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LPG के दाम से परेशान? DME से सस्ता होगा खाना बनाना, नहीं बदलना पड़ेगा चूल्हा

DME: भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा LPG आयात करने वाला देश है, और हमारी गैस सप्लाई का एक बड़ा हिस्सा स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज से होकर आता है.यही रास्ता अब अस्थिर हो गया है. जब इस तरह के अहम रास्तों पर खतरा बढ़ता है, तो सप्लाई में रुकावट आना लगभग तय होता है. इसका सीधा असर गैस की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ता है.

LPG के दाम से परेशान? DME से सस्ता होगा खाना बनाना, नहीं बदलना पड़ेगा चूल्हा
Image Source: Canva
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LPG Crisis: पश्चिमी एशिया में चल रहे संघर्ष का सर अब सिर्फ खबरों तक ही सिमित नहीं रहा, बल्कि यह धीरे -धीरे हमारे घरों की रसोई तक पहुंचने लगा है. भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा LPG आयात करने वाला देश है, और हमारी गैस सप्लाई का एक बड़ा हिस्सा स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज से होकर आता है.यही रास्ता अब अस्थिर हो गया है. जब इस तरह के अहम रास्तों पर खतरा बढ़ता है, तो सप्लाई में रुकावट आना लगभग तय होता है. इसका सीधा असर गैस की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ता है.  आम आदमी के लिए इसका मतलब है , रसोई का बजट बिगड़ना और रोजमर्रा की जिंदगी में असुविधा बढ़ना.

गैस की कमी और बदलती आदतें

जब घर में LPG सिलेंडर समय पर नहीं मिलता या महंगा हो जाता है, तो लोग स्वाभाविक रूप से दूसरे विकल्प तलाशने लगते हैं. यही कारण है कि अब कई घरों में इंडक्शन कुकटॉप, इलेक्ट्रिक स्टोव या अन्य आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ रहा है. यह बदलाव सिर्फ मजबूरी नहीं, बल्कि धीरे-धीरे एक नई आदत भी बनता जा रहा है. हालांकि सरकार लगातार यह भरोसा दिला रही है कि देश में गैस की कमी नहीं होने दी जाएगी, लेकिन जमीनी स्तर पर लोगों की सोच और व्यवहार में बदलाव साफ दिखाई दे रहा है.

DME-  एक नया सहारा बनने की उम्मीद

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ऐसे समय में एक नई उम्मीद सामने आई है, DME यानी डाइमिथाइल ईथर. एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगर LPG में करीब 20% DME मिलाया जाए, तो भारत हर साल लगभग 6.3 मिलियन टन LPG आयात कम कर सकता है. इसका मतलब है कि हम विदेशी निर्भरता को थोड़ा कम कर सकते हैं और अपने संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं. यह कदम न सिर्फ आर्थिक रूप से फायदेमंद हो सकता है, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूत करेगा.

आखिर DME है क्या और क्यों खास है?

DME एक तरह की सिंथेटिक गैस है, जिसे कोयले से तैयार किया जाता है. खास बात यह है कि यह पारंपरिक ईंधनों की तुलना में ज्यादा साफ-सुथरी मानी जाती है. इससे प्रदूषण कम होता है और पर्यावरण पर भी कम असर पड़ता है. इसकी ऊर्जा क्षमता भी LPG के बराबर ही मानी जाती है, इसलिए इसे एक बेहतर विकल्प के रूप में देखा जा रहा है. यानी यह न सिर्फ हमारी जरूरतें पूरी कर सकता है, बल्कि पर्यावरण का भी ख्याल रख सकता है, जो आज के समय में बेहद जरूरी है.

रसोई से लेकर उद्योग तक - हर जगह इस्तेमाल

DME का इस्तेमाल सिर्फ बड़े उद्योगों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे घरेलू रसोई गैस के साथ मिलाकर भी इस्तेमाल किया जा सकता है. भारतीय मानक ब्यूरो ने पहले ही 20% तक DME को LPG में मिलाने की अनुमति दे दी है, जो एक बड़ा कदम है. हालांकि अभी भारत में इसका उत्पादन बहुत कम है, लेकिन अगर सरकार इस दिशा में साफ और मजबूत नीति बनाती है, तो निवेश बढ़ सकता है और देश में इसका उत्पादन भी तेजी से बढ़ सकता है.

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चीन क्यों है इस दौड़ में आगे?

अगर हम दुनिया की बात करें, तो चीन DME उत्पादन में सबसे आगे है और उसका करीब 90% हिस्सा इसी के पास है. इसका मुख्य कारण वहां की मजबूत कोल-टू-केमिकल इंडस्ट्री है, जो बड़े पैमाने पर इस गैस का उत्पादन करती है. भारत के लिए यह एक संकेत भी है कि अगर सही दिशा में कदम उठाए जाएं, तो हम भी इस क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हैं और अपनी ऊर्जा जरूरतों को ज्यादा आत्मनिर्भर तरीके से पूरा कर सकते हैं.

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यह समय भारत के लिए चुनौती के साथ-साथ एक अवसर भी लेकर आया है. जहां एक ओर गैस की कमी और अंतरराष्ट्रीय तनाव चिंता बढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर DME जैसे विकल्प हमें नई दिशा दिखा रहे हैं. अगर सही फैसले लिए जाएं, तो आने वाले समय में हमारी रसोई ज्यादा सुरक्षित, सस्ती और पर्यावरण के अनुकूल हो सकती है.

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