अरेंजमेंट के तहत लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी), जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) और इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रोविंस (आईएसकेपी) को एक साथ लाया है.
अधिकारियों के अनुसार, बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए), तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और कई अन्य आतंकी संगठन भी पाकिस्तान सेना द्वारा बनाए गए गठबंधन का मुकाबला करने के लिए साझा मोर्चा बनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं. अधिकारियों का कहना है कि ऐसा गठजोड़ सेना के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है, लेकिन यह क्षेत्र में चल रही व्यापक रणनीति का हिस्सा है.
बीएलए-टीटीपी समेत कई संगठनों के साथ आने का दावा
सूत्रों के मुताबिक, टीटीपी, उसका धड़ा हाफिज गुल बहादुर, बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ) और बीएलए ने न केवल पाकिस्तान के गठबंधन के खिलाफ, बल्कि क्षेत्र में चीन के हितों को भी निशाना बनाने के लिए साथ मिलकर लड़ने का फैसला किया है.
इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के एक अधिकारी ने बताया कि इस नए गठबंधन का उद्देश्य चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) परियोजना पर नियंत्रण स्थापित करना है.
सीपीईसी को लेकर लंबे समय से विरोध
बलूच लोग सालों से इस प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं, उनका कहना है कि इससे इलाके के लोगों को कोई फायदा नहीं होगा. उन्होंने पाकिस्तानी सरकार पर बलूचिस्तान के रिसोर्स लूटने का आरोप लगाया है. लोगों का कहना है कि इन रिसोर्स से जो पैसा इकट्ठा होता है, वह सिर्फ पाकिस्तान के बड़े शहरों तक पहुंच रहा है.
खासकर बीएलए ने लंबे समय तक सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी है, और समय के साथ, यह पाकिस्तान के लिए उसका सबसे बड़ा डरावना सपना बन गया है. अधिकारियों का कहना है कि जो नया अलायंस बन रहा है, उसका मकसद बलूचिस्तान के साथ-साथ खैबर पख्तूनख्वा के रिसोर्स पर भी कब्जा करना है.
चीनी निवेशकों से मुनाफे में हिस्सेदारी की मांग
एक अन्य अधिकारी ने कहा कि ऐसी खबरें हैं कि बलूचिस्तान में समूहों ने चीनी निवेशकों से उनकी सुरक्षा की गारंटी के बदले प्रोजेक्ट के मुनाफे में हिस्सा मांगना शुरू कर दिया है. अधिकारियों ने कहा, "समूहों ने यह भी चेतावनी दी है कि जब तक कि यह भरोसा न दिया जाए कि मुनाफे का एक हिस्सा बलूच लोगों की भलाई और विकास के लिए इस्तेमाल किया जाएगा, चीनी कंपनियों को इस इलाके में अपना दखल कम कर देना चाहिए."
पाकिस्तान पर सुरक्षा बढ़ाने का चीन का दबाव
इसका मकसद चीनी निवेशकों के मन में डर पैदा करना है. चीन ने बार-बार पाकिस्तान को प्रोजेक्ट का नियंत्रण अपने हाथ में लेने और अपने निवेश और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की चेतावनी दी है.
बीजिंग ने सीपीईसी और अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए बलूचिस्तान में अपनी सेना भेजने का भी ऑफर दिया था. हालांकि, इस्लामाबाद ने चीन से समय मांगा था और बीजिंग से कहा था कि इस इलाके में उसकी सेना की जरूरत नहीं होगी.
अधिकारियों ने कहा, "उभरता हुआ गठबंधन पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र को बढ़ाने के मकसद से एक रणनीति पर भी सहमत हो गया है."
एक साथ कई मोर्चों पर हमले की रणनीति
योजना के तहत, बलूचिस्तान और केपी में कोई भी हमला एक साथ किया जाएगा, जिससे सुरक्षा बलों को कई मोर्चों पर जवाब देना पड़ेगा.
योजना के तहत बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा (केपी) में हमलों को एक साथ अंजाम देने की रणनीति बनाई गई है, ताकि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों को एक ही समय में कई मोर्चों पर जवाबी कार्रवाई करनी पड़े. अधिकारियों के अनुसार, इस तरह के समन्वित हमलों का उद्देश्य सुरक्षा तंत्र के संसाधनों पर दबाव बढ़ाना और पाकिस्तान की सेना को रक्षात्मक स्थिति में धकेलना है.
स्थानीय समर्थन से बीएलए और टीटीपी को बढ़त
पाकिस्तान मामलों के जानकारों का मानना है कि यदि यह नया गठबंधन बनता है, तो उसका मुकाबला इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (आईएसकेपी), लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों के संभावित गठजोड़ के लिए आसान नहीं होगा. उनका कहना है कि इस नए गठबंधन के पक्ष में कई ऐसे कारक हैं, जो उसे बढ़त दिला सकते हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार, सबसे बड़ा कारण स्थानीय समर्थन है, जो बीएलए और टीटीपी दोनों को पर्याप्त मात्रा में हासिल है. बलूचिस्तान में बीएलए को आम लोगों का दुश्मन नहीं, बल्कि क्षेत्र के हितों के लिए लड़ने वाले संगठन के रूप में देखा जाता है. वहीं, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों को स्थानीय स्तर पर समर्थन मिलने की संभावना बेहद कम है, क्योंकि उन्हें पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान का करीबी माना जाता है.
सुरक्षा बलों के लिए खुफिया जानकारी जुटाना बड़ी चुनौती
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अधिकारी ने बताया कि बीएलए और टीटीपी जैसे संगठनों से निपटने में स्थानीय खुफिया जानकारी जुटाना सबसे अहम भूमिका निभाता है. इसके अलावा, इन संगठनों को इलाके की भौगोलिक परिस्थितियों की गहरी जानकारी है, जिससे उन्हें रसद और संचालन के स्तर पर महत्वपूर्ण बढ़त मिलती है.